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संदेह के घेरे में 300 स्कूल : कहीं खतरे में तो नहीं बच्चे का भविष्य
ब्यूरो/अमर उजाला, फरीदाबाद
Updated Thu, 07 Apr 2016 11:25 AM IST
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हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड से संबंधित निजी स्कूलों में नए सत्र की शुरुआत हो गई है। इसके साथ ही दाखिला प्रक्रिया ने भी जोर पकड़ लिया है। ऐसे में बच्चों को दाखिला दिलाने से पहले अभिभावक स्कूल की मान्यता को लेकर पूरी तरह से पड़ताल कर लें। दरअसल, फरीदाबाद और गुड़गांव के करीब 300 स्कूल मान्यता को लेकर संदेह के घेरे में हैं।
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ऐसे स्कूलों की कमी नहीं है, जो बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। प्रदेश में करीब दो हजार स्कूल ऐसे हैं जो मान्यता की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। फरीदाबाद जिले में ऐसे स्कूलों की संख्या तकरीबन 150 है, जबकि इतनी ही संख्या गुड़गांव में भी है।
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वर्ष 2003 से स्कूलों को हर साल अस्थायी मान्यता देकर दाखिला प्रक्रिया शुरू करने की मंजूरी दी जाती रही है लेकिन इस बार ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया है। दरअसल, पिछले साल सरकार ने ऐसे स्कूलों पर सख्ती बरतते हुए सभी जिलों के शिक्षा अधिकारियों से रिपोर्ट तलब की थी।
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मानक पूरे करने वाले स्कूलों को मान्यता के लिए आवेदन का मौका दिया गया था। सूत्रों के मुताबिक डेढ़ सौ में से 39 स्कूलों ने आवेदन भी किया था। बाकायदा, शिक्षा निदेशालय ने एक कमेटी का गठन भी किया था जिसे स्कूलों का इंस्पेक्शन करना था।
मान्यता के मानक पूरा न करने वाले स्कूलों को एक अप्रैल तक बंद करने का दावा भी किया गया था। हालांकि, अब तक न तो निरीक्षण हो पाया है और न ही स्कूलों को अस्थायी मान्यता दी गई है। इसके बाद भी स्कूलों में दाखिले का दौर शुरू हो गया है।
बीच सत्र में अगर सरकार ने कोई कार्रवाई कर दी तो हजारों बच्चों के भविष्य पर तलवार लटक जाएगी। पहली से आठवीं कक्षा तक स्थायी मान्यता लेकर 9वीं और 10वीं कक्षा के लिए अस्थायी मान्यता ली जा रही थी। ऐसे में अगर बीच सत्र में कोई कार्रवाई होती है तो इसका असर लाखों बच्चों पर पड़ेगा।
कई बार दिया गया मौका
मान्यता के मापदंड पूरा करने के लिए स्कूलों को मौका दिया जाता रहा है, लेकिन वे अस्थायी मान्यता को लेकर बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करते रहे। 2007 तक मान्यता हासिल न कर पाने वाले स्कूलों को साल 2011 में मौका दिया था। जिला उपायुक्त की अध्यक्षता में कमेटी भी गठित हुई थी। बच्चों के भविष्य को ध्यान में रख नियमों में छूट भी दी गई, लेकिन फिर भी स्कूल मान्यता के मानदंड पूरे नहीं कर पाए।
कैसे खुली थी पोल
साल 2009 की सेमेस्टर परीक्षाओं से पहले निदेशालय ने जिले के ऐसे 11 स्कूलों की पहचान की थी, जिनकी मान्यता संबंधित रिकॉर्ड निदेशालय के पास था ही नहीं। इसके बाद स्कूलों की मान्यताओं की जांच के लिए निदेशालय ने कमेटी गठित की थी। जांच में करीब 50 स्कूल संदेह के घेरे में आ गए थे। धीरे-धीरे यह आंकड़ा बढ़ता गया।
क्या-क्या हैं कमियां
.तय मानक से कम जमीन पर बने हुए हैं स्कूल
.रिकॉर्ड में पता कुछ और स्कूल कहीं और है
.कुछ स्कूल घरों की इमारत में चलाए जा रहे हैं
.कमरों का साइज भी नहीं है मानकों के अनुसार
.एक स्कूल की मान्यता पर चल रहे हैं दो स्कूल
क्या-क्या बरतें सावधानी
. दाखिले दिलाने से पहले स्कूल के बारे में सही जानकारी लें
. मान्यता की जानकारी के लिए जिला शिक्षा विभाग से करें संपर्क
. स्कूल में पढ़ रहे पुराने छात्रों से भी लिया जा सकता है स्कूल का फीडबैक
. दाखिला प्रक्रिया के दौरान लुभावने ऑफर देने वाले स्कूलों में हो सकता है खोट
. हो सके तो दाखिले के समय स्कूल के मान्यता प्रमाण पत्र पर भी डालें नजर
क्या कहते हैं लोग
शिक्षा को व्यवसाय बनाने वाले स्कूल हर साल बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करते हैं। सरकार को सख्त कदम उठाने होंगे, लेकिन सत्र शुरू होने से पहले कोई कार्रवाई की जाए ताकि बच्चों का भविष्य प्रभावित न हो। -एनएल जांगिड़, अध्यक्ष, फरीदाबाद अभिभावक एकता मंच
फरीदाबाद-गुड़गांव के 300 स्कूलों पर हमेशा से मान्यता को लेकर खतरा मंडराता रहा है। सरकार कोई भी फैसला समय से करे। बेहतर होगा कि पुरानी शर्तों के आधार पर ही स्कूलों को मान्यता दे जाए। - रमेश डागर, प्रदेशाध्यक्ष, प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन
स्कूलों की मान्यता को लेकर अभी तक कोई दिशा-निर्देश नहीं आए हैं। शिक्षा निदेशालय की तरफ से जो आदेश जारी किए जाएंगे। उनका पालन किया जाएगा। - सतेंद्र कौर वर्मा, जिला शिक्षा अधिकारी
सत्र शुरू पर नहीं मिल रहीं किताबें
शिक्षा विभाग की लापरवाही बच्चों पर भारी पड़ रही है। सरकारी स्कूलों का नया सत्र शुरू हुए एक सप्ताह होने वाला है। लेकिन अब तक स्कूलों में विद्यार्थियों को किताबें नहीं मिल पाई हैं। अब विभाग ने अपनी कमियां छुपाने के लिए क्लास रेडिनेस प्रोग्राम (सीआरपी) चलाया है।
सरकारी स्कूलों में बच्चों को किताबों के अलावा ड्रेस और पुस्तक भी मुफ्त दी जाती है। सरकारी स्कूलों में एक अप्रैल से नया शैक्षणिक सत्र शुरू हो चुका है। लेकिन एक सप्ताह बाद भी बच्चों को किताबें न मिलने से शिक्षकों व अभिभावकों में नाराजगी है।
हालांकि, सीआरपी को शिक्षक भी महज खानापूर्ति मान रहे हैं। शिक्षक नेता राजसिंह का कहना है कि विभाग ने किताबों की कमी को छिपाने के लिए ही यह प्रोग्राम चलाया है। शैक्षणिक सत्र शुरू होने से पहले ही स्कूलों में किताबें पहुंचाने का काम होना चाहिए, ताकि विद्यार्थियों की पढ़ाई का एक दिन भी खराब न हो।
जिला मौलिक शिक्षा अधिकारी रामकुमार फलसवाल का कहना है कि तकनीकी खामियों के कारण पुस्तकें नहीं पहुंच पाई हैं। अगले सप्ताह तक सभी किताबें प्राप्त हो जाएंगी और छात्रों को आवंटित कर दी जाएंगी।