साइरस मिस्त्री को लगा बड़ा झटका, NCLT ने खारिज की याचिका, 18 महीने से था टाटा संस के साथ विवाद
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टाटा संस के पूर्व चेयरमैन साइरस मिस्त्री को नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) से बड़ा झटका लगा है। ट्रिब्यूनल ने टाटा संस के पक्ष में फैसला देते हुए मिस्त्री की याचिका को खारिज कर दिया है। सायरस मिस्त्री ने चेयरमैन पद से हटाए जाने के खिलाफ याचिका दायर की थी। यह विवाद करीब 18 महीने से चल रहा था, जिस पर फैसला आने के बाद इस पर पूरी तरह से पर्दा डल गया है। सायरस मिस्त्री पर जानकारी लीक करने का आरोप था।
National Company Law Tribunal rejects Cyrus Mistry's petition against Tata Sons. pic.twitter.com/DFwkpKaQft
— ANI (@ANI) July 9, 2018विज्ञापन
एनसीएलटी ने अपने आदेश में कहा कि बोर्ड के पास पद से हटाने का अधिकार है। एनसीएलटी ने रतन टाटा के खिलाफ लगाए गए आरोप को खारिज किया है। एनसीएलटी ने कहा कि टाटा ग्रुप मैनेजमेंट में कोई गड़बड़ी नहीं है।
Cyrus Mistry's petition challenged his dismissal as chairman of the Tata Sons and alleged operational mismanagement.
— ANI (@ANI) July 9, 2018
टाटा-मिस्त्री घटनाक्रम
टाटा संस-सायरस मिस्त्री मामले की अब तक की घटनाएं इस प्रकार हैं :
24 अक्तूबर, 2016 : टाटा संस ने सायरस मिस्त्री को चेयरमैन पद से बर्खास्त किया। रतन टाटा को अंतरिम चेयरमैन बनाया।
25 अक्तूबर, 2016 : मिस्त्री ने टाटा संस के बोर्ड को पत्र लिखा, टाटा के ट्रस्टी द्वारा क्षद्म नियंत्रण का लगाया आरोप।
19 दिसंबर, 2016 : मिस्त्री ने टाटा समूह की सभी कंपनियों के निदेशक पद से इस्तीफा दिया।
20 दिसंबर, 2016 : मिस्त्री ने एनसीएलटी में याचिका दाखिल कर अल्पमत शेयरधारकों के दमन और कुप्रबंधन का आरोप लगाया।
12 जनवरी, 2017 : टाटा संस ने एन. चंद्रशेखरन को चेयरमैन नियुक्त किया।
6 फरवरी, 2017 : मिस्त्री को टाटा संस के बोर्ड से निदेशक पद से हटाया गया।
21 सितंबर, 2017 : टाटा संस के बोर्ड ने प्राइवेट कंपनी बनने की योजना को मंजूरी दी।
12 जून, 2018 : एनसीएलटी ने फैसले के लिए चार जुलाई की तिथि तय की।
4 जुलाई, 2018 : एनसीएलटी ने फैसले की तिथि को बढ़ाकर नौ जुलाई किया।
9 जुलाई, 2018 : एनसीएलटी ने मिस्त्री की वह याचिका खारिज की, जिसमें उन्होंने टाटा संस के चेयरमैन पद से बर्खास्त किए जाने को चुनौती दी थी। ट्रिब्यूनल ने कहा कि मिस्त्री को बोर्ड से इसलिए हटाया गया, क्योंकि बोर्ड और उसके सदस्यों का उन पर से विश्वास खत्म हो गया था।