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माओवादी का सहारा बनीं रेडियो संचालित बारूदी सुरंग

Sun, 16 Mar 2014 01:14 PM IST
Updated Sun, 16 Mar 2014 01:14 PM IST
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Moist use landmines to attack

माओवादी छापामार अब रेडियो संचालित विस्फोटकों के ज़रिये बस्तर के जंगलों में धमाके करके सुरक्षा बलों के जवानों को निशाना बना रहे हैं। हाल ही में मडगांव के पास सुरक्षा बलों ने ऐसी ही रेडियो संचालित बारूदी सुरंग को बरामद किया है। बस्तर में तैनात बम निरोधक दस्ते में शामिल विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के विस्फोटकों का इस्तेमाल माओवादियों ने इससे पहले आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के काफ़िले पर हमला करने के लिए किया था।

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हालांकि नायडू हमले में बाल-बाल बच गए थे लेकिन उनकी सुरक्षा में शामिल कई पुलिसकर्मियों को जान गंवानी पड़ी थी। कई सालों के अंतराल के बाद एक बार फिर रेडियो संचालित बारूदी सुरंगों के इस्तेमाल नें नक्सल विरोधी अभियान में शामिल सुरक्षा बलों के जवानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
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पूरे भारत में अगर सबसे ज्यादा बारूदी सुरंगें कहीं बिछी हुईं हैं तो वो सिर्फ़ छत्तीसगढ़ में ही हैं। छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड और महाराष्ट्र में माओवादियों और सुरक्षा बलों के बीच चल रहे संघर्ष में बारूदी सुरंगों के इस्तेमाल की वजह से सुरक्षा बलों को ही सबसे ज्यादा नुक़सान उठाना पड़ रहा है। इस संघर्ष में सबसे ज्यादा जवान बारूदी सुरंगों के धमाकों में ही मारे गए हैं।

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छत्तीसगढ़ में सबसे ज्यादा बारूदी सुरंग

Moist use landmines to attack

कई सालों के अंतराल के बाद एक बार फिर रेडियो संचालित बारूदी सुरंगों के इस्तेमाल नें नक्सल विरोधी अभियान में शामिल सुरक्षा बलों के जवानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। पूरे भारत में अगर सबसे ज्यादा बारूदी सुरंगें कहीं बिछी हुईं हैं तो वो सिर्फ़ छत्तीसगढ़ में ही हैं। ये कहना है सेना से सेवानिवृत हुए उन अधिकारियों का जो संविदा पर छत्तीसगढ़ पुलिस के लिए काम कर रहे हैं।

बस्तर में तैनात भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी राजेंद्र नारायण दाश कहते हैं कि बारूदी सुरंगों से निपटना ही सुरक्षा बलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। कांकेर में पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात दाश का कहना है कि अब तक ने 'छदम युद्ध में' बारूदी सुरंगों को ही अपना मुख्य हथियार बनाया है। उनका कहना है कि माओवादियों द्वारा बिछाई गई बारूदी सुरंगों का पता लगाना भी काफ़ी चुनौतीपूर्ण काम है।

बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "बारूदी सुरंगों का पता लगाने के लिए आज हमारे पास जो एकमात्र उपक्रम उपलब्ध हैं वो है 'मेटल डिटेक्टर'। इस मशीन की कुशलता की भी एक सीमा ही है जिसके आगे यह काम नहीं करती। मसलन अगर बारूदी सुरंग ज्यादा गहरे गड्ढे में लगाई गयी हो तो 'मेटल डिटेक्टर, इसका पता नहीं लगा पाते हैं।"

विशेषज्ञ की देखरेख में बनाई जाती हैं ये सुरंगें

Moist use landmines to attack

सुरक्षा बलों और राज्य पुलिस के साथ काम कर रहे बम निरोधक दस्ते के विशेषज्ञ पुराने तरीक़ों से ही बारूदी सुरंगों को पता लगाने का काम कर रहे हैं। इनमे पुलिस विभाग के 'डॉग स्क्वाड' की भी मदद ली जाती है। बम निरोधक दस्ते का नेतृत्व करने वाले सूबेदार मेजर नरेन्द्र का कहना है कि माओवादियों के लिए बारूदी सुरंगों का निर्माण किसी विशेषज्ञ की देखरेख में ही हो रहा है।

वह कहते हैं, "अगर कोई अनाड़ी बारूदी सुरंगें बना रहा होता तो एक हज़ार में से 100-200 में तो बनाते समय ही धमाका हो जाना चाहिए। मगर ऐसा नहीं हो रहा है। इसका मतलब ये है कि तकनीक में माहिर किसी इंजीनियर की देख रेख में इन्हें बनाया जा रहा है।" उनका कहना है कि जिस तकनीक का इस्तेमाल पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान में हुआ वही तकनीक यहाँ भी इस्तेमाल की जा रही है।

बम निरोधक दस्ते के विशेषज्ञों को ये भी लगता है कि माओवादी बारूदी सुरंगों के इस्तेमाल में अपनी तकनीक को विकसित कर रहे हैं। इन दस्तों में ज़्यादातर जवान और अधिकारी सेना से सेवानिवृत हुए हैं और छत्तीसगढ़ पुलिस ने उन्हें संविदा पर बहाल किया है। उनका कहना है कि भारत प्रशासित कश्मीर में तो महीनों में कभी बारूदी सुरंगें बरामद हुआ करती थीं जबकि छत्तीसगढ़ में लगभग रोज़ ही बरामद हो रही है। पलटन कमांडर पी पी सिंह कहते हैं कि छत्तीसगढ़ उन्हें कश्मीर से ज्यादा ख़तरनाक इलाक़ा लगता है।

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