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मुंबई डब्बावाला ने दिए मैनेजमेंट के टिप्स
Chandigarh
Updated Wed, 23 Jan 2013 05:32 AM IST
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चंडीगढ़। हर रोज करीब 5 हजार लोगों की टीम घर से लेेकर दफ्तर तक दो लाख टिफिन पहुंचाती है। इस काम से जुड़े लोगों की औसतन पढ़ाई आठवीं तक है, लेकिन दुनियाभर में इस काम में निपुणता का प्रतिशत 99.99 माना जाता है। मंगलवार को पीयू के लॉ ऑडिटोरियम में दुनियाभर में मिसाल बन चुके मुंबई डब्बावाला सिस्टम को चलाने वाले रघुनाथ धोडीबा मेदगे और उनके साथी गंगाराम एल टलेकर युवकों को डब्बावाला सिस्टम की कार्यप्रणाली समझाने पहुंचे थे।
चंडीगढ़ मैनेजमेंट एसोसिएशन (सीएमए) की ओर से आयोजित शैपिंग यंग माइंड प्रोग्राम के तहत मुंबई डब्बावाला का स्पेशल प्रोग्राम आयोजित किया गया था। दोपहर बाद करीब 4 बजे शुरू हुए इस कार्यक्रम को सुनने के लिए युवाओं का उत्साह देखते ही बनता था। डब्बावाला टोपी में रघुनाथ और गंगाराम ने 1890 में 40 टिफिन से 2 लाख टिफिन के सफलता की कहानी को भावी मैनेजर के सामने पेश किया। गंगाराम ने अपने खास अंदाज में युवकों को बताया कि अनुशासन, ईमानदारी और काम करने का जज्बा ही डब्बा सिस्टम की सफलता का मूल मंत्र है। उन्होंने बताया कि कोडिंग सिस्टम से पूरा डब्बा सिस्टम संचालित हो रहा है। 4 नवंबर 2003 को प्रिंस चार्ल्स ने मुंबई स्टेशन पर 20 मिनट तक सिस्टम को समझा और फिर उन्हें इंग्लैंड में शाही शादी में आमंत्रित किया। इस सिस्टम को 6 सिग्मा मार्क दिया गया है।
ईमानदारी और अनुशासन सबसे अहम
इस कार्यक्रम के दौरान मुंबई डब्बावाला से जमकर सवाल पूछे गए। सिर्फ मुंबई में सिस्टम चलाने के सवाल पर रघुनाथ ने कहा कि उस शहर में अलग-अलग क्षेत्र के लोग रहते हैं और सबकी पसंद अलग है, जबकि पंजाब और हरियाणा में ऐसा नहीं है। अन्य फील्ड की तरह इस काम में भी ईमानदारी और अनुशासन बहुत जरूरी है।
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मुंबई डब्बावाला से जुड़ी खास जानकारी
1890 में मुंबई डब्बावाला की शुरुआत
-2 लाख लोगों को खाने की सप्लाई
-तीन घंटे के अंदर खाना घर से लेकर दफ्तर तक पहुंचता है
-हर रोज 60 से 70 किलोमीटर तक का सफर तय
- खाने की सप्लाई के लिए 600 रुपये महीना खर्च
- खाने की सप्लाई में साइकिल और मुंबई की लोकल ट्रेन की मदद
-काम में जुड़े प्रत्येक कर्मचारी को 9 से 10 हजार रुपये मासिक मिलता है
- साल में एक महीने का अतिरिक्त वेतन भी
-नियम तोड़ने पर एक हजार फाइन लगता
मुंबई डब्बावाला के नियम
- काम के समय कोई व्यक्ति नशा नहीं करेगा
- हमेशा सफेद टोपी पहननी होगी
- बिना पूर्व सूचना दिए कोई छुट्टी नहीं मिलेगी
- हमेशा अपने साथ आई कार्ड रखना होगा
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चंडीगढ़ मैनेजमेंट एसोसिएशन (सीएमए) की ओर से आयोजित शैपिंग यंग माइंड प्रोग्राम के तहत मुंबई डब्बावाला का स्पेशल प्रोग्राम आयोजित किया गया था। दोपहर बाद करीब 4 बजे शुरू हुए इस कार्यक्रम को सुनने के लिए युवाओं का उत्साह देखते ही बनता था। डब्बावाला टोपी में रघुनाथ और गंगाराम ने 1890 में 40 टिफिन से 2 लाख टिफिन के सफलता की कहानी को भावी मैनेजर के सामने पेश किया। गंगाराम ने अपने खास अंदाज में युवकों को बताया कि अनुशासन, ईमानदारी और काम करने का जज्बा ही डब्बा सिस्टम की सफलता का मूल मंत्र है। उन्होंने बताया कि कोडिंग सिस्टम से पूरा डब्बा सिस्टम संचालित हो रहा है। 4 नवंबर 2003 को प्रिंस चार्ल्स ने मुंबई स्टेशन पर 20 मिनट तक सिस्टम को समझा और फिर उन्हें इंग्लैंड में शाही शादी में आमंत्रित किया। इस सिस्टम को 6 सिग्मा मार्क दिया गया है।
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ईमानदारी और अनुशासन सबसे अहम
इस कार्यक्रम के दौरान मुंबई डब्बावाला से जमकर सवाल पूछे गए। सिर्फ मुंबई में सिस्टम चलाने के सवाल पर रघुनाथ ने कहा कि उस शहर में अलग-अलग क्षेत्र के लोग रहते हैं और सबकी पसंद अलग है, जबकि पंजाब और हरियाणा में ऐसा नहीं है। अन्य फील्ड की तरह इस काम में भी ईमानदारी और अनुशासन बहुत जरूरी है।
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मुंबई डब्बावाला से जुड़ी खास जानकारी
1890 में मुंबई डब्बावाला की शुरुआत
-2 लाख लोगों को खाने की सप्लाई
-तीन घंटे के अंदर खाना घर से लेकर दफ्तर तक पहुंचता है
-हर रोज 60 से 70 किलोमीटर तक का सफर तय
- खाने की सप्लाई के लिए 600 रुपये महीना खर्च
- खाने की सप्लाई में साइकिल और मुंबई की लोकल ट्रेन की मदद
-काम में जुड़े प्रत्येक कर्मचारी को 9 से 10 हजार रुपये मासिक मिलता है
- साल में एक महीने का अतिरिक्त वेतन भी
-नियम तोड़ने पर एक हजार फाइन लगता
मुंबई डब्बावाला के नियम
- काम के समय कोई व्यक्ति नशा नहीं करेगा
- हमेशा सफेद टोपी पहननी होगी
- बिना पूर्व सूचना दिए कोई छुट्टी नहीं मिलेगी
- हमेशा अपने साथ आई कार्ड रखना होगा