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हाईकोर्ट का फैसला: सेवानिवृत्त पंचायत कर्मचारियों की पेंशन याचिकाएं खारिज
Tue, 06 Oct 2026 03:23 PM IST
अमन कोशले
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
Published by: अमन कोशले
Updated Tue, 06 Oct 2026 03:23 PM IST
सार
उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति बीडी गुरु की एकल पीठ ने पंचायत विभाग के सेवानिवृत्त कर्मचारियों की पेंशन संबंधी दावेदारी को सिरे से नकार दिया है। अदालत ने पंचायतों के पूर्व कर्मियों की ओर से दायर 24 याचिकाओं को खारिज करते हुए महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति बीडी गुरु की एकल पीठ ने पंचायत विभाग के सेवानिवृत्त कर्मचारियों की पेंशन संबंधी दावेदारी को सिरे से नकार दिया है। अदालत ने पंचायतों के पूर्व कर्मियों की ओर से दायर 24 याचिकाओं को खारिज करते हुए महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि पंचायत विभाग के अंतर्गत काम करने वाले कर्मचारी राज्य सरकार के नियमित शासकीय कर्मचारी नहीं हैं। इसके अलावा उनके लिए लागू सेवा शर्तों एवं नियमों में पेंशन भुगतान का कोई वैधानिक प्रावधान शामिल नहीं है। ऐसे में सेवानिवृत्ति के पश्चात पेंशन पाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं बनता है।
उर्मिला पाणिग्रही सहित विभिन्न जिलों के सेवानिवृत्त पंचायत कर्मचारियों ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि उन्होंने पंचायत विभाग के भीतर लंबी अवधि तक अपनी सेवाएं दी हैं। इसके बावजूद सेवानिवृत्त होने के बाद उन्हें पेंशन के लाभ से वंचित रखा जा रहा है।
याचिकाओं में दी गई दलीलें
याचिकाकर्ताओं ने अपनी अर्जी में छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम की धारा 131 का मुख्य रूप से उल्लेख किया था। उन्होंने दावा किया कि इस धारा के तहत पुराने कर्मचारियों के वेतन, भत्ते और सेवानिवृत्ति से जुड़े सभी लाभों को सुरक्षित रखने का प्रावधान है। इसलिए उन्हें भी पेंशन योजना के दायरे में लाया जाना चाहिए। इसके साथ ही याचिकाकर्ताओं ने राज्य के दो अलग-अलग क्षेत्रों का उदाहरण भी अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया।
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उन्होंने अदालत को बताया कि बालोद जिले की गुंडरदेही जनपद पंचायत और बिलासपुर जिले की तखतपुर जनपद पंचायत में पदस्थ कुछ कर्मचारियों को नियमित रूप से पेंशन दी जा रही है। याचिकाकर्ताओं ने समानता के अधिकार का हवाला देते हुए मांग रखी कि जब समान विभाग के अन्य कर्मियों को यह सुविधा मिल रही है, तो उन्हें भी पेंशन योजना का लाभ मिलना चाहिए।
राज्य सरकार का जवाब और रुख
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय के समक्ष अपना पक्ष रखा। सरकार ने बताया कि गुंडरदेही जनपद पंचायत के तीन और तखतपुर जनपद पंचायत के तीन कर्मचारियों को दिया जा रहा भुगतान किसी राज्यस्तरीय वैधानिक पेंशन योजना का हिस्सा नहीं है। इन छह कर्मियों को यह राशि संबंधित जनपद पंचायतों द्वारा स्थानीय स्तर पर तैयार किए गए विशेष पेंशन कोष से दी जा रही है।
राज्य सरकार ने यह भी जानकारी दी कि इस प्रकार के अमान्य भुगतान को लेकर जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध अगस्त 2026 में कारण बताओ नोटिस जारी किए जा चुके हैं। उच्च न्यायालय ने सरकार के इन तथ्यों पर विचार करते हुए माना कि किसी जनपद पंचायत द्वारा अपने स्तर पर गैर-कानूनी रूप से पेंशन देने से अन्य कर्मचारियों के लिए कोई कानूनी अधिकार पैदा नहीं हो जाता।
याचिकाएं खारिज करने के कानूनी आधार
उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पंचायत राज अधिनियम की धारा 131 केवल पूर्व से चले आ रहे लाभों को सुरक्षा प्रदान करती है। यह धारा किसी ऐसे नए पेंशन अधिकार को जन्म नहीं देती, जो सेवा शर्तों के अंतर्गत पहले से मौजूद न हो। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति के समय उनके सेवानिवृत्ति लाभ केवल अंशदायी भविष्य निधि योजना तक ही सीमित थे। पूरी सेवा अवधि के दौरान ऐसा कोई नियम परिवर्तन नहीं हुआ, जिससे उन्हें पेंशन का अधिकार प्राप्त हो सके।
अदालत ने छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1976 के नियम 2(2)(घ) का उल्लेख करते हुए बताया कि अंशदायी भविष्य निधि का लाभ लेने वाले कर्मचारियों पर शासकीय पेंशन नियम लागू नहीं होते। इसके अतिरिक्त छत्तीसगढ़ पंचायत सेवा (भर्ती एवं सेवा की सामान्य शर्तें) नियम, 1999 में भी पेंशन का कोई प्रावधान नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न फैसलों का उल्लेख करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि न्यायपालिका कानून बनाने या सरकार को किसी विशेष तरीके से कानून बनाने का निर्देश नहीं दे सकती।
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उर्मिला पाणिग्रही सहित विभिन्न जिलों के सेवानिवृत्त पंचायत कर्मचारियों ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि उन्होंने पंचायत विभाग के भीतर लंबी अवधि तक अपनी सेवाएं दी हैं। इसके बावजूद सेवानिवृत्त होने के बाद उन्हें पेंशन के लाभ से वंचित रखा जा रहा है।
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याचिकाओं में दी गई दलीलें
याचिकाकर्ताओं ने अपनी अर्जी में छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम की धारा 131 का मुख्य रूप से उल्लेख किया था। उन्होंने दावा किया कि इस धारा के तहत पुराने कर्मचारियों के वेतन, भत्ते और सेवानिवृत्ति से जुड़े सभी लाभों को सुरक्षित रखने का प्रावधान है। इसलिए उन्हें भी पेंशन योजना के दायरे में लाया जाना चाहिए। इसके साथ ही याचिकाकर्ताओं ने राज्य के दो अलग-अलग क्षेत्रों का उदाहरण भी अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया।
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उन्होंने अदालत को बताया कि बालोद जिले की गुंडरदेही जनपद पंचायत और बिलासपुर जिले की तखतपुर जनपद पंचायत में पदस्थ कुछ कर्मचारियों को नियमित रूप से पेंशन दी जा रही है। याचिकाकर्ताओं ने समानता के अधिकार का हवाला देते हुए मांग रखी कि जब समान विभाग के अन्य कर्मियों को यह सुविधा मिल रही है, तो उन्हें भी पेंशन योजना का लाभ मिलना चाहिए।
राज्य सरकार का जवाब और रुख
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय के समक्ष अपना पक्ष रखा। सरकार ने बताया कि गुंडरदेही जनपद पंचायत के तीन और तखतपुर जनपद पंचायत के तीन कर्मचारियों को दिया जा रहा भुगतान किसी राज्यस्तरीय वैधानिक पेंशन योजना का हिस्सा नहीं है। इन छह कर्मियों को यह राशि संबंधित जनपद पंचायतों द्वारा स्थानीय स्तर पर तैयार किए गए विशेष पेंशन कोष से दी जा रही है।
राज्य सरकार ने यह भी जानकारी दी कि इस प्रकार के अमान्य भुगतान को लेकर जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध अगस्त 2026 में कारण बताओ नोटिस जारी किए जा चुके हैं। उच्च न्यायालय ने सरकार के इन तथ्यों पर विचार करते हुए माना कि किसी जनपद पंचायत द्वारा अपने स्तर पर गैर-कानूनी रूप से पेंशन देने से अन्य कर्मचारियों के लिए कोई कानूनी अधिकार पैदा नहीं हो जाता।
याचिकाएं खारिज करने के कानूनी आधार
उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पंचायत राज अधिनियम की धारा 131 केवल पूर्व से चले आ रहे लाभों को सुरक्षा प्रदान करती है। यह धारा किसी ऐसे नए पेंशन अधिकार को जन्म नहीं देती, जो सेवा शर्तों के अंतर्गत पहले से मौजूद न हो। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति के समय उनके सेवानिवृत्ति लाभ केवल अंशदायी भविष्य निधि योजना तक ही सीमित थे। पूरी सेवा अवधि के दौरान ऐसा कोई नियम परिवर्तन नहीं हुआ, जिससे उन्हें पेंशन का अधिकार प्राप्त हो सके।
अदालत ने छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1976 के नियम 2(2)(घ) का उल्लेख करते हुए बताया कि अंशदायी भविष्य निधि का लाभ लेने वाले कर्मचारियों पर शासकीय पेंशन नियम लागू नहीं होते। इसके अतिरिक्त छत्तीसगढ़ पंचायत सेवा (भर्ती एवं सेवा की सामान्य शर्तें) नियम, 1999 में भी पेंशन का कोई प्रावधान नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न फैसलों का उल्लेख करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि न्यायपालिका कानून बनाने या सरकार को किसी विशेष तरीके से कानून बनाने का निर्देश नहीं दे सकती।