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बदलेगा वजन का पैमाना, लेकिन सस्ती नहीं होगी आपकी सब्जियां
अमर उजाला रिसर्च टीम
Updated Wed, 14 Nov 2018 06:22 PM IST
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एक किलो आलू और एक किलो लोहा, दोनों का घनत्व अलग-अलग होने से बराबर वजन होने के बावजूद उनका आकार अलग मिलता है। एक किलोग्राम माने कितना? सबसे शुद्ध रूप में एक किलोग्राम का आकार कितना हो सकता है? ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब शुक्रवार को मिलेगा। एक किलोग्राम से कुछ माइक्रोग्राम कम होने से हमारे-आपके द्वारा खरीदे जाने वाले आलू-प्याज-टमाटर की मात्रा पर बहुत असर नहीं होगा।
लेकिन यही माइक्रोग्राम दवाएं बनाने जैसे सीधे हमारे जीवन से जुड़ी चीजों पर बड़ा असर डाल सकता है। फ्रांस में पेरिस के पास सेंट क्लाउड शहर में ‘इंटरनेशनल प्रोटोटाइप किलोग्राम (आईपीके) नाम का प्लेटिनम-इरिडियम का मिश्रित धातु का एक टुकड़ा सिर्फ इसी काम के लिए रखा गया है, ताकि दुनिया को बता सकें कि एक किलो का मतलब कितना होता है। यह आईपीके एक किलो वजन का सबसे शुद्ध रूप है, लेकिन इसकी शुद्धता भी लगातार खत्म होती जाती है। इसे शुद्ध बनाए रखने के लिए कुछ दशकों में साफ करके तौला जाता है। जो परिणाम आता है, वही दुनिया भर में किलोग्राम का सबसे श्रेष्ठ मानक माना जाता है।
इस शुक्रवार करीब 29 साल बाद इसे फिर से तौला जाएगा, जिस पर दुनिया भर की नजरें टिकी हैं। इसमें कुछ माइक्रोग्राम भी कम या ज्यादा हुए तो इसका असर उद्योगों से लेकर विज्ञान तक पर होगा। खासतौर से उन उद्योगों में जहां वजन की बेहद सटीक गणना उनके उत्पादों की क्वालिटी तय करती है। आईपीके की स्थिरता इसलिए जरूरी है ताकि दुनिया भर में वजन के समान मानक बनाए रखे जाएं।
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100 साल में कम हुआ 50 माइक्रोग्राम
मूल आईपीके के घनत्व को शून्य मानते हुए इसमें आए किसी भी बदलाव को इसकी कॉपियों से तुलना कर मापा जाता है। अब तक 1889, 1948 व 1989 में ऐसे बदलावों की पुष्टि हुई है। बीते 100 साल में आईपीके ने 50 माइक्रोग्राम वजन कम किया है। इसी आधार पर इन बदलावों को दुनिया भर के लिए मानक के तौर पर लागू किया गया है।
यह है आईपीके
-वैज्ञानिकों ने 1889 में पहली बार आईपीके को सबसे शुद्ध किलोग्राम करार दिया। इसमें 90 प्रतिशत प्लेटिनम और 10 प्रतिशत इरिडियम के तत्व हैं। प्लेटिनम इसलिए क्योंकि इसमें जंग नहीं लगता, इसका घनत्व बहुत ज्यादा है, चुंबकीय प्रभावक्षेत्र में मुश्किल से आता है और बिजली-गर्मी का भी ठीक-ठाक कंडक्टर है।
इसकी खासियत को ऐसे समझें कि एक किलो प्लेटिनम रखने के लिए इतने ही वजन के लेड से आधी और पानी से 21 गुना कम जगह चाहिए। वहीं इरिडियम की वजह से प्लेटिनम की कठोरता बढ़ जाती है।
आईपीके की 40 आधिकारिक कॉपियां बनी हैं, जिनमें आठ ऑफिशियल हैं। मुख्य आईपीके फ्रांस में ही इंटरनेशनल ब्यूरो ऑफ वेट एंड मेजरमेंट में रखा गया है। इसे कोई बिना अनुमति छू नहीं सकता, इसे खोलने के लिए तीन चाबियां लगती हैं, जिन्हें दुनिया के तीन अलग-अलग हिस्सों में रखा जाता है। हर 40 साल में इनकी आपस में तुलना कर एक किलोग्राम की शुद्धता को मापा जाता है।
भाप से सफाई, कम हो जाते हैं पांच से 60 माइक्रोग्राम
वेरिफिकेशन के पहले आईपीके और उसकी कॉपियों की सफाई की जाती है। इसमें ईथर, इथनॉल, बेंजीन, डिस्टिल वॉटर व भाप का उपयोग किया जाता है। इस दौरान पांच से 60 माइक्रोग्राम तक वजन इन आईपीके से कम हो जाता है।
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लेकिन यही माइक्रोग्राम दवाएं बनाने जैसे सीधे हमारे जीवन से जुड़ी चीजों पर बड़ा असर डाल सकता है। फ्रांस में पेरिस के पास सेंट क्लाउड शहर में ‘इंटरनेशनल प्रोटोटाइप किलोग्राम (आईपीके) नाम का प्लेटिनम-इरिडियम का मिश्रित धातु का एक टुकड़ा सिर्फ इसी काम के लिए रखा गया है, ताकि दुनिया को बता सकें कि एक किलो का मतलब कितना होता है। यह आईपीके एक किलो वजन का सबसे शुद्ध रूप है, लेकिन इसकी शुद्धता भी लगातार खत्म होती जाती है। इसे शुद्ध बनाए रखने के लिए कुछ दशकों में साफ करके तौला जाता है। जो परिणाम आता है, वही दुनिया भर में किलोग्राम का सबसे श्रेष्ठ मानक माना जाता है।
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इस शुक्रवार करीब 29 साल बाद इसे फिर से तौला जाएगा, जिस पर दुनिया भर की नजरें टिकी हैं। इसमें कुछ माइक्रोग्राम भी कम या ज्यादा हुए तो इसका असर उद्योगों से लेकर विज्ञान तक पर होगा। खासतौर से उन उद्योगों में जहां वजन की बेहद सटीक गणना उनके उत्पादों की क्वालिटी तय करती है। आईपीके की स्थिरता इसलिए जरूरी है ताकि दुनिया भर में वजन के समान मानक बनाए रखे जाएं।
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100 साल में कम हुआ 50 माइक्रोग्राम
मूल आईपीके के घनत्व को शून्य मानते हुए इसमें आए किसी भी बदलाव को इसकी कॉपियों से तुलना कर मापा जाता है। अब तक 1889, 1948 व 1989 में ऐसे बदलावों की पुष्टि हुई है। बीते 100 साल में आईपीके ने 50 माइक्रोग्राम वजन कम किया है। इसी आधार पर इन बदलावों को दुनिया भर के लिए मानक के तौर पर लागू किया गया है।
यह है आईपीके
-वैज्ञानिकों ने 1889 में पहली बार आईपीके को सबसे शुद्ध किलोग्राम करार दिया। इसमें 90 प्रतिशत प्लेटिनम और 10 प्रतिशत इरिडियम के तत्व हैं। प्लेटिनम इसलिए क्योंकि इसमें जंग नहीं लगता, इसका घनत्व बहुत ज्यादा है, चुंबकीय प्रभावक्षेत्र में मुश्किल से आता है और बिजली-गर्मी का भी ठीक-ठाक कंडक्टर है।
इसकी खासियत को ऐसे समझें कि एक किलो प्लेटिनम रखने के लिए इतने ही वजन के लेड से आधी और पानी से 21 गुना कम जगह चाहिए। वहीं इरिडियम की वजह से प्लेटिनम की कठोरता बढ़ जाती है।
आईपीके की 40 आधिकारिक कॉपियां बनी हैं, जिनमें आठ ऑफिशियल हैं। मुख्य आईपीके फ्रांस में ही इंटरनेशनल ब्यूरो ऑफ वेट एंड मेजरमेंट में रखा गया है। इसे कोई बिना अनुमति छू नहीं सकता, इसे खोलने के लिए तीन चाबियां लगती हैं, जिन्हें दुनिया के तीन अलग-अलग हिस्सों में रखा जाता है। हर 40 साल में इनकी आपस में तुलना कर एक किलोग्राम की शुद्धता को मापा जाता है।
भाप से सफाई, कम हो जाते हैं पांच से 60 माइक्रोग्राम
वेरिफिकेशन के पहले आईपीके और उसकी कॉपियों की सफाई की जाती है। इसमें ईथर, इथनॉल, बेंजीन, डिस्टिल वॉटर व भाप का उपयोग किया जाता है। इस दौरान पांच से 60 माइक्रोग्राम तक वजन इन आईपीके से कम हो जाता है।