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Economy: भारत की अर्थव्यवस्था में 6.4% की वृद्धि होने का अनुमान, जानिए संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में क्या
Tue, 21 Apr 2026 08:28 PM IST
Navita R Asthana
बिजनेस डेस्क अमर उजाला, मुंबई
बिजनेस डेस्क अमर उजाला, मुंबई
Published by: Navita R Asthana
Updated Tue, 21 Apr 2026 08:28 PM IST
सार
पश्चिम एशिया संकट के चलते कच्चे तेल की चढ़ती कीमतों और आपूर्ति श्रृंखला में बाधाओं के चलते भारत की अर्थव्यवस्था पर असर देखने को मिला है। हालांकि दीर्घकालिक नजरिए से भारत के विकास की बुनियाद मजबूत बनी हुई है।
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अर्थव्यवस्था
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था में इस वर्ष 6.4% और 2027 में 6.6% की वृद्धि होने का अनुमान है। संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक आयोग फॉर एशिया एंड द पैसिफिक (ईएससीएपी) ने सोमवार को जारी रिपोर्ट में कहा कि दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम एशिया की अर्थव्यवस्थाओं में 2025 में 5.4% की वृद्धि हुई, जबकि 2024 में यह वृद्धि 5.2% थी, जिसका मुख्य कारण भारत में मजबूत वृद्धि थी।
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एशिया और प्रशांत क्षेत्र के आर्थिक और सामाजिक सर्वेक्षण 2026 नामक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की विकास दर 2025 में बढ़कर 7.4% हो गई, "जो मजबूत खपत, विशेष रूप से ग्रामीण अर्थव्यवस्था से, साथ ही वस्तु एवं सेवा कर दरों में कटौती और संयुक्त राज्य अमेरिका के टैरिफ से पहले निर्यात को बढ़ावा देने से समर्थित है।"
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इसमें कहा गया है कि भारत में, 2025 की दूसरी छमाही में आर्थिक गतिविधियों में नरमी आई क्योंकि अगस्त 2025 में 50 प्रतिशत टैरिफ लागू होने के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका को निर्यात में 25% की गिरावट आई। सेवा क्षेत्र विकास का एक प्रमुख चालक बना रहा। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि भारत 2026 में 6.4% और अगले वर्ष 6.6% की विकास दर दर्ज करेगा। देश में मुद्रास्फीति इस वर्ष 4.4% और 2027 में 4.3% रहने का अनुमान है।
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रिपोर्ट में कहा गया है कि व्यापारिक तनाव और भू-राजनीतिक अनिश्चितता के बीच विकासशील एशियाई और प्रशांत अर्थव्यवस्थाओं में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) में गिरावट आई है। 2024 में 0.6% की वृद्धि के बाद, 2025 में इस क्षेत्र में एफडीआई में 2% की गिरावट आई, जबकि वैश्विक प्रवाह में 14% की वृद्धि हुई।
इसमें कहा गया है, "एशिया-प्रशांत क्षेत्र के भीतर, पहली तीन तिमाहियों में ग्रीनफील्ड एफडीआई का सबसे बड़ा हिस्सा आकर्षित करने वाले देश भारत, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया गणराज्य और कजाकिस्तान थे, जिन्होंने क्रमशः 50 अरब अमेरिकी डॉलर, 30 अरब अमेरिकी डॉलर, 25 अरब अमेरिकी डॉलर और 21 अरब अमेरिकी डॉलर के निवेश की घोषणा की।"
भारत के विकास की बुनियाद मजबूत: इंडिया स्ट्रैटेजी रिपोर्ट
भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की चढ़ती कीमतों और आपूर्ति श्रृंखला में बाधाओं के चलते भारत की मौजूदा विकास में कुछ समय के लिए चुनौतिपूर्ण दौर देखा जा सकता है, हालांकि दीर्घकालिक नजरिए से भारत के विकास की बुनियाद मजबूत बनी हुई है, लेकिन महंगाई, ब्याज दरों की चिंता और विदेशी मांग से जुड़ी निकट भविष्य की चुनौतियां आर्थिक विकास पर असर डाल सकती हैं। पीएल कैपिटल ने अपनी इंडिया स्ट्रैटेजी रिपोर्ट में इस बात की जानकारी देते हुए बताया, कि मौजूदा बाजार मूल्यांकन इन प्रतिकूलताओं को पहले से दिखा रहा है, लेकिन वैश्विक स्तर पर उथल-पुथल लंबे समय तक बनी रहती हैं तो कंपनियों के कमाई के अनुमानों में कटौती हो सकती है। फिलहाल बुनियादी ढांचे में बढ़ते निवेश, औद्योगिक उत्पादन और बैंकिंग प्रणाली की स्थितरा जैसे अनुकूल घरेलू वजहों से भारत के विकास की बुनियाद मजबूत बनी हुई है।
बाजार की चाल अभी भी अनिश्चित
रिपोर्ट में कहा गया है, भू-राजनीतिक अस्थिरता विशेषकर पश्चिम एशिया संकट की वजह से विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफपीआई) की लगातार निकासी के कारण पिछले तीन महीनों में निफ्टी 6.6 प्रतिशत गिरा है। हाल ही में सबसे निचले स्तर को छूने के बाजार में तेजी आई, लेकिन वैश्विक जोखिमों और बढ़ती कमोडिटी कीमतों की वजह से बाजार की चाल अभी भी अनिश्चित बनी हुई है। कमाई में मामूली सुधार हुआ है। इसलिए वित्त वर्ष 2026 में निफ्टी ईपीएस में 4 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान है। वहीं मध्यम अवधि के पूर्वानुमान में वित्त वर्ष 27-28 के दौरान 15 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि की दर रहने की उम्मीद इस रिपोर्ट में लगाई है।
तेल की कीमतों से नई चुनौतियां
रिपोर्ट के अनुसार कच्चे तेल कीमतें बड़ी चुनौतियां पैदा कर रही हैं, क्योंकि देश अपनी कुल तेल की जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से हर साल तेल आयात पर 70 अरब डॉलर से अधिक का अतिरिक्त बोझ पड़ता सकता है, जिससे मंहगाई 5 प्रतिशत से अधिक हो सकती है। इसके अलावा आपूर्ति में रुकावटें और मॉनसून पर अल नीनो के असर की आशंका से महंगाई और बढ़ सकती है। फिलहाल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) विकास दर फिलहाल 6.5 प्रतिशत के करीब है और यह घटकर 6 प्रतिशत तक आ सकती है।
तेल कीमतें बढ़ने के बाद नके युद्ध से पहली कीमतों पर लौटने की संभावना कम
रिपोर्ट में दावा किया है, कि तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है और इनके अब युद्ध के पूर्व स्तर पर लौटने की संभावना कम है। भारत प्रतिदिन 43 लाख बैरल कच्चा तेल आयात करता है, (जिसकी कीमत 180 अरब डॉलर है) और सालाना आयात बिल 70 अरब डॉलर से ज्यादा बढ़ सकता है। आपूर्ति श्रृंखला में बदलाव और आयात स्रोतों के विविधीकरण से कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे प्रमुख शिपिंग मार्ग अहम जोखिम कारक बने रहेंगे।
हालांकि बढ़ती माल-भाड़ा और बीमा लागत, तथा सीमित रिफाइनिंग क्षमता के चलते कीमतें ऊंची बनी रह सकती हैं। हमारा मानना है कि आने वाले महीनों में ऊंची कच्चे तेल की कीमतों के बाद के प्रभाव महंगाई, मांग और मैन्युफैक्चरिंग पर असर डालेंगे।
निफ्टी का प्रदर्शन
मूल्यांकन की बात करें तो निफ्टी शेयर बाजार इस समय अपने एक साल के फॉरवर्ड अर्निंग मल्टीपल के 17 गुना पर कारोबार कर रहा है, जो 15 साल के ऐतिहासिक औसत 19.4 गुना से 12.4% की छूट पर है। आधार परिदृश्य में यह माना गया है कि वैल्यूएशन 17.5 गुना रहेगा, यानी ऐतिहासिक औसत से 10 प्रतिशत की छूट, और वित्त वर्ष 28 की प्रति शेयर आय 1,551 रुपये के आधार पर टार्गेट प्राइस 27,080 आता है। भविष्य में कॉर्पारेट का प्रदर्शन बेहतर रहने, वित्त वर्ष अंतिम तिमाही में सभी क्षेत्रों में मांग बनी रहेगी। कंपनियों का राजस्व और कर पूर्व लाभ 11.3%, 6.3% और 5.7% बढ़ने का अनुमान है। लेकिन कंपनियों की इनपुट कीमतें बढ़ने से मार्जिन पर दबवा बढ़ रहा है और अधिकतर क्षेत्रों का मुनाफा कम हो रहा है।
घरेलू मांग की स्थिरता से ग्रामीण और शहरी मांग को सहारा
घरेलू मांग स्थिर बनी हुई है, जिसे ग्रामीण क्षेत्र की मजबूती और शहरी मांग में सुधार का सहारा मिल रहा है। जीएसटी के युक्तिसंगत बनाने, पिछली तिमाहियों में कम महंगाई और स्थिर ब्याज दरों ने उपभोग के रुझान में सुधार में मदद की है। लेकिन ऊंची कच्चे तेल की कीमतें, महंगाई और प्रतिकूल मौसम जैसे द्वितीयक प्रभाव भविष्य की मांग को सीमित कर सकते हैं।
मानसून सीजन में अल नीनो की संभावना
स्काई मेट और अन्य मौसम एजेंसियों ने आगामी मानसून सीजन में अल नीनो की संभावना जताई है और बारिश दीर्घकालिक औसत के 94 प्रतिशत यानी सामान्य से कम रहने का अनुमान है। पूर्वानुमान के अनुसार मानसून की गतिविधि सीजन के दौरान धीरे-धीरे कमजोर पड़ेगी और उत्तर, पश्चिम व मध्य भारत के कुछ हिस्सों में सूखे का खतरा बढ़ेगा। आर्थिक नजरिये से यह खरीफ उत्पादन, जलाशयों के स्तर, खाद्य महंगाई और ग्रामीण मांग के लिए चिंता का विषय है।