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जब ब्याज दर बदलती है तो Home Loan की EMI का क्या होता है?
सार
ईएमआई के दो घटक हैं - मूलधन और ब्याज। ईएमआई का एक हिस्सा ब्याज की ओर जाता है, जबकि शेष राशि कर्ज की राशि के सामने समायोजित होती है। ईएमआई को इस तरह से रखा जाता है कि लोन पर ब्याज का भुगतान करते हुए सहमत अवधि के दौरान कर्ज पूरी तरह से चुक जाता है।
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होम लोन
- फोटो : ani
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विस्तार
घर का सपना तो होम लोन लेकर पूरा हो गया, लेकिन EMI चुकाने की लंबी मुसीबत गले में फंस गई। ब्याज दरों में बदलाव के दौर में होम लोन की ईएमआई पर क्या असर पड़ता है, इसके बारे में बता रहे हैं टैक्स और इनवेस्टमेंट एक्सपर्ट बलवंत जैन।
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ब्याज दर चक्र और ईएमआई
ईएमआई के दो घटक हैं - मूलधन और ब्याज। ईएमआई का एक हिस्सा ब्याज की ओर जाता है, जबकि शेष राशि कर्ज की राशि के सामने समायोजित होती है। ईएमआई को इस तरह से रखा जाता है कि लोन पर ब्याज का भुगतान करते हुए सहमत अवधि के दौरान कर्ज पूरी तरह से चुक जाता है। यदि लोन फ्लोटिंग ब्याज दर के तहत लिया गया हो तो ब्याज दर चक्र में परिवर्तन के कारण इसमें कुछ बदलाव हो सकते हैं। यदि लोन पूरी अवधि के लिए फिक्सड ब्याज दर पर लिया गया है, तो ब्याज दर चक्र में कोई बदलाव कर्ज के भुग्तान की अवधी प्रभावित नहीं करता है।
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अगर लोन फ्लोटिंग ब्याज दर के तहत लिया गया है तो ऋणदाता आपके होम लोन की ब्याज दर को ब्याज दर चक्र में परिवर्तन के साथ समायोजित करता है। जब ब्याज दर बदलती है, तो इसका असर ईएमआई और पुर्ण भुगतान की अवधि दोनों पर पड़ता है। ईएमआई की राशि बदलेगी या लोन की अवधि बदलेगी, यह मुख्य रूप से आपके द्वारा ऋणदाता के साथ किए गए लोन समझौते की शर्तों और नियमों पर निर्भर करता है। जब ब्याज दर कम होती है, आमतौर पर ऋणदाता ईएमआई की राशि नहीं बदलते और परिणामस्वरूप लोन की अवधि कम हो जाती है क्योंकि अधिक राशि लोन की चुकौती की ओर समायोजित होती है।
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इसके विपरीत जब ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो बैंक आमतौर पर ईएमआई की राशि को वही रखते हैं लेकिन लोन की चुकौती अवधि को बढ़ा देते हैं। हालांकि, कुछ परिस्थितियों में ऋणदाता लोन की अवधि बढ़ाने के लिए सहमत नहीं होता और इसके बजाय ईएमआई की राशि बढ़ाने पर जोर देता है। यह आमतौर पर दो स्थितियों में होता है - पहला, जब ब्याज में वृद्धि इतनी अधिक होती है कि मौजूदा ईएमआई राशि बकाया राशि पर ब्याज के लिए पर्याप्त नहीं होती। इस मामले में, बैंक के पास ईएमआई राशि को ऊपर की तरफ बढ़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता क्योकि यदि बढ़ी हुई ब्याज दर लंबे समय तक बनी रहती है तो लोन कभी पूरी तरह से चुकाया नहीं जाएगा। दूसरी स्थिति तब उत्पन्न होती है जब ईएमआई राशि को बनाए रखने पर चुकौती अवधि उधारकर्ता की सेवानिवृत्ति की आयु से आगे बढ़ जाती है। ऋणदाता स्पष्ट रूप से चाहता है कि उधारकर्ता जब तक कमाई कर रहा हो, तब तक पूरा लोन वसूल लिया जाए। दोनों ही स्थितियों में, ग्राहक खुद को तंग स्थिति में पाता है। यह महत्वपूर्ण है कि आप स्थिति का ठीक से विश्लेषण करें ताकि एक व्यवहारिक समाधान निकाला जा सके। ऐसी स्थिति में एक विकल्प यह है कि यदि आपके पास कुछ अतिरिक्त नकदी उपलब्ध हो तो एकमुश्त राशि का भुगतान करें।
ईएमआई और आयकर
जहां तक आयकर कानूनों का सवाल है, यह ईएमआई के दोनों हिस्सो यानी मूलधन पुनर्भुगतान और ब्याज भुगतान के लिए कर लाभ की अनुमति देता है। मूलधन घटक के लिए कर लाभ धारा 80सी के तहत 1।50 लाख रुपये तक मिलता है, जिसमें पीपीएफ, एलआईपी, एनएससी और पीएफ आदि जैसे अन्य आइटम भी शामिल हैं। धारा 80सी के तहत कटौती का लाभ उठाने के लिए, लोन को निर्दिष्ट संस्थाओं जैसे बैंकों, आवास वित्त कंपनियों, केंद्र सरकार और राज्य सरकार के निकायों आदि से लिया जाना चाहिए। कृपया ध्यान दें कि यदि आप नई कर व्यवस्था का विकल्प चुनते हैं तो मूलधन चुकौती के संबंध में कोई कटौती उपलब्ध नहीं है।
जहां तक ईएमआई के ब्याज वाले हिस्से का सवाल है, ब्याज भुगतान के लिए लाभ धारा 24 (बी) के तहत उपलब्ध है। यदि मकान का उपयोग उधारकर्ता अपने आवासीय उद्देश्य के लिए करता है, तो ऐसी कटौती के लिए 2।00 लाख रुपये की समग्र सीमा है परंतु यह लाभ आपको पुरानी कर व्यवस्था मे ही उपलब्ध है। यदि लोन उस मकान के लिए लिया गया है जिसे आपने किराए पर दिया है, तो पुरानी कर व्यवस्था के तहत आप उस वर्ष के लिए देय पूरे ब्याज के लिए कटौती का दावा कर सकते हैं पर सिर्फ दो लाख तक के नुकसान को दूसरे स्रोत के सामने एड्जस्ट कर सकते हैं। नई कर व्यवस्था मे ब्याज की कटौति किराये की आय तक ही सिमित रहेगी।
ब्याज के लिए कटौती का लाभ केवल तभी उपलब्ध है जब मकान पूरा हो चुका हो और आपके कब्जे में हो। यदि ब्याज का भुगतान एक निर्माणाधीन संपत्ति के लिए लिए गए लोन के लिए किया जाता है, तो संपत्ति पूरी होने तक आपको कोई कटौती नहीं मिलेगी। संपत्ति के पूर्ण होने के वर्ष से पहले के वर्षों से चुकाए गए ब्याज की कटौति संपत्ति के पूर्ण होने के वर्ष से शुरू होकर पांच समान किस्तों में मिलेगी।
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