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छत्तीसगढ के रमेश अग्रवाल गोल्डमैन प्राइज से सम्मानित
आलोक प्रकाश पुतुल/रायपुर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
Updated Wed, 30 Apr 2014 08:06 AM IST
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पर्यावरण के सबसे बडे पुरस्कार गोल्डमैन प्राइज से सम्मानित छत्तीसगढ के रमेश अग्रवाल का कहना है कि औद्योगिक घराने 'खरीद लो, फंसा लो और हटा दो' की नीति पर काम करते हैं और व्यवस्था का बडा हिस्सा उन्हीं औद्योगिक घरानों के साथ खडा़ होता है। ऐसे में जनता की लडा़ई लड़ पाना मुश्किल है।
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भारत के रमेश अग्रवाल उन छह लोगों में शामिल हैं जिन्हें पर्यावरण के सबसे बडे पुरस्कार गोल्डमैन प्राइज से नवाजा गया है। सैन फ्रांसिस्को स्थित गोल्डमैन एनवायरमेंट फाउंडेशन यह पुरस्कार देता है।
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रमेश अग्रवाल छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में पिछले दो दशकों से औद्योगिकरण के खिलाफ और पर्यावरण के संरक्षण के लिए काम रहे हैं। रमेश अग्रवाल और उनके साथियों के आंदोलन के कारण कम से कम तीन बडे़ औद्योगिक घरानों को रायगढ में अपना उद्योग शुरू करने या उसका विस्तार करने की अनुमति नहीं मिली।
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अपने आंदोलन के दौरान रमेश अग्रवाल को कई बार जेल जाना पडा है। यहां तक कि इन पर जानलेवा हमले भी हुए हैं। लेकिन रमेश अग्रवाल की जल, जंगल और जमीन की लडाई जारी है।
'हर लडाई जरूरी'
रमेश अग्रवाल गोल्डमैन प्राइज के समारोह में शामिल होने के लिए इन दिनों सैन फ्रांसिस्को में हैं। रमेश अग्रवाल ने कहा कि यह पुरस्कार असल में छत्तीसगढ़ के उन सभी लोगों का सम्मान है, जो हक की लडाई लड रहे हैं।
रमेश कहते हैं, "इस अवार्ड से हमारा जो अभियान है, उसे बल मिलेगा। इस तरह की लडाई में जो भी साथी, जहां भी हैं, उन्हें लडने की प्रेरणा मिलेगी।"
अपने शहर रायगढ़ और छत्तीसगढ़ को लेकर रमेश अग्रवाल कहते हैं, "हमने जिस तेजी से सब कुछ नष्ट करना शुरू किया है, उसमें एक समय ऐसा आएगा, जब मनुष्य के सामने मनुष्य को ही नष्ट करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं होगा। ऐसे में हमें इस धरती को बचाने के लिए लड़ना ही होगा।"
अपनी लडा़ई को लेकर रमेश अग्रवाल का कहना है कि जेल जाने और गोली खाने के बाद भी उनके मन में कभी भी अपनी लडा़ई से पीछे हटने का मन नहीं हुआ। उल्टे इस तरह के दमन के बाद हर बार और मजबूती से लडने का बल मिला है।
वह कहते हैं,"औद्योगिक घराने 'खरीद लो, फंसा लो और हटा दो' की नीति पर काम करते हैं। पहले वह प्रलोभन देते हैं, पैसे से खरीदने की कोशिश करते हैं। इसके बाद वे सरकार के साथ मिल कर मुकदमों में फंसाने की कोशिश करते हैं। इसके बाद भी अगर कोई नहीं माने तो वे उसे रास्ते से हटाने यानी उसकी हत्या करने से भी नहीं हिचकते।"
आंदोलन के नैतिक बल
रमेश अग्रवाल और उनके जैसे लोगों के आंदोलनों के बाद भी छत्तीसगढ़ का रायगढ़ शहर अंधाधुंध औद्योगिकरण के कारण दुनिया के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में शुमार हो गया है। रमेश अग्रवाल भी मानते हैं कि वे औद्योगिक घरानों के खिलाफ लडने वाली अधिकांश लडा़इयां हारते रहे हैं। लेकिन वे हर लडाई को जरूरी मानते हैं।
अपनी लडा़इयों को लेकर वे कहते हैं, "एकदम से जीत हासिल नहीं होगी। बडी लडा़ई है ये। औद्योगिक घरानों के साथ पूरी व्यवस्था होती है, सरकार साथ होती है जबकि आंदोलन करने वाले सिर्फ आंदोलन के नैतिक बल के साथ लड रहे होते हैं। उनके पास कोई साधन नहीं होता। हम लडाई हारते हैं, लेकिन हिम्मत नहीं।"
लडाइयों की हारजीत के मुद्दे पर रमेश अग्रवाल का कहना है कि अब से पहले रायगढ की जनता अपने खिलाफ होने वाले शोषण और दमन को बर्दाश्त कर लेती थी। इन लडाइयों का ही असर है कि जनता ने अपने हक के लिए आवाज उठाना शुरु किया।
रमेश अग्रवाल कहते हैं,"आदिवासी पंचायत अधिकार से जुडे कानून, पर्यावरण के कानून और उद्योगों के कानून जान गए हैं। वे अब अपनी लडाई के लिए खडे हैं। मैं इसे ही अपनी उपलब्धि मानता हूं।"