उत्तराखंड में दुनिया के वैज्ञानिक कर रहे संजीवनी की तलाश
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हिमालय के कैलास मानसरोवर क्षेत्र में भी संजीवनी बूटी की तलाश शुरू हो गई है। भारत, चीन और नेपाल के संयुक्त प्रोजेक्ट के तहत उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र (यूसैक) इस खोज में जुट गया है।
विज्ञानियों के ताजा सर्वेक्षण में छह से अधिक जड़ी-बूटियों को संजीवनी के रूप में क्षेत्रीय लोगों ने चिह्नित करवाया है। संयुक्त प्रोजेक्ट के कंपोनेंट-4 में जड़ी-बूटियों को शामिल किया गया है। ग्लोरिया प्रोटोकॉल के तहत वियना इसकी मॉनीटरिंग करेगा। सेटेलाइट के जरिये संजीवनी बूटी के स्थानों की पहचान की जाएगी।
हिमालय रेंज के चमोली स्थित द्रोणागिरी पर्वत समेत रुद्रप्रयाग, टिहरी, उत्तरकाशी जनपद तथा आसपास मध्य और उच्च हिमालयी क्षेत्र में सर्वेक्षण के लिए निकले विज्ञानियों को क्षेत्रीय लोगों ने कुट्टकी, कूथ, अतीश, अष्टवर्ग समूह आदि आधा दर्जन जड़ी-बूटियों की पहचान संजीवनी के रूप में कराई है।
सेटेलाइट के माध्यम से संजीवनी बूटी की तलाश
असली संजीवनी बूटी तक पहुंचने के लिए विज्ञानी पौराणिक कथाओं में वर्णित साक्ष्यों का भी सहारा ले रहे हैं। इसी आधार पर उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र भारत, चीन, नेपाल के संयुक्त प्रोजेक्ट ‘कैलास सैक्रड लैंड स्केप कंजर्वेशन एंड डेवलपमेंट इनीशिएटिव’ के तहत सेटेलाइट के माध्यम से संजीवनी बूटी की तलाश कर रहा है।
भारत, चीन नेपाल के संयुक्त प्रोजेक्ट में यूसैक के नोडल अधिकारी डा. गजेंद्र सिंह ने बताया कि संजीवनी बूटी के अलावा कैलास मानसरोवर में जड़ी-बूटियों के अलग-अलग प्लॉट चिह्नित कि ए जाएंगे। ग्लोरिया प्रोटोकॉल के तहत सेटेलाइट के माध्यम से इनकी मॉनीटरिंग की जाएगी।
फॉरेस्ट इकोलॉजी एंड क्लाइमेट चेंज की प्रभारी डॉ. नीलम रावत ने बताया कि संजीवनी और दूसरी जड़ी-बूटियों के लिए पर्वतीय क्षेत्रों का नए सिरे से सर्वेक्षण किया जाएगा।
पोर्टल पर भी दिखेगी संजीवनी
क्षेत्रीय लोग जिन पौधों को संजीवनी बूटी बता रहे हैं। उनका संकलन किया जा रहा है। इसके बाद उन्हें यूसैक के पोर्टल पर डाला जाएगा, जिससे लोग उन्हें देख सकें। इस दिशा में कार्य चल रहा है।
- डॉ. दुर्गेश पंत, निदेशक, यूसैक