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बजट 2020: दूध और डेयरी सेक्टर पर उचित नीतियां बनाये सरकार, तभी मिलेगा फायदा

बिजनेस डेस्क, अमर उजाला Updated Thu, 16 Jan 2020 04:13 PM IST
union budget 2020 expectations government should look into dairy sector to boost farmer income
- फोटो : अमर उजाला
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आगामी बजट में सरकार को दूध और डेयरी सेक्टर के बारे में सोचना चाहिए, ताकि किसानों को लाभ मिल सके। किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष चौधरी पुष्पेंद्र सिंह ने अमर उजाला से बातचीत करते हुए कह कि हाल ही में दूध के बढ़ते दामों से चिंतित केंद्र सरकार के पशुपालन और डेयरी मंत्रालय ने देश में दूध के उत्पादन, उपलब्धता और बढ़ती कीमतों के आंकलन के लिए जनवरी के शुरू में सभी प्रमुख डेरियों की एक बैठक बुलाई थी। इस बैठक में आगामी बजट के मद्देनजर दुग्ध उत्पादन और डेयरी उद्योग की समस्याओं और प्रस्तावों पर विस्तृत चर्चा की गई।
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इस बैठक में निजी क्षेत्र की डेरियों ने दूध पाउडर आयात करने की गुहार सरकार से लगाई। जबकि वास्तविकता यह है कि ना तो देश में दूध की कमी है और ना ही दूध के रेट इतने बढ़े हैं कि दूध उत्पादों का आयात खोलकर हम किसानों की कमर तोड़ दें। वास्तविकता तो यह है कि दूध के दाम पांच सालों तक घाटे में चलते रहे। अब जाकर उनमें कुछ सुधार हुआ है। निजी डेयरियां केवल अपना मुनाफा देख रही हैं। पिछले पांच सालों में किसानों को दूध में बहुत घाटा झेलना पड़ा तब तो ये चुप थे। दूध पाउडर का दाम अब जाकर उस स्तर पर पहुंचा है जहाँ वह चार साल पहले था। अतः दुग्ध उत्पादों का आयात करने का कोई कारण नहीं है।

पिछले दिनों डेरियों ने दूध के दाम दो से तीन रुपये प्रति लीटर बढ़ाए थे। यह पिछले सात महीनों के भीतर दूध की कीमतों में दूसरी बढ़ोतरी थी। इस साल मई में भी दिल्ली में फुल-क्रीम दूध के दाम दो रुपये प्रति लीटर बढ़ाए गए थे। दूध के दाम बढ़ने के कारणों का विश्लेषण करने के लिए दूध की पिछले दस सालों की कीमतों और सरकारी नीतियों का आंकलन करना होगा।

फरवरी 2010 में दिल्ली में फुल-क्रीम दूध के दाम 30 रुपये प्रति लीटर थे, जो मई 2014 में बढ़कर 48 रुपये प्रति लीटर हो गए। इस अवधि में उपभोक्ताओं के लिए दूध के मौद्रिक दाम औसतन 15 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से बढ़े। मोदी सरकार के पांच सालों के कार्यकाल में दिल्ली में फुल-क्रीम दूध के दाम मई 2014 में 48 रुपये प्रति लीटर से बढ़कर मई 2019 में 53 रुपए प्रति लीटर पर पहुंचे। इस अवधि में उपभोक्ताओं के लिए दूध के मौद्रिक दाम औसतन 2.1 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से बढ़े। इस अवधि में 3.3 प्रतिशत की औसत उपभोक्ता खाद्य महंगाई दर को देखते हुए दूध के वास्तविक दाम घट गए थे। 

दुग्ध उत्पादन की बढ़ती लागत और खाद्य महंगाई दर को समायोजित करने के लिए इस अवधि में दूध के दाम कम से कम 7 प्रतिशत प्रति वर्ष की मामूली मौद्रिक दर से भी बढ़ाये जाते तो भी मई 2019 में दिल्ली में फुल-क्रीम दूध के दाम लगभग 65 रुपये प्रति लीटर होते। जबकि 15 दिसंबर को हुई बढ़ोतरी के बाद भी फुल-क्रीम दूध के दाम यहां 55 रुपये प्रति लीटर ही हैं। यानी दूध के दामों में हुई हालिया बढ़ोतरी के बावजूद उपभोक्ताओं को दूध अब भी वाज़िब दामों से लगभग 10 रुपये प्रति लीटर सस्ता मिल रहा है। 

शुक्र है कि दूध के क्षेत्र में सक्रिय अमूल जैसी सहकारी डेरियों के कारण एक तरफ तो उपभोक्ताओं को दूध के बहुत अधिक दाम नहीं चुकाने पड़ते, वहीं दूसरी तरफ उपभोक्ताओं द्वारा दूध पर खर्च किये गए एक रुपये में से लगभग 75 पैसे किसानों तक पहुंचते हैं। किसान अपने उपयोग के बाद लगभग 10 करोड़ टन दूध प्रति वर्ष बेच देते हैं। दूध के दाम 10 रुपये प्रति लीटर कम मिलने के कारण देश का दुग्ध उत्पादक किसान लगभग एक लाख करोड़ रुपये प्रति वर्ष का घाटा अब भी सह रहे है।

सहकारी क्षेत्र की डेरियां किसानों के अपने उपक्रम हैं जिनको मिला लाभ लाभांश के रूप में किसानों तक पहुंचता है। पिछले साल सरकार ने कॉर्पोरेट कंपनियों के इनकम टैक्स को 30 प्रतिशत से घटाकर 22 प्रतिशत कर दिया था, परन्तु किसानों की इन सहकारी संस्थाओं पर टैक्स पहले की तरह ही लग रहा है जो किसानों के साथ अन्याय है जिसे तत्काल कम किया जाना चाहिए। इसी प्रकार दुग्ध उत्पादों पर से जीएसटी भी कम किया जाना चाहिए ताकि कम टैक्स का लाभ सीधे किसानों तक पहुंच सके।

पिछले पांच सालों में किसानों को दूध के उचित एवं लाभकारी मूल्य नहीं मिले, उल्टे हर साल महंगाई और लागत बढ़ने के कारण दुग्ध उत्पादक किसानों को काफी घाटा झेलना पड़ा। इस कारण सबसे पहले तो किसानों ने अपने दुधारू पशुओं की संख्या को घटा दिया। 

दूसरा, पिछले कुछ सालों में पशु-आहार जैसे खल, चूरी, छिलका आदि के दाम भी काफी बढ़े हैं जिस कारण दुग्ध उत्पादन की लागत में काफी वृद्धि हुई है। दुग्ध उत्पादन की बढ़ती लागत को देखते हुए पशुओं को किसान उचित मात्रा में पोषक पशु-आहार और चारा भी नहीं खिला पाए। इस वर्ष विलंब से आये मानसून के कारण कई राज्यों में पहले तो सूखा पड़ा, फिर बाद में अत्यधिक बारिश और बाढ़ की स्थिति बन गई जिस कारण भी चारे की उपलब्धता घटी है। दुग्ध उत्पादन में घाटे के कारण बीमार पशुओं के इलाज और रखरखाव पर होने वाले खर्चे में भी कटौती करनी पड़ी। डीज़ल के दाम और मजदूरी भी पिछले पांच सालों में काफी बढ़े हैं जिसका प्रभाव दूध के दामों में दिख रहा है। सरकार को सस्ता पशु आहार और सस्ती पशु चिकित्सा उपलब्ध कराने की दिशा में बजट में कदम उठाने चाहिए। इस क्रम में पशुओं की दवाईयां भी सस्ती करने के कदम उठाने होंगे।

तीसरा, पिछले पांच सालों में ग्रामीण क्षेत्रों में आवारा पशुओं की संख्या बेतहाशा बढ़ी है। पशु-गणना 2012 के अनुसार देश में आवारा पशुओं की संख्या 53 लाख थी। एक अनुमान के अनुसार इस वक्त भारत में लगभग एक करोड़ आवारा पशु हैं, जो दुधारू पशुओं के हरे चारे को बड़ी मात्रा में खेतों में ही चट कर जाते हैं। पशु-आहार में काम आने वाली अन्य फसलों को भी ये नुकसान पहुँचाते हैं। इससे दुधारू पशुओं के लिए चारे और पशु-आहार की उपलब्धता घट जाती है। इससे चारा महंगा हो जाता है और दुग्ध उत्पादन की लागत बढ़ जाती है। भारतीय चरागाह और चारा अनुसंधान संस्थान के अनुसार देश में हरे चारे की 64 प्रतिशत और सूखे चारे की 24 प्रतिशत कमी है। आवारा पशुओं के कारण चारे की उपलब्धता और कम हो गई है। आवारा पशुओं को काबू करने के लिए विशेष बजट प्रावधान करने होंगे।

चौथा, गौरक्षा की अति उत्साही नीतियों के कारण पुराने, बांझ और बेकार पशुओं का व्यापार और परिवहन बहुत जोखिम भरा हो गया है। इस कारण बेकार पशुओं, विशेषकर गौवंश का बाज़ार लगभग समाप्त हो गया है। इनको बेचकर जो पूंजी किसानों को पहले मिल जाती थी उसे किसान नये पशुओं को खरीदने और अपने मौजूदा दुधारू पशुओं के रखरखाव में लगा देते थे। अब पूंजी का यह स्रोत लगभग समाप्त हो गया है, उल्टा आवारा पशु सारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर एक बोझ बन गए हैं। इसका खामियाजा एक तरफ दुग्ध उत्पादन की बढ़ती लागत के कारण किसानों को, तो दूसरी तरफ महंगे दूध के रूप में उपभोक्ताओं को उठाना पड़ रहा है। अतः बेकार पशुओं के निस्तारण और इनका बाज़ार उपलब्ध कराने हेतु सरकार बजट में उचित प्रावधान करे।

पांचवा, वर्ष 2019-20 का देश का कुल बजट 27.86 लाख करोड़ रुपये है। इसमें से पशुपालन और डेयरी कार्य हेतु मिलने वाले छोटे से बजट को पिछले वर्ष के 3,273 करोड़ से घटाकर इस साल 2,932 करोड़ रुपये कर दिया गया। दूध उत्पादन जैसी अति महत्वपूर्ण आर्थिक गतिविधि से खेती की 30 फीसदी आमदनी आती है अतः इसका बजट ग्रामीण व कृषि बजट का कम से कम 30 प्रतिशत होना चाहिए। 

छठवां, पिछले साल जब दूध पाउडर का ढ़ेर लगा हुआ था और इसके दाम गिरकर 150 रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर पर आ गए थे, उस वक्त सरकार ने दूध पाउडर के निर्यात के लिए 50 रुपये प्रति किलोग्राम की सब्सिडी भी दी थी। अब दूध पाउडर के दाम दोगुने होकर 300 रुपये प्रति किलोग्राम हो गए हैं। यदि पिछले साल सरकार दूध पाउडर का बफर स्टॉक बना लेती तो उस वक्त किसानों को दूध की कम कीमत मिलने से नुकसान नहीं होता और आज उपभोक्ताओं को भी बहुत अधिक कीमत नहीं चुकानी पड़ती। अतः दूध पाउडर के बफर स्टॉक के लिए विशेष बजट बनाना चाहिए।

हमारे देश में लगभग संगठित व असंगठित क्षेत्र के 12 करोड़ परिवार दुग्ध उत्पादन, दुग्ध व्यापार और दुग्ध उत्पादों को बनाने के काम में लगे हुए हैं। यानी हमारे देश के लगभग 60 करोड़ लोगों की जीविका दूध पर निर्भर है। दूध की कम कीमत मिलने से घाटे के कारण यदि किसान पशुपालन से विमुख हो गए तो पहले से ही संकट से जूझ रही कृषि व ग्रामीण अर्थव्यवस्था और गहरे संकट में फंस जाएगी। देश की दूध की बढ़ती मांग की आपूर्ति और दुग्ध उत्पादन में आत्मनिर्भरता बनाये रखने के लिए दुग्ध उत्पादक किसानों को लाभकारी मूल्य देना होगा और इनके लिए बजट में अनुकूल नीतियां बनानी होंगी और उचित मात्रा में धन का प्रावधान करना होगा।
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