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जहां सरकार नाकाम, वहां स्वास्थ्य सेवा का हो निजीकरण-अमिताभ कांत
अतुल सिन्हा
Updated Mon, 21 Aug 2017 02:13 PM IST
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नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत मानते हैं कि देश में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में काम करने की बहुत अधिक गुंजाइश है। वह गोरखपुर में बड़ी संख्या में हुई बच्चों की मौत को सरकारी उपेक्षा का नतीजा मानते हैं। उनका कहना है कि अगर सरकार लोगों को उचित सुविधा मुहैय्या करा पाने में नाकाम रही है, तो इस काम को प्राइवेट सेक्टर के हवाले कर देना चाहिए।
अमर उजाला के साथ विशेष बातचीत में उन्होंने तमाम क्षेत्रों में हो रहे बदलावों के साथ-साथ हर सेक्टर की स्थिति का बारीकी से विश्लेषण किया। पेश हैं अमिताभ कांत के साथ अतुल सिन्हा की बातचीत के मुख्य अंश :
प्रश्न - देश की स्वास्थ्य सेवाओं की हालात के लिए गोरखपुर की घटना सबसे ताजा मिसाल है। आपकी नजर में इस सेक्टर में किस तरह के बदलाव की जरूरत है?
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उत्तर - हेल्थ सेक्टर में सबसे बड़ी समस्या डॉक्टरों की कमी, उनकी लापरवाही और अस्पतालों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। डॉक्टरों का एब्सेंटिज्म 28 से 68 फीसदी तक है और कम्युनिटी हेल्थ सेंटरों में तो 65 फीसदी वैकेंसी रेट है। कई रिपोर्टों के मुताबिक हमारे क्वालिफाइड सरकारी डॉक्टर न तो मरीजों को ठीक से समय दे पाते हैं औऱ न ही सही इलाज करते हैं। हेल्थ सेक्टर में 1990 से एलोकेशन बढ़ नहीं रहा है। ऐसे में हमने यही कहा कि कुछ दूसरे तरीके अपनाए जाएं। स्वास्थ्य, शिक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर को प्राइवेट सेक्टर को दे दिया जाए।
प्रश्न - क्या मान लेना चाहिए कि सरकार हेल्थ सेक्टर की हालत सुधारने में नाकाम है और अब प्राइवेट सेक्टर ही इसका कल्याण कर सकता है?
उत्तर - मैं पूरी तरह निजीकरण का समर्थक भी नहीं हूं। लेकिन 12 ऐसे बड़े राज्य हैं, जहां सरकार परफार्म नहीं कर पा रही थी तो वहां निजी हाथों में देने के बाद स्वास्थ्य, शिक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में काफी सकारात्मक बदलाव नजर आया। प्राथमिक चिकित्सा सरकारी अस्पताल ही दे सकते हैं। जहां तक टर्शरी केयर यानी बड़ी बीमारियों के इलाज की बात है, वहां प्राइवेट सेक्टर आ सकता है।
प्रश्न - निजी अस्पताल आम आदमी की पहुंच से बाहर है। सस्ते इलाज का भरोसा दिलाने की जिम्मेदारी क्या सरकार की नहीं है?
उत्तर - बिल्कुल है। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह प्राइमरी हेल्थ केयर और पोषण पर खास ध्यान दे। प्राइवेट सेक्टर के लिए कई अच्छे मॉडल हैं। इमरजेंसी ट्रांस्पोर्ट सर्विसेज, मोबाइल मेडिकल यूनिट, डॉयग्नोस्टिक सर्विस, रेडियोलॉजी सर्विस, वेस्ट मैनेजमेंट में प्राइवेट सेक्टर आ सकता है। पर उन्हें पारदर्शी तरीके से बिडिंग करके कम से कम रेट पर लाना जरूरी है तभी आम लोगों को फायदा होगा।
प्रश्न - कारगर पीपीपी मॉडल के लिए क्या योजना है। इसमें ट्रांस्पेरेंसी लाने के लिए और विकास के साथ जोड़ने के लिए क्या करने की जरूरत है?
उत्तर - हमलोगों ने सारे राज्यों और स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ चर्चा की है। एक पीपीपी मॉडल राज्यों को भेजा भी है कि वो मौजूदा अस्पतालों में, जिनके पास पर्याप्त जगह है, उन्हें किस तरह और बेहतर बनाकर प्राइवेट सेक्टर को वहां ला सकते हैं। अगर हम अच्छी बिडिंग करें तो रेट बहुत गिरेंगे। 4-5 बड़ी कंपनियां और बड़े अस्पताल कंपीट करेंगे तो रेट बहुत गिरेंगे।
प्रश्न - मेक इन इंडिया, स्टार्ट अप, स्टैंड अप इंडिया जैसी योजनाओं की पूरी अवधारणा आपकी है। क्या आपको लगता है कि इस दिशा में ठीक तरीके से काम हो रहा है?
उत्तर - पिछले 70 साल में बहुत से नियम कानून बने। इसकी वजह से देश बड़ा जटिल बन गया। जो ग्रोथ और वेल्थ क्रिएशन होता है वो प्राइवेट सेक्टर के जरिए होता है। हमलोगों ने इसे इतना उलझा दिया कि वेल्थ क्रिएशन में बहुत मुश्किल आई। इसलिए प्रधानमंत्री का लक्ष्य रहा है कि इसे आसान बनाओ। पिछले तीन वर्षों में करीब 1,200 नियम-कानून हटाए गए।
प्रश्न - टूरिज्म पर आपने बहुत काम किया है। इनक्रेडिबल इंडिया का पूरा कांसेप्ट आपका है। क्या टूरिज्म से अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सकता है?
उत्तर - टूरिज्म से बहुत ज्यादा रोजगार पैदा होता है। मैं केरल में चार साल टूरिज्म सेक्रेट्री रहा। केरल को हमने ‘गॉड्स ओन कंट्री’ की तरह प्रमोट किया, मार्केट किया, इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया, नए प्रोडक्ट्स लाए, हाउसबोट्स लाए, इससे रोजगार तेजी से बढ़ा। तो अगर इंडिया को ‘ग्रोथ विद जॉब्स’ चाहिए तो ट्रैवल और टूरिज्म सेक्टर को बहुत बड़ा करने की जरूरत है। इस दिशा में सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक वीजा को बढ़ावा देकर बहुत बड़ा काम किया है।
प्रश्न - नोटबंदी से क्या देश को कोई फायदा हुआ है? आम आदमी को अभी तक तो कुछ नजर नहीं आ रहा।
उत्तर - भारत में अगले 30 वर्षों तक 9-10 फीसदी की विकास जरूरी है। ब्लैक इकनॉमी को खत्म करना, उसे व्हाइट इकनॉमी के साथ इंटिग्रेट करना जरूरी है। जीएसटी के साथ नए आयकरदाताओं में बढ़ोतरी हुई और बैंक के डिपॉजिट बढ़े हैं। इससे विकास के कामों में हम निवेश कर पाएंगे। नोटबंदी का असर चार तरीके से होगा। इकनॉमी फॉर्मलाइज होगी, अधिक व्यापारी टैक्स नेट में आएंगे, बैंकों की सेवाएं बढ़ेंगी और बचत का इंफ्रास्ट्रक्चर में उपयोग होगा। इसलिए यह संरचनागत बदलाव जरूरी था।
प्रश्न - प्रधानमंत्री ने वादा किया था कि 2018 तक हर गांव में बिजली पहुंच जाएगी। क्या ऐसा हो रहा है?
उत्तर - प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत जितना काम हुआ और जिस तेजी से गांवों में बिजली पहुंचाई जा रही है, वैसा पहले कभी नहीं हुआ। 2013-15 के बीच जहां 2,602 गांवों में बिजली पहुंच पाई थी, वहीं 2015-17 के बीच 13,123 गांवों में बिजली पहुंची है। अब जो गांव बचे हैं वो बेहद पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में हैं, लेकिन बहुत मेहनत हो रही है कि जल्दी से जल्दी वहां भी बिजली पहुंच सके।
योजना आयोग की जगह नीति आयोग बनने के बाद क्या फर्क आया है?
उत्तर - योजना आयोग पांच साल तक केवल योजना ही बनाता रहता था। अब 15 साल का एक विजन डॉक्यूमेंट बनाया जा रहा है। सात साल का स्ट्रैटजी डाक्यूमेंट भी बन रहा है और तीन साल का एक्शन प्लान बन गया है। मुख्य बात यह है कि अब यहां बड़ी क्रिएटिव एनर्जी आई है। आउटकम मॉनिटरिंग भी शुरू हुई है। ये पहली बार था कि बजट के साथ एक आउटकम बजट भी बना।
आखिर ऐसा क्या हुआ कि अरविंद पनगढ़िया को इतनी जल्दी उपाध्यक्ष पद छोड़कर जाना पड़ा? आपका उनके साथ कैसा अनुभव रहा?
उत्तर - पनगढ़िया साहब के साथ बहुत अच्छा अनुभव रहा। वो बहुत ही दूरदर्शी और जानकार व्यक्ति हैं। अच्छे इंसान और प्रगतिशील विचारों वाले हैं। दरअसल वो स्वभाव से एक एकेडमिशियन हैं और कोलंबिया यूनिवर्सिटी में उनकी छुट्टी बढ़ नहीं रही थी। इसलिए वो वापस लौटना चाहते थे। अब राजीव कुमार आ रहे हैं। उनको भी मैं जानता हूं। वह अच्छे अर्थशास्त्री हैं।
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अमर उजाला के साथ विशेष बातचीत में उन्होंने तमाम क्षेत्रों में हो रहे बदलावों के साथ-साथ हर सेक्टर की स्थिति का बारीकी से विश्लेषण किया। पेश हैं अमिताभ कांत के साथ अतुल सिन्हा की बातचीत के मुख्य अंश :
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प्रश्न - देश की स्वास्थ्य सेवाओं की हालात के लिए गोरखपुर की घटना सबसे ताजा मिसाल है। आपकी नजर में इस सेक्टर में किस तरह के बदलाव की जरूरत है?
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उत्तर - हेल्थ सेक्टर में सबसे बड़ी समस्या डॉक्टरों की कमी, उनकी लापरवाही और अस्पतालों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। डॉक्टरों का एब्सेंटिज्म 28 से 68 फीसदी तक है और कम्युनिटी हेल्थ सेंटरों में तो 65 फीसदी वैकेंसी रेट है। कई रिपोर्टों के मुताबिक हमारे क्वालिफाइड सरकारी डॉक्टर न तो मरीजों को ठीक से समय दे पाते हैं औऱ न ही सही इलाज करते हैं। हेल्थ सेक्टर में 1990 से एलोकेशन बढ़ नहीं रहा है। ऐसे में हमने यही कहा कि कुछ दूसरे तरीके अपनाए जाएं। स्वास्थ्य, शिक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर को प्राइवेट सेक्टर को दे दिया जाए।
प्रश्न - क्या मान लेना चाहिए कि सरकार हेल्थ सेक्टर की हालत सुधारने में नाकाम है और अब प्राइवेट सेक्टर ही इसका कल्याण कर सकता है?
उत्तर - मैं पूरी तरह निजीकरण का समर्थक भी नहीं हूं। लेकिन 12 ऐसे बड़े राज्य हैं, जहां सरकार परफार्म नहीं कर पा रही थी तो वहां निजी हाथों में देने के बाद स्वास्थ्य, शिक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में काफी सकारात्मक बदलाव नजर आया। प्राथमिक चिकित्सा सरकारी अस्पताल ही दे सकते हैं। जहां तक टर्शरी केयर यानी बड़ी बीमारियों के इलाज की बात है, वहां प्राइवेट सेक्टर आ सकता है।
प्रश्न - निजी अस्पताल आम आदमी की पहुंच से बाहर है। सस्ते इलाज का भरोसा दिलाने की जिम्मेदारी क्या सरकार की नहीं है?
उत्तर - बिल्कुल है। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह प्राइमरी हेल्थ केयर और पोषण पर खास ध्यान दे। प्राइवेट सेक्टर के लिए कई अच्छे मॉडल हैं। इमरजेंसी ट्रांस्पोर्ट सर्विसेज, मोबाइल मेडिकल यूनिट, डॉयग्नोस्टिक सर्विस, रेडियोलॉजी सर्विस, वेस्ट मैनेजमेंट में प्राइवेट सेक्टर आ सकता है। पर उन्हें पारदर्शी तरीके से बिडिंग करके कम से कम रेट पर लाना जरूरी है तभी आम लोगों को फायदा होगा।
प्रश्न - कारगर पीपीपी मॉडल के लिए क्या योजना है। इसमें ट्रांस्पेरेंसी लाने के लिए और विकास के साथ जोड़ने के लिए क्या करने की जरूरत है?
उत्तर - हमलोगों ने सारे राज्यों और स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ चर्चा की है। एक पीपीपी मॉडल राज्यों को भेजा भी है कि वो मौजूदा अस्पतालों में, जिनके पास पर्याप्त जगह है, उन्हें किस तरह और बेहतर बनाकर प्राइवेट सेक्टर को वहां ला सकते हैं। अगर हम अच्छी बिडिंग करें तो रेट बहुत गिरेंगे। 4-5 बड़ी कंपनियां और बड़े अस्पताल कंपीट करेंगे तो रेट बहुत गिरेंगे।
प्रश्न - मेक इन इंडिया, स्टार्ट अप, स्टैंड अप इंडिया जैसी योजनाओं की पूरी अवधारणा आपकी है। क्या आपको लगता है कि इस दिशा में ठीक तरीके से काम हो रहा है?
उत्तर - पिछले 70 साल में बहुत से नियम कानून बने। इसकी वजह से देश बड़ा जटिल बन गया। जो ग्रोथ और वेल्थ क्रिएशन होता है वो प्राइवेट सेक्टर के जरिए होता है। हमलोगों ने इसे इतना उलझा दिया कि वेल्थ क्रिएशन में बहुत मुश्किल आई। इसलिए प्रधानमंत्री का लक्ष्य रहा है कि इसे आसान बनाओ। पिछले तीन वर्षों में करीब 1,200 नियम-कानून हटाए गए।
प्रश्न - टूरिज्म पर आपने बहुत काम किया है। इनक्रेडिबल इंडिया का पूरा कांसेप्ट आपका है। क्या टूरिज्म से अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सकता है?
उत्तर - टूरिज्म से बहुत ज्यादा रोजगार पैदा होता है। मैं केरल में चार साल टूरिज्म सेक्रेट्री रहा। केरल को हमने ‘गॉड्स ओन कंट्री’ की तरह प्रमोट किया, मार्केट किया, इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया, नए प्रोडक्ट्स लाए, हाउसबोट्स लाए, इससे रोजगार तेजी से बढ़ा। तो अगर इंडिया को ‘ग्रोथ विद जॉब्स’ चाहिए तो ट्रैवल और टूरिज्म सेक्टर को बहुत बड़ा करने की जरूरत है। इस दिशा में सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक वीजा को बढ़ावा देकर बहुत बड़ा काम किया है।
प्रश्न - नोटबंदी से क्या देश को कोई फायदा हुआ है? आम आदमी को अभी तक तो कुछ नजर नहीं आ रहा।
उत्तर - भारत में अगले 30 वर्षों तक 9-10 फीसदी की विकास जरूरी है। ब्लैक इकनॉमी को खत्म करना, उसे व्हाइट इकनॉमी के साथ इंटिग्रेट करना जरूरी है। जीएसटी के साथ नए आयकरदाताओं में बढ़ोतरी हुई और बैंक के डिपॉजिट बढ़े हैं। इससे विकास के कामों में हम निवेश कर पाएंगे। नोटबंदी का असर चार तरीके से होगा। इकनॉमी फॉर्मलाइज होगी, अधिक व्यापारी टैक्स नेट में आएंगे, बैंकों की सेवाएं बढ़ेंगी और बचत का इंफ्रास्ट्रक्चर में उपयोग होगा। इसलिए यह संरचनागत बदलाव जरूरी था।
प्रश्न - प्रधानमंत्री ने वादा किया था कि 2018 तक हर गांव में बिजली पहुंच जाएगी। क्या ऐसा हो रहा है?
उत्तर - प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत जितना काम हुआ और जिस तेजी से गांवों में बिजली पहुंचाई जा रही है, वैसा पहले कभी नहीं हुआ। 2013-15 के बीच जहां 2,602 गांवों में बिजली पहुंच पाई थी, वहीं 2015-17 के बीच 13,123 गांवों में बिजली पहुंची है। अब जो गांव बचे हैं वो बेहद पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में हैं, लेकिन बहुत मेहनत हो रही है कि जल्दी से जल्दी वहां भी बिजली पहुंच सके।
योजना आयोग की जगह नीति आयोग बनने के बाद क्या फर्क आया है?
उत्तर - योजना आयोग पांच साल तक केवल योजना ही बनाता रहता था। अब 15 साल का एक विजन डॉक्यूमेंट बनाया जा रहा है। सात साल का स्ट्रैटजी डाक्यूमेंट भी बन रहा है और तीन साल का एक्शन प्लान बन गया है। मुख्य बात यह है कि अब यहां बड़ी क्रिएटिव एनर्जी आई है। आउटकम मॉनिटरिंग भी शुरू हुई है। ये पहली बार था कि बजट के साथ एक आउटकम बजट भी बना।
आखिर ऐसा क्या हुआ कि अरविंद पनगढ़िया को इतनी जल्दी उपाध्यक्ष पद छोड़कर जाना पड़ा? आपका उनके साथ कैसा अनुभव रहा?
उत्तर - पनगढ़िया साहब के साथ बहुत अच्छा अनुभव रहा। वो बहुत ही दूरदर्शी और जानकार व्यक्ति हैं। अच्छे इंसान और प्रगतिशील विचारों वाले हैं। दरअसल वो स्वभाव से एक एकेडमिशियन हैं और कोलंबिया यूनिवर्सिटी में उनकी छुट्टी बढ़ नहीं रही थी। इसलिए वो वापस लौटना चाहते थे। अब राजीव कुमार आ रहे हैं। उनको भी मैं जानता हूं। वह अच्छे अर्थशास्त्री हैं।