हिमाचल हाईकोर्ट ने डिग्री कॉलेज खोलने पर लगाई रोक
हाईकोर्ट ने सरकार की उस अधिसूचना पर रोक लगा दी है, जिसमें कांगड़ा जिला के जनदौर में सरकारी कॉलेज खोलने का निर्णय लिया गया है। न्यायाधीश धर्म चंद चौधरी और न्यायाधीश सीबी बारोवालिया की खंडपीठ ने आशाराम और शेर सिंह डोगरा की याचिका की
प्रारंभिक सुनवाई के बाद ये आदेश पारित किए। याचिका में दिए तथ्यों के अनुसार 23 जून, 2012 को सरकार ने कोटला बेहड़ में कॉलेज खोलने का निर्णय लिया था। कार्य शुरू भी हो चुका था, लेकिन सरकार ने अधिसूचना को वापस ले लिया।
इसके खिलाफ हरबंस कालिया ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। याचिका पर हाईकोर्ट ने सरकार को आदेश दिए थे कि वह प्रदेश में नए कॉलेज स्थापित करने की बाबत दिशा निर्देश बनाए और मामले पर खुद उन दिशा-निर्देशों में निर्णय ले, लेकिन सरकार ने कोटला बेहड़ में दोबारा कॉलेज खोलने को कोई निर्णय नहीं लिया।
दोबारा सरकार के 2 मार्च, 2013 को कॉलेज को डिनोटिफाई करने वाले निर्णय को याचिका के माध्यम से चुनौती दी गई। याचिका को मंजूर करते हुए कोर्ट ने आदेश दिए कि 23 जून, 2012 के तहत कोटला बेहड़ में कॉलेज बनाया जाए। हाईकोर्ट के इस आदेश को सरकार ने सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दी और सुप्रीमकोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर फिलहाल रोक लगाई है।
इसके बावजूद सरकार ने कोटला बेहड़ से महज 3 किलोमीटर की दूरी पर जनदौर में कॉलेज खोलने की अधिसूचना जारी कर दी। इसे हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया कानून के विपरीत पाया और इस अधिसूचना पर रोक लगा दी। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि एक तरफ
तो सरकार उस क्षेत्र में कॉलेज न खोलने को सुप्रीमकोर्ट चली गई, दूसरी तरफ सरकार ने पुरानी जगह से मात्र 3 किलोमीटर दूर नए कॉलेज को खोलने का निर्णय ले लिया। मामले पर सुनवाई 17 जून को होगी। कोर्ट ने सरकार को तीन सप्ताह में जवाब दायर करने के आदेश दिए हैं।
बर्खास्तगी की तारीख से सिन्योरिटी देने के आदेश
प्रदेश हाईकोर्ट ने बेलदार को उसकी बर्खास्तगी की तारीख से सिन्योरिटी देने के आदेश पारित किए हैं। न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान ने श्रम न्यायालय के उस फैसले को गलत ठहराया जिसके तहत बिजली बोर्ड में कार्यरत प्रार्थी टेक सिंह को उसकी बर्खास्तगी के बाद श्रम अधिकारी को दिए डिमांड नोटिस की तारीख से सिन्योरिटी देने के आदेश दिए थे।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रार्थी को गलत तरीके से 31 मई 1998 को बर्खास्त किया गया। उसने समय पर प्रशासनिक प्राधिकरण के समक्ष अपनी टर्मिनेशन के खिलाफ मामला दायर किया था। प्रशासनिक प्राधिकरण ने मामला श्रम न्यायालय के क्षेत्राधिकार में होने की वजह से नौ जनवरी 2006 को खारिज कर दिया था।
प्रार्थी ने डिमांड नोटिस के बाद श्रम न्यायालय के समक्ष मामला उठाया था। श्रम न्यायालय ने गलत कोर्ट में मामला दायर करने की वजह के चलते प्रार्थी को डिमांड नोटिस दाखिल करने की तारीख से सिन्योरिटी देने के आदेश पारित किए थे। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया
कि गलत कोर्ट में मामला दाखिल करने की एवज में प्रार्थी को टर्मिनेशन की तारीख से सिन्योरिटी देने से मना नहीं किया जा सकता। विशेषता जब प्रार्थी ने यह मानकर मामला दायर किया था कि जिस अदालत में उसका अधिवक्ता केस दायर कर रहा है, उसके पास मामला सुनने का क्षेत्राधिकार है।
3.80 करोड़ का दिया मुआवजा
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सड़क दुघर्टनाओं से जुड़े दावों के मामलों में 3,80,29,240 रुपये का मुआवजा प्रदान किया। मोटर दुर्घटना दावा ट्रिब्यूनल के आदेशों के खिलाफ दायर की गई साल 2009 से 2016 तक की 63 अपीलों का निपटारा करते हुए मुख्य न्यायाधीश मंसूर अहमद मीर ने यह क्षतिपूर्ति हर्जाना पीड़ितों और उनके आश्रितों को प्रदान किया।