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RBI MPC: सस्ती ईएमआई का इंतजार होगा लंबा, महंगे कच्चे तेल के कारण वेट एंड वॉच की नीति अपना सकता है आरबीआई

Sat, 04 Apr 2026 05:50 PM IST
Navita R Asthana बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, मुंबई Published by: Navita R Asthana Updated Sat, 04 Apr 2026 05:50 PM IST
सार

पश्चिम एशिया तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच आरबीआई की एमपीसी मीटिंग से क्या उम्मीदें हैं? जानें क्यों ब्याज दरों में कटौती की संभावना इस बार न के बराबर है और महंगाई पर इसका क्या असर होगा। पूरी खबर पढ़ें।

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RBI is not expected to cut interest rates emphasis will be on maintaining balance between growth and inflation
आरबीआई एमपीसी की पिछली बैठक में क्या हुआ? - फोटो : amarujala.com

विस्तार

पश्चिम एशिया के संघर्ष के बीच कच्चे तेल की भड़कती कीमतों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदल दी है, जिसका सीधा असर अब घरेलू बाजार पर पड़ने की आशंका है। आगामी मौद्रिक नीति समिति की बैठक में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद लगाए बैठे कर्जदारों को फिलहाल निराशा हाथ लग सकती है। विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों के अनुसार, विकास की गति और महंगाई के बीच सटीक संतुलन साधने के लिए केंद्रीय बैंक इस बार 'वेट एंड वॉच' की रणनीति अपनाएगा और रेपो रेट को जस का तस बनाए रखेगा। 

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कब से कब तक होनी है आरबीआई एमपीसी की बैठक?

पश्चिम एशिया के तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच बाजार की निगाहें वित्त वर्ष 2026-27 की पहली द्वि-मासिक मौद्रिक नीति समीक्षा पर टिक गई हैं, जिसके लिए भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की बैठक 6 से 8 अप्रैल 2026 तक होगी। इस महत्वपूर्ण बैठक के परिणाम और मुख्य नीतिगत दरों (रेपो रेट) पर रिजर्व बैंक के अंतिम निर्णय की घोषणा 8 अप्रैल 2026 को की जाएगी। विदेशी बाजारों में ब्रेंट क्रूड ऑयल के 55% तक महंगे होने और घरेलू स्तर पर विनिर्माण पीएमआई के चार साल के सबसे निचले स्तर पर आने के कारण रिजर्व बैंक के सामने कई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। 

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आइए जानते हैं कि मौजूदा भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति शृंखला में रुकावटों के बीच देश की अर्थव्यवस्था और आपकी जेब को लेकर आरबीआई का क्या आउटलुक रहने वाला है।
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विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों का कहना है, भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई)  फरवरी 2026 में घोषित पिछली मॉनिटरी पॉलिसी की घोषणा भारत के साथ कई देशों के मुक्त व्यापार समझौते की बाद हुई थी, महंगाई के अच्छे आउटलुक, घरेलू अर्थव्यवस्था वृद्धि की अच्छी रफ्तार और बाहरी संभावनाओं में सुधार के परिपक्ष में तय की गई थी। हालांकि मॉनेटरी पॉलिसी बैठक के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था में बहुत अधिक बदलाव हुआ है, जिसमें पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष से वैश्विक ऊर्जा ट्रेड को खतरा पैदा हो गया है। वहीं, ऊर्जा की कीमतों में भारी बढ़ोतरी हुई है। 

पश्चिम एशिया में संघर्ष की शुरुआत से कच्चा तेल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस की कीमतों में क्रमशः 55% और 90% की बढ़ोतरी हुई है। इसके अलावा बिगड़ती भू-राजनीतिक स्थिति का असर वैश्विक कमोडिटी की कीमतों, करेंसी की चाल और बड़े वित्तीय बाजार में महसूस किया जा रहा है। कुल मिलाकर इस संघर्ष ने न केवल बढ़ती वैश्विक एनर्जी कीमतों के बारे में बल्कि आपूर्ति चेन में रुकावटों के बारे में चिंताएं पैदा की हैं, जिसका असर विकास की गति और महंगाई पर पड़ सकता है।

वेट एंड वॉच की रणनीति पर आगे बढ़ेगा आरबीआई

केयरएज रेटिंग एजेंसी के मुख्य अर्थशास्त्री रजनी सिन्हा ने कहा, "बहुत अधिक उतार-चढ़ाव वाले इस वैश्विक माहौल के बीच हम उम्मीद करते हैं कि रेपो रेट यानी ब्याज दर कटौती पर आरबीआई का रुख जैसा है वैसा ही बना रहेगा।" उन्होंने कहा कि केंद्रीय बैंक आगामी बैठक में बदलती भू-राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर रखेगा। सिन्हा के अनुसार वेट एंड वॉच की रणनीति आरबीआई को विकास और महंगाई के जोखिमों का अनुमान लगाने, भविष्य में ब्याज दरों पर सोच-समझकर फैसला लेने और फ्लेक्सिबिलिटी बनाए रखने में मदद करेगी। वे कहते है कि आनेवाली पॉलिसी पर वित्त वर्ष 2027 के लिए आरबीआई के ग्रोथ और महंगाई के आउटलुक के लिए करीब से नजर रखी जाएगी।

RBI is not expected to cut interest rates emphasis will be on maintaining balance between growth and inflation
पिछली एमपीसी बैठक के बाद आरबीआई गवर्नर। - फोटो : amarujala.com

लिक्विडिटी में धीरे-धीरे बदलाव की उम्मीद

एसबीआई में ग्रुप चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर सौम्य कांति घोष कहते हैं, आरबीआई बाजार की स्थिति को देखते हुए लिक्विडिटी में धीरे-धीरे बदलाव कर सकता है। केंद्रीय बैंक के पास यह सुविधा है कि वह परिस्थितियों के अनुसार कैश की उपलब्ध्ता को सुरक्षित करें। 

महंगाई पर रहेगी नजर

जियोजित इन्वेस्टमेंट लिमिटेड के रिसर्च हेड विनोद नायर कहते हैं, अगला हफ्ता घरेलू मोर्चे पर बड़ा होगा। क्योंकि आरबीआई की एमपीसी की बैठक सबसे महत्वपूर्ण होगी, जबकि ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं होने की लगभग पूरी संभावना है या कहें रेट पॉज पर सहमति है। केंद्रीय बैंक कच्चे तेल से होने वाली महंगाई के रिस्क और चार साल के सबसे निचले विनिर्माण पीएमआई के बीच संतुलन बना रहा है, जो विकास की गति में नरमी के संकेत दे रहा है। नायर बताते हैं, दर चक्र की दिशा और वित्त वर्ष 2027 के अनुमान पर गवर्नर की टिप्पणी क्या होती है इस पर नजर रखनी होगी।

जानकारों का कहना है, वैश्विक स्तर पर देखें तो मार्च में जारी होने वाले अमेरिकी सीपीआई के आंकड़े बेहद महत्वपूर्ण हैं। उम्मीद से अधिक सकरात्मक रुझान फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद पर पानी फेर सकते हैं और डॉलर को मजबूती प्रदान कर सकते हैं। इससे भारत सहित उभरते बाजारों के लिए वित्तीय स्थिति को और भी कठिन बन सकती है। जानकार कहते हैं कि आरबीआई को रुपये की कमजोरी को देखकर जल्दबाजी में ब्याज दरों में बदलाव नहीं करना चाहिए। ब्याज दरों का उद्देश्य एक्सचेंज पर रेट को संभालना नहीं बल्कि महंगाई को न बढ़ने देना होना चाहिए।

पश्चिम एशिया संकट के कारण आरबीआई की राह कठिन

केयरएज रिेटिंग्स की रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध की वजह से आरबीआई एमपीसी की बैठक की मुश्किलें बढ़ी हुई हैं। हमें उम्मीद है कि आरबीआई ब्याज दरों और अपने रुख को एक जैसा बनाए रखेगा, साथ ही बदलते भू-राजनीतिक हालात पर नजर रखेगा। वित्त वर्ष 2027 के लिए आरबीआई की विकास की गति और महंगाई के आउटलुकर के लिए आने वाली पॉलिसी पर करीब से नजर रखी जाएगी, विशेषकर वैश्विक स्तर पर बढ़े हुए जोखिमों पर।

रिपोर्ट के अनुसार जनवरी 2026 में रिटेल महंगाई दर 2.74 प्रतिशत थी, जो फरवरी 2026 में बढ़कर 3.21 प्रतिशत पर आ गई। हालांकि महंगाई दर आरबीआई के 4 प्रतिशत के मध्य अवधि के लक्ष्य के दायरे में बनी हुई है, लेकिन कच्चे तेल कीमतों में उछाल महंगाई बढ़ने का अनुमान है, जहां प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तर से असर पड़ेगा। कच्चे तेल बढ़ती कीमतों से ईंधन व एलपीजी तथा परिवहन खर्च भी बढ़ जाता है। इससे सभी सेक्टरर्स की इनपुट लगात भी बढ़ जाती है। भले ही सरकार की ओर से आपूर्ति सुरक्षित है, लेकिन आपूर्ति में रुकावटों ने महंगाई बढ़ाने का खतरा बढ़ा दिया है। इसलिए एमपीसी इस बात का आंकलन करेगी कि दबाव कुछ समय के लिए है या फिर लंबे समय तक पड़ेगा।

रिपोर्ट में अनुमान जताया गया है कि यदि वर्ष वित्त 2027 में वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें औसत 90 अमेरिकी डॉलर प्रति आंकड़े पर रहती हैं, तो हमें भारत की वृद्धि दर में गिरावट की उम्मीद है और यह दर 6.7% होगी। वित्तीय वर्ष 2027 के आधारभूत अनुमान के अनुसार, उपभोक्ता पर वैश्विक कच्चे तेल की उच्च कीमतों के सीमित प्रभाव को मानते हुए, सीपीआई मुद्रास्फीति 4.5-4.7% के बीच रहने का अनुमान है। साथ ही वैश्विक अनिश्चितता, बढ़ते राजकोषीय बोझ और मुद्रास्फीति के दबाव के बीच जी-सेक यील्ड पर ऊपर की ओर दबाव पड़ने की आशंका है।

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