बढ़ती आबादी को रोजगार देना मुख्य चुनौती
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उद्योग संगठन एसोचैम का कहना है कि उद्योग जगत, खास कर छोटे एवं मंझोले उद्योग भारी संख्या में रोजगार उपलब्ध कराते हैं। कर चुकाने के मामले में अभी इन्हें अभी शक की निगाह से देखा जा रहा है, जो कि ठीक नहीं है। इसका कहना है कि भारत की बढ़ती आबादी पर ध्यान दें तो हर साल यहां एक आस्ट्रेलिया जुड़ रहा है।
यहां की सबसे बड़ी चुनौती बढ़ती आबादी को रोजगार उपलब्ध कराना है। इसलिए उद्योग जगत पर विश्वास करना होगा। नोटबंदी के बाद अर्थव्यवस्था केहालात एवं अन्य मसलों पर अमर उजाला के संवाददाता शिशिर चौरसिया ने एसोचैम के नव निर्वाचित अध्यक्ष संदीप जाजोडिया से विस्तृत बातचीत की। पेश है इस बातचीत केसंपादित अंश:-
प्रश्न- सरकार इस समय कर का दायरा बढ़ाना चाहती है और कर चोरी पर लगाम भी लगाना चाहती है। इस पर उद्योग जगत की क्या प्रतिक्रिया है?
उत्तर- पिछले महीने बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने आंख खोलने वाला आंकड़ा पेश किया कि कुल आबादी में महज 1.8 फीसदी लोग ही आयकर देते हैं। इसे बढ़ाने की आवश्यकता है। जहं तक उद्योग जगत की बात है तो वहां भी कुछ ऐसे हैं जो कर चोरी कर रहे हैं। लेकिन कर चोरी रोकने के प्रयास करते समय इस बात का ध्यान रखना होगा कि उंचे मूल्य के उत्पाद और सेवाओं के कारोबार में किसी प्रकार का डर अथवा कर-आतंकवाद की भावना पैदा नहीं हो।
भारत में डिजिटल ट्रांजेक्शन बढ़ रहा है।
प्रश्न- इसके लिए क्या करना होगा?
उत्तर- इसके लिए सभी कर अधिकारियों को उनकी कारवाई के लिए जवाबदेह बनाना होगा। उन्हें साफ संदेश देना होगा कि सिर्फ संदेह के आधार पर किसी का पीछा नहीं किया जाना चाहिए। ज्यादा संख्या में रोजगार उपलब्ध कराने वाले उद्योग जगत को बेवजह तंग नहीं किया जाना चाहिए।
प्रश्न- सरकार चाहती है कि डिजिटल ट्रांजेक्शन को बढ़ावा मिले। यही नहीं, दो लाख रुपये से ऊपर के ट्रांजेक्शन पर एक फीसदी पर टीसीएस की बात की जा रही है। इससे आप सहमत हैं?
उत्तर- भारत में डिजिटल ट्रांजेक्शन बढ़ रहा है, इसमें कोई शक नहीं है। लेकिन यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि अधिकतर अभी औसत भारतीय नकद लेनदेन करना ज्यादा पसंद करते हैं। यह आदत धीरे धीरे बदल रही है और इसे बदलने में तीन-चार साल का वक्त लगेगा। मेरा सुझाव है कि सरकार को दो लाख रुपए से अधिक के नकद लेनदेन पर टीसीएस लगाने के फैसले पर फिर से विचार करना चाहिए।
प्रश्न- नोटबंदी के बाद उद्योग जगत की सामान्य शिकायत मांग घटने की है। पिछले दिनों सरकार ने कहा था कि कुछ दिनों में स्थिति सामान्य हो जाएगी। आपका क्या मानना है?
उत्तर- मेरा मानना है कि अभी भी नोटबंदी से पहले जैसे हालात बनने में 9 से 12 महीने लगेंगे। अभी की स्थिति देखी जाए तो इस समय औद्योगिक क्षेत्र मांग की भारी कमी के दौर से गुजर रहे हैं। यदि बाजार में नकदी की उपलब्धता बढ़ेगी तो मांग निकलेगी। अभी आप देखें तो ग्रामीण इलाकों में नकदी की आपूर्ति की स्थिति काफी खराब है।
वहां सब कुछ सामान्य होने में वक्त लगेगा। मेरा तो मानना है कि जब तक अर्थव्यवस्था में नकदी का प्रवाह नहीं बढ़ेगा, उपभोग नहीं बढ़ेगा। उपभोग कम रहने से रोजगार सृजन प्रभावित होगा। अब तक देश में रोजगार रहित विकास होता रहा है जिसका कोई फायदा नहीं है।
जब आबादी बढ़ रही है तो रोजगार का अवसर भी बढ़ाना होगा।
प्रश्न- आप रोजगार के साथ विकास की कहते हैं लेकिन पिछले कुछ महीने से तो सिर्फ नौकरी जाने की ही खबर आ रही है?
उत्तर- नौकरी तो तभी मिलेगी जब उत्पादन बढ़ेगा। जब बिक्री घट रही है तो उत्पादन भी घटेगा। उत्पादन घटेगा तो नई भर्ती का कोई मतलब नहीं है। आप देखिये कि भारत की आबादी में हर साल एक नया आस्ट्रेलिया जुड़ता है। जब आबादी बढ़ रही है तो रोजगार का अवसर भी बढ़ाना होगा।
इस समय देश की आधी से ज्यादा आबादी युवा है तथा उनकी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उद्योग जगत को बढ़ावा देना जरूरी है जो इन युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा कर सकता है।
प्रश्न- सरकार इस समय ढांचागत संरचना पर ज्यादा जोर दे रही है। इससे उद्योग को सहूलियत मिलेगी?
उत्तर- ढांचागत संरचना पर जोर दिया जाता है तो इससे समाज के हर क्षेत्र को फायदा होगा। उद्योग जगत समाज से बाहर नहीं है, इसलिए उसको भी फायदा होगा। यह अच्छी बात है कि इस वर्ष के बजट ढांचागत संरचना क्षेत्र के लिए 3.9 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
इस मामले में सरकार की मंशा बिल्कुल साफ है। इससे न सिर्फ औद्योगिकरण बढ़ेगा बल्कि रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।