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बैंकिंग प्रणाली: आर्थिक सुधार के लिए डालनी होगी पूंजी

Sat, 30 Jan 2021 07:14 AM IST
Jeet Kumar एजेंसी, नई दिल्ली।
एजेंसी, नई दिल्ली। Published by: Jeet Kumar Updated Sat, 30 Jan 2021 07:14 AM IST
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Economic Survey recommends infusion of capital in public sector banks
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Amar Ujala

आर्थिक सर्वेक्षण में सरकारी बैंकों में पूंजी डालने की सिफारिश की गई है। अगर सरकारी बैंकों को पूंजी मुहैया नहीं कराई गई तो वे जोखिम कम करने के लिए ‘रिस्क शिफ्टिंग’ और ‘जॉम्बिंग लैंडिंग’ जैसे तरीके अपनाएंगे।

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इससे समस्या और बढ़ेगी, जिससे आर्थिक सुधार को धक्का लगेगा क्योंकि अच्छे उद्यमियों एवं परियोजनाओं के लिए कर्ज मिलने में मुश्किल होगी। साथ ही अर्थव्यवस्था में निवेश दर में गिरावट आएगी और जीडीपी में मंदी देखने को मिलेगी।
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दरअसल, हाल के महीनों में कई कारणों की वजह से कर्ज देने में भारी गिरावट आई है। इसका कारण आर्थिक मंदी और सुस्त मांग है। इसके अलावा, बैंक भारी जोखिम को देखते हुए छोटे उद्यमों को कर्ज देने से बचने की नीति अपना रहे हैं। इन स्थितियों को देखते हुए यह चेतावनी अहम हो जाती है।
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सर्वेक्षण में कहा गया है कि बैंकों को आरबीआई की ओर से निर्धारत अनिवार्य आरक्षित आवश्यकता, बैड लोन के लिए प्रावधान और अर्थव्यवस्था में मांग आने पर कर्ज साइकिल शुरू करने के लिए पूंजी की जरूरत है। देश की बैंकिंग प्रणाली का 60 फीसदी हिस्सा सरकारी बैंकों के तहत आता है। बैड लोन में भी सरकारी बैंकों की हिस्सेदारी करीब 90 फीसदी है।

इससे पहले रेटिंग एजेंसी मूडीज ने कहा था कि भारतीय सरकारी बैंकों को अगले 2 वर्षों में 2 लाख करोड़ रुपये की जरूरत होगी। इनमें करीब आधे का उपयोग बैड लोन से निपटने में किया जाएगा।

करदाता शिकायत निपटान प्रणाली को अधिकार देने की जरूरत
करदाता शिकायत निपटान प्रणाली में नई जान फूंकने के लिए सरकार को इसे और अधिकार देने की जरूरत है। आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि कर प्रशासन में भरोसे के निर्माण के लिए करदाता शिकायत निपटान प्रणाली को कर विभाग से स्वतंत्र किया जाना चाहिए।

वैश्विक स्तर पर अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन जैसे देशों ने स्वतंत्र कर लोक प्रहरी के जरिए कर प्रशासन के मोर्चे पर बेहतर प्रदर्शन किया है। इन देशों ने करदाता और कर विभाग के बीच बेहतर विश्वास से अच्छा प्रदर्शन किया है।


सर्वेक्षण में कहा गया है कि अंतरराष्ट्रीय अनुभव से पता चलता है कि करदाताओं के अधिकारों का संरक्षण सुनिश्चित करने के लिए लोक प्रहरी प्रणाली जरूरी है। हालांकि, भारत में पूर्व में इसका अनुभव प्रभावी नहीं रहा और इसे समाप्त कर दिया गया। इसकी एक वजह कर विभाग से अपर्याप्त स्वतंत्रता थी। 

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