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Balod: मांझी जिसकी सेना है आज भी एक्टिव, इन्हें शासकीय तंत्र की जरूरत नहीं, इनका अपना है शासन

Sat, 07 Dec 2024 02:04 PM IST
Digvijay Singh अमर उजाला नेटवर्क, बालोद
अमर उजाला नेटवर्क, बालोद Published by: Digvijay Singh Updated Sat, 07 Dec 2024 02:04 PM IST
सार

जब भी भारतवर्ष में मांझी उपनाम का जिक्र होता है तो उनकी यादें ज़हन में उतरती है जिन्होंने दूसरों के लिए सर्वस्व न्यौछावन किया। दशरथ राम मांझी जिसने अपनी पत्नी के प्रेम में पहाड़ काटकर रास्ता बना दिया।

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Manjhi whose army is still active does not need government machinery in Balod
आज भी एक्टिव है मांझी की सेना - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जब भी भारतवर्ष में मांझी उपनाम का जिक्र होता है तो उनकी यादें ज़हन में उतरती है जिन्होंने दूसरों के लिए सर्वस्व न्यौछावन किया। दशरथ राम मांझी जिसने अपनी पत्नी के प्रेम में पहाड़ काटकर रास्ता बना दिया। जिसने आदिवासी समाज के लिए शिक्षा का मार्ग चुना अंग्रेजों के शासन काल में आजादी का प्रस्ताव रखा और बनाई अपनी विशाल सेना।

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छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में घने जंगलों के बीच बसा एक अनजाना-सा गांव हर साल तीन दिनों के लिए किसी गहमागहमी भरे सैन्य शिविर में तब्दील हो जाता है।  खाकी वर्दीधारी सैकड़ों आदिवासी पुरुष-महिलाएं पहरा देने के अंदाज में गांव के चारों तरफ घूमते नजर आते हैं। कुछ अस्थायी दुकानें भी सज जाती हैं जहां सस्ते दामों पर सैन्य सामग्री—बैग, वर्दी, जूते, बेल्ट, रैंक और प्रतीक चिन्ह आदि—मिलते हैं। हां, हथियारों के नाम पर सैनिकों के पास कुछ खास नहीं होता उनके पास सबसे बड़ा हथियार डंडा ही होता है। इस गांव का नाम बाघमार और यहां लगता है मेला कंगला मांझी की स्मृति में वो मांझी जिसने रांची के अधिवेशन में भारत गोंडवाना नामक देश का प्रस्ताव अंग्रेजों के पास रखा और संविधान बनाने में भी मदद की।  
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आदिवासियों के लिए जल-जंगल-जमीन के संरक्षण और अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद करने के लिए आजाद हिंद फौज के संस्थापक सुभाष चंद्र बोस और भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में गठित मांझी सरकार आज भी आदिवासी परंपरा और समाज के उत्थान के लिए काम कर रही है। 1896 में कांकेर (बस्तर) के तेलावट में जन्मे हीरा सिंह देव मांझी ने 1905 में 9 साल की उम्र से ही अंग्रेजी हुकूमत से लड़ना शुरू कर दिया था। मांझी ने 1910 में आदिवासी समुदाय के साथ अखिल भारतीय मददगार आदिमुलवासीजन संगठन बनाकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया आज भी वहीं जज्बा उनके अंदर कायम है इस सरकार के सिपाही बालोद में दिसंबर में 5, 6 और 7 तारीख को श्रद्धांजलि देने देश के कोने कोने से पहुंचते हैं। लोग दिसंबर की सर्द रातों को पेड़ के नीचे काटतें हैं और 3 दिन के इस स्मृति दिवस समारोह में चिंतन होता है हर एक विषयों पर जो जल जंगल जमीन और शिक्षा समाज से जुड़ी हुई हो।
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1910 में रखी गई नींव
जिस मांझी सरकार की सेना पूरे देश भर में फैली हुई है उसकी नींव 1910 में उसकी नींव रखी गई और 1951 से बैच बिल्ला बनना शुरू हुआ था जिसके बाद 1956 में राष्ट्रीय ध्वज से सम्मानित किया गया संस्था और कांगला राम मांझी जी को तब से यह संस्था काम कर रही है आजादी की लड़ाई लड़ी, संविधान निर्माण में भी योगदान रहा है भूमकाल आंदोलन से शुरुआत ही मूल रूप से इसकी शुरुआत हुई4 इस संस्था ने रांची 1915 अधिवेशन से अंग्रेजों से आजाद करने की मांग और भारत गोंडवाना राष्ट्र बनाने की मांग रखी आजादी के इतने वर्षों के बाद भी देश में आदिवासियों के समक्ष पेश आने वाली चुनौतियां बदस्तूर बरकरार हैं, और शायद यही वजह है कि आज दशकों बाद भी इस सेना की प्रासंगिकता बनी हुई है


जानिए क्या कहती है राजमाता 
कंगला मांझी की पत्नी और सरकार की अध्यक्ष 'राजमाता' फुलवा देवी कांगे कहती हैं, आदिवासी शिक्षा क्षेत्र में पिछड़े हैं और शोषण के शिकार होते रहे हैं यह संगठन उन्हें उनके अधिकारों के बारे में जागरूक करने के अलावा सशक्तिकरण में शिक्षा की अहमियत को समझाकर स्कूल जाने के लिए प्रेरित करने की दिशा में काम करता है। उनके बेटे कुंभ देव कांगे सरकार के उपाध्यक्ष हैं आज भी हमारी सेना इसी ओर काम कर रही है और जहां कहीं भी हो ये हमेशा हितों की रक्षा के लिए काम करते हैं और इनकी बातों की हम सरकार तक भी पहुंचाते हैं।


 
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