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Chhattisgarh: विधानसभा चुनाव के पहले निगम-मंडलों का लॉलीपाप, कांग्रेस ने 150 कार्यकर्ताओं को सौंपे पद

Mon, 31 Oct 2022 07:33 AM IST
अनुराग सक्सेना रवि भोई, अमर उजाला, रायपुर
रवि भोई, अमर उजाला, रायपुर Published by: अनुराग सक्सेना Updated Mon, 31 Oct 2022 07:33 AM IST
सार

कांग्रेस सरकार ने उर्दू अकादमी, मदरसा बोर्ड, सिंधी अकादमी और संस्कृत विद्या मंडल में अध्यक्ष की नियुक्ति कर अल्पसंख्यक समुदाय को साधने की कोशिश की है। सरकार ने पार्टी के पुराने और जमीनी नेताओं के साथ जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं को भी पद बांटे हैं।

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Chhattisgarh Congress appoints 150 workers on posts ahead of assembly elections
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

कांग्रेस सरकार ने विधानसभा चुनाव के एक साल पहले शनिवार को डेढ़ सौ से अधिक कांग्रेस नेता और कार्यकर्ताओं को नियुक्ति दी है। कुछ को रेवड़ी बांटी है, तो कुछ को झुनझुना पकड़ाया है। निगम-मंडलों में नियुक्ति की पेंच करीब दो साल से फंसी थी। कभी सत्ता के लिए ढाई-ढाई साल की लड़ाई का साया छाया रहा, तो कभी चुनाव के चलते टलता रहा।

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आखिरी किस्त में एक दर्जन निगम-मंडल और आयोग में अध्यक्षों के साथ कई उपक्रमों में उपाध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति की गई है, फिर भी शराब सप्लाई से जुड़े मलाईदार निगम वेबरेज कार्पोरेशन और छत्तीसगढ़ राज्य औद्योगिक विकास निगम का अध्यक्ष बनने का सौभाग्य किसी कांग्रेस नेता को नहीं मिला। इन दोनों निगमों के अध्यक्ष फिलहाल मंत्री कवासी लखमा हैं। कुछ नेताओं को एडजस्ट करने के लिए नया बोर्ड बना दिया गया। मसलन जीव-जंतु कल्याण बोर्ड, छत्तीसगढ़ रजक कल्याण बोर्ड और सिरपुर विकास प्राधिकरण पहली बार अस्तित्व में आया है।

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वैसे निगम-मंडल और आयोगों में नई नियुक्ति में हर तबके और वर्ग को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की गई है, कांग्रेस सरकार ने अलग-अलग समाज को खुश करने के लिए बोर्ड बना दिया है और उनमें नियुक्तियां की हैं। जैसे लौह शिल्पकार बोर्ड, चर्म शिल्पकार बोर्ड, केश शिल्प बोर्ड और रजक कल्याण बोर्ड। लेकिन वरिष्ठता का ख्याल नहीं रखा गया है। खुश करने के लिए कहीं न कहीं एडजस्ट किया गया है।

संयुक्त मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह के मंत्रिमंडल में मंत्री रहे आदिवासी नेता शंकर सोढ़ी को अपैक्स बैंक का सदस्य बनाकर झुनझुना थमा दिया गया है। शंकर सोढ़ी ने 2013 में कांग्रेस से बगावत कर कोंडागांव विधानसभा सीट से वर्तमान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम के खिलाफ चुनाव लड़ा था। तब मोहन मरकाम चुनाव जीतने में सफल रहे। कोंडागांव से पहले शंकर सोढ़ी विधायक रह चुके हैं।  लेकिन मोहन मरकाम और शंकर सोढ़ी में छत्तीस का आंकड़ा बताया जाता है। माना जा रहा है कि अपैक्स बैंक का सदस्य ही सही, पद मिलने से शंकर सोढ़ी का कद तो कुछ बढ़ा ही। इससे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम के सामने चुनौती खड़ी होगी।

केपी खांडे को राज्य अनुसूचित जाति आयोग का अध्यक्ष बनाए जाने को लेकर भाजपा के आदिवासी नेताओं ने बवाल खड़ा कर दिया है। भाजपा के आदिवासी नेता और प्रदेश महामंत्री केदार कश्यप का कहना है कि 32 फीसदी आदिवासी आरक्षण के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका लगाने वाले को ही कांग्रेस सरकार ने राज्य अनुसूचित जाति आयोग का अध्यक्ष बनाकर आदिवासी समाज को चिढ़ाने का काम किया है। केपी खांडे को मंत्री शिवकुमार डहरिया का क़रीबी माना जाता है। कहते हैं खांडे कांग्रेस से ज्यादा अनुसूचित जाति समाज में सक्रिय हैं। अनुसूचित जाति आयोग में अध्यक्ष पद पर खांडे की नियुक्ति से सारंगढ़ की पूर्व विधायक और वर्तमान में इस आयोग की उपाध्यक्ष पदमा मनहर को झटका लग गया। पदमा मनहर को उम्मीद थी कि उनका प्रमोशन हो जाएगा, लेकिन सरकार और कांग्रेस पार्टी ने उन्हें ताज नहीं दिया।

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राज्य में अब तक औषधि पादप बोर्ड था। अब जीव-जंतु कल्याण बोर्ड भी बन गया। जीव-जंतु कल्याण बोर्ड का अध्यक्ष बलौदाबाजार के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता विद्याभूषण शुक्ला को बनाया गया है। वहीं औषधि पादप बोर्ड के उपाध्यक्ष पद से कांग्रेस के कद्दावर नेता स्व. महेंद्र कर्मा के बेटे छविंद्र कर्मा को हटाकर रायपुर जिले के गुरु खुशवंत गोसाई को उपाध्यक्ष बनाया गया है। स्व. महेंद्र कर्मा की पत्नी देवती कर्मा अभी दंतेवाड़ा से विधायक हैं।

कांग्रेस सरकार ने उर्दू अकादमी, मदरसा बोर्ड, सिंधी अकादमी और संस्कृत विद्या मंडल में अध्यक्ष की नियुक्ति कर अल्पसंख्यक समुदाय को साधने की कोशिश की है। सरकार ने पार्टी के पुराने और जमीनी नेताओं के साथ जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं को भी पद बांटे हैं। जरूर योग्यता की जगह निष्ठा को महत्व दिया गया है। निगम-मंडलों में नियुक्ति में गुटीय संतुलन का भी ध्यान रखा गया है।

लंबे इंतजार के बाद जारी निगम-मंडलों की इस सूची से कई गदगद हैं, तो कई मायूस हैं। लंबे इंतजार के बाद पद न मिलने से मन को तसल्ली भी दे रहे हैं और तर्क दे रहे हैं कि एक साल के लिए बनते तो क्या कर लेते? क्योंकि चुनाव की घोषणा के छह महीने पहले ही माहौल चुनावी हो जाता है। कांग्रेस सरकार ने 2023 के चुनाव में लाभ लेने के लिए सभी वर्ग-समाज को साधने और उपकृत करने का प्रयास किया है। अब देखते हैं आने वाले दिनों में पार्टी के लोग इसे किस रूप में लेते हैं और चुनाव में कांग्रेस पार्टी को कितना फायदा होता है।

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