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Supreme Court: दिवालियापन कानून के प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका स्वीकार, केंद्र को नोटिस जारी

Mon, 03 Jul 2023 09:33 PM IST
कुमार विवेक बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कुमार विवेक Updated Mon, 03 Jul 2023 09:33 PM IST
सार

Supreme Court: मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने तीन याचिकाओं पर केंद्र और अन्य को नोटिस जारी किये और इन याचिकाओं को इस मुद्दे पर लंबित याचिका के साथ संलग्न करने का आदेश दिया।

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SC issues notice to Centre on pleas challenging provisions of insolvency and bankruptcy code
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

उच्चतम न्यायालय दिवालिया व ऋणशोधन अक्षमता संहिता (Insolvency and Bankruptcy Code, IBC) के विभिन्न प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के लिए सोमवार को सहमत हो गया। मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने तीन याचिकाओं पर केंद्र और अन्य को नोटिस जारी किये और इन याचिकाओं को इस मुद्दे पर लंबित याचिका के साथ संलग्न करने का आदेश दिया। इनमें से एक याचिका आर शाह ने वकील ऐनी मैथ्यू के माध्यम से दायर की थी जिसमें संहिता की धारा 95(1), 96(1), 97(5), 99(1), 99 (2), 99(4), 99(5), (99)6 और 100 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी। ये प्रावधान चूककर्ता फर्म या व्यक्तियों के खिलाफ दिवाला कार्यवाही के विभिन्न चरणों से निपटते हैं।

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याचिका में कहा गया है, "लागू किए गए प्रावधान स्वाभाविक रूप से प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन करते हैं और आजीविका के अधिकार, व्यापार और पेशे के अधिकार की जड़ पर प्रहार करते हैं और अनुच्छेद 21(जीवन का अधिकार), 19 (1)(जी) (किसी भी पेशे का अभ्यास करने का अधिकार), और 14 (समानता का अधिकार) के तहत याचिकाकर्ता के समानता के अधिकार पर भी हमला करते हैं। इसमें कहा गया है कि किसी भी प्रावधान में समाधान पेशेवर की नियुक्ति से पहले कथित व्यक्तिगत गारंटर को सुनवाई का मौका देने और व्यक्तिगत गारंटर की संपत्तियों पर रोक लगाने पर विचार नहीं किया गया है।"
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याचिका के अनुसार, "दिलचस्प बात यह है कि आईबीसी की धारा 96(1) कथित गारंटर पर बिना किसी पूर्व सूचना की आवश्यकता के संहिता की धारा 95 के तहत आवेदन दायर करने से रोकती है जो अपने आप में प्राकृतिक न्याय के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन है।" याचिका में कहा गया है, "सुनवाई का कोई मौका दिए बिना किसी भी कर्ज के निर्वहन पर प्रतिबंध सहित किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर इस तरह के प्रतिबंध न केवल संविधान के दायरे से बाहर हैं, बल्कि कानून के खिलाफ भी है।' संहिता की धारा 95 (5) में समाधान पेशेवर की नियुक्ति के किसी विकल्प पर विचार नहीं किया गया है।"

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