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जान भी ले सकता है जोड़ों का दर्द
अमर उजाला, चंडीगढ़।
Updated Sun, 13 Oct 2013 01:28 AM IST
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आमतौर पर लोग जोड़ों में होने वाले दर्द को गठिया समझते हैं और इलाज पर रुपये फूंकते रहते हैं। यहां तक की जोड़ों के इस दर्द से मरीज की मौत भी हो जाती है बीमारी की असली वजह न डॉक्टरों को पता चलती है और न लोगों को।
पीजीआई के शोध में सामने आया जोड़ों की दर्द की वजह सिस्टमेटिक लुपुस इरथेमेटॉसस (एसएलई) हो सकता है। यह सिर्फ जोड़ों को ही नहीं फेफड़ेे, किडनी, हार्ट, लीवर, स्किन और नरवस सिस्टम को भी अपनी चपेट में ले सकता है।
कारण
पीजीआई इंटरनल मेडिसन डिपार्टमेंट के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अमन शर्मा के अनुसार इम्यून सिस्टम के हाइपर एक्टिव होने से यह बीमारी होती है। एसएलई में टिश्यू में सूजन आती है और वे नष्ट होने लगते हैं। यह जेनेटिक, पर्यावरण संबंधी बदलावों या दवाओं के रिएक्शन से भी हो सकता है। कई बार लुपुस के एक क्रम में न होने से भी इम्युन सिस्टम हाइपर हो जाता है।
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दस साल चला शोध
डॉ. अमन शर्मा के अनुसार आमतौर पर जोड़ों के दर्द से परेशान कम ही मरीज एडमिट होते हैं। पीजीआई में पिछले दस साल में 450 मरीज दाखिल किए गए। इनमें 17 लोगों की मौत हुई।
इनमें से 15 महिलाएं थीं और दो पुरुष। इनकी औसतम उम्र करीब 25 साल थी। जांच में पता चला कि इनमें से सात की मौत एक्टिव एसएलई की वजह से ही हुई थी।
एसएलई की वजह से तीन लोगों के फेफड़ों में रक्तस्राव हुआ था। दो की किडनी और एक का हार्ट फेल हो गया था। एक के प्लेटलेट्स कम हो गए थे। जबकि तीन की मौत सिर्फ इन्फेक्शन से हुई थी।
दस में से नौ महिलाएं पीड़ित
एसएलई की आशंका सबसे ज्यादा महिलाओं में होती है। दस में से नौ महिलाएं इस बीमारी से पीड़ित होती हैं। प्रेग्नेंसी और गर्भपात के दौरान ऐसा हो सकता है। पुरुषों में इस रोग की आशंका अपेक्षाकृत बहुत कम रहती है। डॉ. अमन शर्मा का शोध लुपुस के एक जरनल में इसी साल प्रकाशित हुआ है। उन्हें रिसर्च डे पर सम्मानित भी किया गया।
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पीजीआई के शोध में सामने आया जोड़ों की दर्द की वजह सिस्टमेटिक लुपुस इरथेमेटॉसस (एसएलई) हो सकता है। यह सिर्फ जोड़ों को ही नहीं फेफड़ेे, किडनी, हार्ट, लीवर, स्किन और नरवस सिस्टम को भी अपनी चपेट में ले सकता है।
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कारण
पीजीआई इंटरनल मेडिसन डिपार्टमेंट के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अमन शर्मा के अनुसार इम्यून सिस्टम के हाइपर एक्टिव होने से यह बीमारी होती है। एसएलई में टिश्यू में सूजन आती है और वे नष्ट होने लगते हैं। यह जेनेटिक, पर्यावरण संबंधी बदलावों या दवाओं के रिएक्शन से भी हो सकता है। कई बार लुपुस के एक क्रम में न होने से भी इम्युन सिस्टम हाइपर हो जाता है।
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दस साल चला शोध
डॉ. अमन शर्मा के अनुसार आमतौर पर जोड़ों के दर्द से परेशान कम ही मरीज एडमिट होते हैं। पीजीआई में पिछले दस साल में 450 मरीज दाखिल किए गए। इनमें 17 लोगों की मौत हुई।
इनमें से 15 महिलाएं थीं और दो पुरुष। इनकी औसतम उम्र करीब 25 साल थी। जांच में पता चला कि इनमें से सात की मौत एक्टिव एसएलई की वजह से ही हुई थी।
एसएलई की वजह से तीन लोगों के फेफड़ों में रक्तस्राव हुआ था। दो की किडनी और एक का हार्ट फेल हो गया था। एक के प्लेटलेट्स कम हो गए थे। जबकि तीन की मौत सिर्फ इन्फेक्शन से हुई थी।
दस में से नौ महिलाएं पीड़ित
एसएलई की आशंका सबसे ज्यादा महिलाओं में होती है। दस में से नौ महिलाएं इस बीमारी से पीड़ित होती हैं। प्रेग्नेंसी और गर्भपात के दौरान ऐसा हो सकता है। पुरुषों में इस रोग की आशंका अपेक्षाकृत बहुत कम रहती है। डॉ. अमन शर्मा का शोध लुपुस के एक जरनल में इसी साल प्रकाशित हुआ है। उन्हें रिसर्च डे पर सम्मानित भी किया गया।