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Supreme Court: किसी समझौते पर मुहर या उचित मुहर नहीं लगने का उसकी की वैधता से लेना-देना नहीं, कोर्ट ने ये कहा
Wed, 13 Dec 2023 12:04 PM IST
कुमार विवेक
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: कुमार विवेक
Updated Wed, 13 Dec 2023 12:04 PM IST
सार
Supreme Court: प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पीठ ने एक सर्वसम्मत निर्णय में अपने ही उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि यदि अनुबंध करने वाले पक्षों के बीच विवादों को सुलझाने के लिए मध्यस्थता उपबंध वाले किसी समझौते पर मुहर नहीं लगी है तो वह अमान्य और अप्रवर्तनीय है।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
विस्तार
समझौते पर स्टांप नहीं होने या अपर्याप्त होने पर भी दो पक्षों में मध्यस्थता की शर्त लागू होगी। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में सात जजों की संविधान पीठ ने बुधवार को फैसले में कहा कि स्टांप न लगाना या अपर्याप्त स्टांप ऐसी कमी है, जो सुधारी जा सकती है। महज इसकी वजह से अनुबंध रद्द नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने इस साल 25 अप्रैल के अपने फैसले को पलटते हुए कहा कि कॉरपोरेट जगत से लेकर अन्य पक्षों में होने वाले समझौतों पर इसका व्यापक असर हो सकता है, जिनमें मध्यस्थता की शर्त रखी जाती है।
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दरअसल, किसी समझौते में मध्यस्थता की शर्त आमतौर पर समझौता करने वाले पक्षों में आपसी विवाद सुलझाने के लिए रखी जाती है। एकमत से दिए फैसले में संविधान पीठ ने कहा कि मध्यस्थता की शर्त के लिए हुए समझौते की वैधता का स्टांप न लगने या अपर्याप्त स्टांप लगने से लेना-देना नहीं है। पीठ में शामिल सीजेआई चंद्रचूड़, जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा ने फैसले में कहा, जिन समझौतों पर स्टांप नहीं लगता है या अपर्याप्त स्टांप है, वे समझौते की शुरुआत से ही रद्द नहीं माने जा सकते। सातवें जज जस्टिस संजीव खन्ना ने अलग फैसला लिखा।
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पीठ ने यह भी साफ किया, समझौता अगर बिना स्टांप के है या स्टांप अपर्याप्त हैं, तो वे साक्ष्य में स्टांप अधिनियम की धारा 35 के तहत मंजूर नहीं किए जा सकते। लेकिन, इसी वजह से उन्हें रद्द करना, करार होने के समय से ही शून्य या अयोग्य नहीं माना जा सकता। यही नहीं, स्टांप को लेकर आपत्ति पर मध्यस्थता व सुलह अधिनियम की धारा 8 या 11 के तहत भी विचार नहीं किया जा सकता। यह संबंधित अदालत को जांचना होता है कि मध्यस्थता समझौता प्रथमदृष्टया वजूद रखता है या नहीं।
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कोर्ट के बाहर फैसले के लिए मध्यस्थता
दो पक्षों में विवाद सुलझाने के लिए मध्यस्थता प्रणाली बनी है। इसमें संबंधित पक्ष कोर्ट गए बिना सुलह का प्रयास करते हैं। निष्पक्ष व्यक्ति को विवाद पर निर्णय लेने के लिए नियुक्त किया जाता है। उसका निर्णय कानूनी तौर पर लागू होता है। इस प्रक्रिया के लिए दोनों पक्षों में अनिवार्य रूप से मध्यस्थता के लिए करार होना चाहिए। दोनों की सहमति से ही मध्यस्थता प्रणाली काम में ली जा सकती है।\
तब 3:2 से हुआ था फैसला
25 अप्रैल को पांच जजों की पीठ ने एनएन ग्लोबल मामले में 3:2 के बहुमत से निर्णय दिया था कि मध्यस्थता की शर्त वाले ऐसे करार पत्र, जिन पर स्टांप न लगा हो या अपर्याप्त स्टांप हो कानूनी तौर पर लागू नहीं होते। इस पर स्टांप होना चाहिए। वरना यह संविदा अधिनियम के तहत न अनुबंध रह पाता है, न कानूनी तौर पर लागू होने योग्य। इसका कानून में अस्तित्व भी नहीं रह सकता।
12 अक्तूबर को सुरक्षित रखा था फैसला
सुप्रीम कोर्ट 25 अप्रैल को पांच जजों की पीठ के उस आदेश के बाद मामले पर पुनर्विचार के लिए दायर उपचारात्मक याचिका की सुनवाई कर रहा था। 26 सितंबर को इसे सांविधानिक पीठ को भेजा गया। कोर्ट का मानना है, पांच जजों के निर्णय के व्यापक असर व नतीजे हो सकते हैं, इसलिए इसे सात जजों की संविधान पीठ के सामने रखना चाहिए। यहां डेरियस खंबाटा व श्याम दीवान सहित कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं को सुना गया और 12 अक्तूबर को फैसला सुरक्षित रखा गया।