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सीएम पद की रेस में वीरभद्र सबसे आगे
संजय मिश्र
Updated Sat, 22 Dec 2012 09:48 AM IST
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हिमाचल प्रदेश की सत्ता की कमान सौंपने को लेकर जारी सियासत में राजा वीरभद्र सिंह ने अपने विरोधी खेमे को फिलहाल पीछे छोड़ दिया है। समझा जाता है कि कांग्रेस हाईकमान ने पार्टी की जीत के मुख्य हीरो वीरभद्र सिंह को मुख्यमंत्री बनाने का मन लगभग बना लिया है।
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मुख्यमंत्री पद को लेकर जारी सियासी सस्पेंस से शनिवार को शिमला में विधायक दल की बैठक के बाद पर्दा उठ सकता है। कांग्रेस हाईकमान ने विधायक दल के नेता के चुनाव के लिए दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और पार्टी महासचिव जनार्दन द्विवेदी के साथ हिमाचल के प्रभारी महासचिव चौधरी वीरेंद्र सिंह को पर्यवेक्षक बनाया है।
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पर्यवेक्षकों की मौजूदगी में विधायक दल के नेता के चुनाव को लेकर विधायकों की राय शुमारी करायी जाएगी। इस रायशुमारी में नेता को लेकर खींचतान ज्यादा नहीं हुई तो संकेत हैं कि बैठक के बाद ही वीरभद्र के विधायक दल का नेता चुने जाने की घोषणा कर दी जाए।
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वीरभद्र विरोधी खेमा यदि ज्यादा मुखर हुआ तो फिर मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार का अंतिम फैसला कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर छोड़ा जाएगा। बहरहाल, पार्टी के उच्चपदस्थ सूत्रों से मिले संकेतों के अनुसार हिमाचल में कांग्रेस के कम से कम आदे विधायक वीरभद्र के साथ हैं।
इसके अलावा पार्टी के लिए सबसे अहम बात यह है कि हिमाचल प्रदेश में उसे ऐसे वक्त जीत की यह सियासी संजीवनी मिली है जब कांग्रेस यूपीए सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार से लेकर महंगाई तक के मुद्दों की चुनौती से जूझ रही है।
पार्टी के एक दिग्गज नेता ने कहा कि हाईकमान इस जीत की सियासी अहमियत और इसमें राजा वीरभद्र सिंह की भूमिका को बखूबी समझ रहा है। इसीलिए राज्य में राजनीतिक स्थायित्व और अगले लोकसभा चुनाव में एक-एक सीट की अहमियत को देखते हुए वीरभद्र सिंह को हिमाचल की कमान सौंपने का मन बना लिया है। विधानसभा चुनाव से पहले वीरभद्र के विद्रोही तेवरों को देखते हुए भी हाईकमान जोखिम नहीं लेना चाहता।
पिछले मार्च में उत्तराखंड विधानसभा चुनाव के बाद बहुमत विधायकों की राय के विपरीत आलाकमान के मुख्यमंत्री तय करने के बाद हुए विद्रोह की स्मृति अभी धूमिल नहीं हुई है। उत्तराखंड में कांग्रेस के पास हरीश रावत के विधानसभा चुनाव नहीं लड़ने का तर्क था, मगर वीरभद्र सिंह तो विधानसभा चुनाव जीतकर मैदान में डटे हैं।
वीरभद्र हाईकमान के प्रति निष्ठा जताते हुए भी सीएम पद पर अपने दावे को स्वाभाविक बता अपनी मंशा जाहिर कर चुके हैं। समझा जाता है कि उत्तराखंड के अनुभवों को देखते हुए ही सोनिया गांधी ने दो भरोसेमंद चेहरों शीला दीक्षित और जनार्दन द्विवेदी को विधायक दल के नेता के चयन के लिए पर्यवेक्षक बनाया है।
प्रदेश के प्रभारी महासचिव चौधरी वीरेंद्र सिंह पर वीरभद्र खेमा अपने विरोधी गुट के निकट रहने का आरोप लगाता रहा है। इसीलिए दीक्षित और द्विवेदी की पर्यवेक्षक के रूप में तैनाती अहम है।