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परिवर्तन की वाहक: राष्ट्र का निर्माण करतीं सशक्त महिलाएं, बाल विवाह से लेकर कुपोषण के खिलाफ उठा रहीं आवाज

Sun, 07 Mar 2021 11:16 PM IST
संजीव कुमार झा बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: संजीव कुमार झा Updated Sun, 07 Mar 2021 11:16 PM IST
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International womens day 2021, Kavita sardana story, Know about Empowered lady working for nutrion of women
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस - फोटो : Amar ujala

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2021 की थीम 'चुनौती को स्वीकार करें' है। हम सभी मानकों को चुनौती दे सकते हैं और असमानता को दूर कर सकते हैं - क्योंकि परिवर्तन का सम्बंध चुनौती से है। चुनौती देने और बदलाव लाने के ऐसे ही एक प्रयास का नाम सुपोषण सांगिनी है। वे अदाणी फाउंडेशन द्वारा  संचालित विशेष परियोजना - फॉर्च्यून सुपोषण - के लिए सामुदायिक संसाधन हैं। सुपोषण सांगिनी भारत के 12 राज्यों में 23 सीएसआर स्थलों पर देखभाल करने और अच्छे स्वास्थ्य की पैरोकारी करने की महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

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सुपोषण संगिनी को एंथ्रोपोमेट्री के माध्यम से 0-5 वर्ष के आयु वर्ग के बच्चों का आकलन करने और गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों को संबंधित जिलों के पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में रेफर करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। वे गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली माताओं और किशोर उम्र की लड़कियों के बीच आवश्यक पोषण को प्रोत्साहित करती हैं, जिससे कुपोषण और एनीमिया की घटनाओं में कमी आती है। उनके प्रयासों से, अदाणी फाउंडेशन की पहुंच 1,268 गांवों और 139 शहरी बस्तियों के 3,25,437 घरों तक हो गयी है। 
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आइए जानते हैं इन सुपोषण संगिनी को जो समाज में कई परेशानियों का सामना करते हुए महिलाओं एवं बच्चे की हक की आवाज उठा रही हैं एवं उन्हें सुपोषित करने के लिए काम कर रही हैं....
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अनु देवी
गोड्डा (झारखंड) के बक्सरा पंचायत के पेटवी गांव में सुपोषण संगिनी बनने के 3 साल से अधिक समय में, अनु देवी ने खुद को शिक्षा के एक चैंपियन के रूप में स्थापित किया है। उन्होंने बाल विवाह के मामलों पर अंकुश लगाने का अथक प्रयास किया है, जो पीढी़ दर पीढ़ी होने वाले कुपोषण का मूल कारण है। वह 35 बच्चों (विशेष तौर पर लड़कियों) स्कूल भेजने के लिए उनके माता-पिता को परामर्श देने में सफल रहीं। समुदाय की मानसिकता में ऐसा बदलाव लाना कोई आसान उपलब्धि नहीं है।
वह बताती हैं कि शुरुआती दिन मुश्किलों से भरे थे। समुदाय के सदस्य और भूस्वामी उनसे सहमत नहीं होते थे। उन्होंने शाम के समय आंगनवाड़ी केंद्रों में महिलाओं के साथ और स्वयं सहायता समूह के सदस्यों के साथ बैठकें आयोजित करके छोटी और धीमी शुरुआत की। आपत्तियों का सामना करने और कभी-कभी गालियां सुनने के बावजूद भी वह अपना काम करती रहीं।

शक्ति एवं आशा का वातावरण बनानाः चंदरी बी  
प्राकृतिक आपदाओं का सामना करते हुए, सुपोषण संगिनी चंदरी बी ने समुदायों में नयी शक्ति का संचार करने और उनमें उम्मीदें जगाने में मदद पहुंचाई है। तटीय शहर कोवलम में सेवा करते हुए, उन्होंने सामुदायिक संरक्षक के रूप में अपनी एक पहचान बनायी। काम के प्रति लगन से वे हर किसी को प्रभावित करती हैं और वह खुद को किसी भी कार्य के लिए तैयार रखती हैं। 2018 में ओखी चक्रवात के दौरान, उन्होंने पीड़ितों और उनके परिवारों को भय और आघात से उबरने में मदद करते हुए, समुदायों को मनोवैज्ञानिक-सामाजिक सहायता प्रदान की। उन्होंने केरल में 2019 के बाढ़ राहत कार्य के दौरान संसाधनों को जुटाने और उनका प्रबंधन करने के लिए, विभिन्न जिलों में 450 किलोमीटर की यात्रा करते हुए, सभी की अपेक्षाओं से आगे बढ़ कर काम किया। वह सिर पर मंडरा रही आपात स्थितियों के मानवीय पहलुओं, विशेष रूप से लोगों के पुनर्वास के मामले में राहत पहुंचाने का काम जिम्मेदारी पूर्वक किया।

दिव्यांग जनों को सशक्त बनानाः देवल बेन
सुपोषण संगिनी देवल गढ़ा कच्छ जिले के मुंद्रा के नानी भुजपार गांव की हैं। यहां वह पौष्टिक भोजन, स्वस्थ आदतों और स्वच्छता प्रथाओं के बारे में जागरूकता फैलाने का काम करती रहती थीं। एक दिन जब वह एक परिवार से मिलने गयीं तो उन्हें एक 20 वर्षीय लड़की थारू हीरबाई मिली जो  अपने माता-पिता के साथ रहती थी। देवल बेन ने सोचा कि वह तमाम अवसरों से वंचित इस युवती की मदद के लिए क्या कर सकती हैं। अदाणी फाउंडेशन की पहल के साथ तालमेल करते हुए और कई सरकारी योजनाओं के बारे में व्याप्त अनभिज्ञता को दूर करते हुए, देवल बेन ने यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि थारू को एक दिव्यांग प्रमाण पत्र उपलब्ध कराया जाये जो अन्य चीजों के साथ, एक मासिक पेंशन और एक मुफ्त बस पास सुनिश्चित करता है। उन्होंने 3 महीने के सिलाई कोर्स के लिए अदाणी कौशल विकास केंद्र में उसे दाखिला दिलाने में भी देरी नहीं की और उसके लिए समाज सुरक्षा विभाग से बिना किसी खर्च के एक सिलाई मशीन प्राप्त करने में मदद की।


कविता सरदाना, सलाहकार (स्वास्थ्य और पोषण), अदाणी फाउंडेशन।
लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय से फूड एवं न्यूट्रिशन तथा डाइटेटिक्स में पोस्ट ग्रेजुएशन किया है और शिक्षा शास्त्र में मास्टर डिग्री प्राप्त की है। इसके अलावा, उनका दो दशकों से अधिक का शिक्षण अनुभव है। वह पोषण संबंधी शिक्षण के माध्यम से महिला स्वास्थ्य की स्थिति में सुधार लाने में सक्रिय तौर पर काम कर रही हैं।

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