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RBI: आरबीआई गवर्नर का बैंकों को संदेश; बोले- नियामकीय कार्रवाई का मकसद किसी को सजा देना नहीं, सुधार करना

Fri, 09 Jan 2026 05:09 PM IST
कुमार विवेक बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कुमार विवेक Updated Fri, 09 Jan 2026 05:09 PM IST
सार

RBI Governor Sanjay Malhotra: भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बैंकों को साफ संदेश दिया है कि केंद्रीय बैंक नियामक के तौर पर एक इंस्पेक्टर नहीं, बल्कि पार्टनर है। केंद्रीय बैंक के गवर्नर ने आगे क्या कहा पढ़ें।

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आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा - फोटो : PTI

विस्तार

बैंकिंग क्षेत्र के नियामक भारतीय रिजर्व बैंक ने देश के बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र के लिए एक सकारात्मक और सहयोग भरे नजरिए की वकालत की है। शुक्रवार को मुंबई में 'कॉलेज ऑफ सुपरवाइजर्स' के तीसरे वार्षिक वैश्विक सम्मेलन में बोलते हुए, आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने साफ किया कि नियामक की ओर से की गई कार्रवाई सबसे प्रभावी तब होती है जब बैंक और अन्य विनियमित संस्थाएं पर्यवेक्षकों को 'गलतियां निकालने वाले इंस्पेक्टर' नहीं, बल्कि साझेदार के रूप में देखें। 

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आरबीआई गवर्नर का यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारतीय वित्तीय प्रणाली में बैंकों की भूमिका वित्तीय मध्यस्थता और समावेशी विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। गवर्नर ने जोर देकर कहा कि भारत जैसे देश के लिए नियामक और बैंकों के बीच सहयोग वाले नजरिए की केवल जरूरत नहीं है, बल्कि यह अनिवार्य है।  
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कार्रवाई का उद्देश्य दंड देना नहीं, सुधार करना
आरबीआई के गवर्नर ने कहा कि अक्सर केंद्रीय बैंक की ओर से की जाने वाली सख्त कार्रवाई के बारे में बाजार में आशंकाएं बनी रहती हैं। इस पर स्थिति साफ करते हुए गवर्नर ने कहा कि रिजर्व बैंक की ओर से की जाने वाली प्रवर्तन कार्रवाइयों का मकसद आमतौर पर बैंकों को सजा देना नहीं होता है। उन्होंने बताया कि इसका मुख्य इरादा सुधार करना होता है।
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आरबीआई गवर्नर के अनुसार, इन कार्रवाइयों के दो मुख्य उद्देश्य होते हैं। पहला जिन संस्थाओं के खिलाफ कदम उठाए गए हैं, उन्हें संकेत देना और दूसरा, अन्य संस्थाओं को स्वीकार्य मानकों और नियामक की अपेक्षाओं के प्रति जागरूक करना।

पर्यवेक्षण से नीतियों में सुधार
गवर्नर के अनुसार, आरबीआई मानता है कि पर्यवेक्षण का काम केवल मौजूदा नियमों को लागू करना नहीं है, बल्कि यह नियामकीय कमी और गड़बड़ियों को पहचानकर नियमों को और बेहतर बनाने में भी मदद करता है। गवर्नर ने उदाहरण देते हुए बताया कि पिछले साल को-लैंडिंग और सोने-चांदी के आभूषणों के बदले ऋणों से जुड़े निर्देशों में किए गए संशोधन इसी प्रक्रिया का परिणाम थे।

एक ही टीम के सदस्य हैं नियामक और बैंक
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने अपने संबोधन के दौरान कहा कि नियामक और विनियमित संस्थाएं (जैसे बैंक, एनबीएफसी इत्यादि) विरोधी खेमे में नहीं हैं, बल्कि एक ही टीम का हिस्सा हैं। उन्होंने कहा, "हम राष्ट्र के विकास में भागीदार हैं। नियामक और विनियमित संस्थाओं- दोनों का उद्देश्य एक ही है। यह उद्देश्य है- लंबे समय में वित्तीय प्रणाली को विकसित करना, इसमें स्थिरता लाना, अखंडता व विश्वसनीयता सुनिश्चित करना"।

मल्होत्रा ने यह भी कहा कि सफलता का पैमाना केवल स्थिरता तक सीमित नहीं है, बल्कि वित्तीय क्षेत्र में गतिशीलता और जीवंतता बनी रहनी जरूरी है। इसलिए, विकास और प्रणालीगत स्थिरता के बीच, जिम्मेदार नवाचार और उपभोक्ता संरक्षण के बीच सही संतुलन बनाना जरूरी है।

बैंकों को 'टिक-बॉक्स' संस्कृति से ऊपर उठने की जरूरत
डिजिटल युग में बदलते जोखिमों के प्रति बैंकों को आगाह करते हुए गवर्नर मल्होत्रा ने कहा कि संस्थाओं को केवल "टिक-बॉक्स आधारित अनुपालन संस्कृति" का पालन करने से बचना चाहिए। संस्थाओं की ओर से विनियमन के सार और उसकी भावना को आत्मसात करने की आवश्यकता है। यह विशेष रूप से उन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण है जहां नए मॉडल, डेटा और डिजिटल डिलीवरी जोखिम के नए रूप पैदा कर रहे हैं।


आरबीआई ने साफ किया है कि पर्यवेक्षी कार्रवाई और प्रवर्तन को विनियमन के सबसे दृश्यमान पहलू के रूप में देखा जाता है, लेकिन इसे एक स्टैंडअलोन प्रतिक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि पर्यवेक्षी उपकरणों के रूप में देखा जाना चाहिए। यह दृष्टिकोण न केवल बैंकों के परिचालन को आसान बनाएगा, बल्कि भारत की वित्तीय प्रणाली को लंबे समय में अधिक स्थिर बनाकर इसे विकास की ओर ले जाएगा।

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