पीएमओ ने 'मेक इन इंडिया' के जरिए चीन को जवाब देने के लिए कसी कमर, दुनिया देखेगी असर
पीएमओ ने डिपार्टमेंट ऑफ प्रमोशन ऑफ इंडस्ट्री एंड ट्रेड के अलावा विभिन्न मंत्रालयों में भी ऐसे सेल बनाए हैं, जिनकी मदद से निवेशकों को प्रोत्साहित किया जाएगा। निवेशकों को इज ऑफ डुईंग बिजनेस के बारे में पूर्ण जानकारी मिलेगी...
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लद्दाख की गलवां घाटी में धोखे और कायरता से भारतीय सैनिकों को मारने वाले चीन को आर्थिक प्लेटफार्म पर जवाब देने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय ने कमर कस ली है। देश में ज्यादा से ज्यादा निवेश आए, इसके लिए 'इन्वेस्ट इंडिया योजना' पर खास फोकस किया जा रहा है।
निवेशक को पूर्ण जानकारी देने के लिए अलग अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञ नियुक्त किए गए हैं। यदि कोई ईमेल पर जानकारी चाहता है, तो उसे एक्सपर्ट कमेंट के साथ तमाम पहलुओं से अवगत कराया जाता है।
उन क्षेत्रों को प्रमुखता से उठाया जा रहा है, जिनमें सौ फीसदी एफडीआई यानी विदेशी निवेश का प्रावधान है। विदेश में बैठे ऐसे निवेशक जो संबंधित क्षेत्र की केवल सूचना लेना चाहते हैं, उनका नाम गोपनीय रखा जाता है।
केंद्र सरकार के एक अधिकारी के मुताबिक, विदेशी निवेश के लिए ऑटोमोबाइल, एविएशन, बायोटेक्नोलॉजी, कैपिटल गुड्स, इलेक्ट्रॉनिक, हेल्थकेयर और फूड प्रोसेसिंग आदि पर विशेष ध्यान दिया गया है।
साथ ही चीनी कंपनियों के निवेश आवेदनों को सिक्योरिटी क्लीयरेंस देने की प्रक्रिया अब जटिल बनाई जा रही है।
पीएमओ ने डिपार्टमेंट ऑफ प्रमोशन ऑफ इंडस्ट्री एंड ट्रेड के अलावा विभिन्न मंत्रालयों में भी ऐसे सेल बनाए हैं, जिनकी मदद से निवेशकों को प्रोत्साहित किया जाएगा। निवेशकों को इज ऑफ डुईंग बिजनेस के बारे में पूर्ण जानकारी मिलेगी।
इसके लिए पिछले एक दशक की इंडस्ट्री रिपोर्ट भी तैयार की गई है। इसमें बताया गया है कि एक दशक पहले 11.6 फीसदी वार्षिक दर के हिसाब से निर्यात मार्केट बढ़ा था, 2015 में यही निर्यात मार्केट 310 बिलियन यूएस डॉलर को पार कर गया।
इसके अलावा निवेशकों को यह बताया जा रहा है कि भारत विश्व की तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। भारत विश्व के दस एफडीआई डेस्टिनेशंस में से एक है। साथ ही निवेशकों से यह बात विशेष तौर पर कही जाती है कि 2014 में 356 मिलियन जनसंख्या ऐसी रही है, जिसकी औसत आयु 10 से 24 वर्ष थी।
अब उसी वर्किंग पॉपुलेशन की बात करें तो 20 से 35 वर्ष वालों का अनुपात 64 फीसदी है। एफडीआई के लिए ऑटोमोबाइल, फूड प्रोसेसिंग और कंस्ट्रक्शन क्षेत्र को तव्वजो दी गई है।
निवेशकों को यह न लगे कि कोई उनके साथ कुछ गलत कर सकता है, तो उसके लिए सेबी और सीसीआई संस्थाओं की मदद ली गई है।
भारत ने निवेश प्रक्रिया को तेज करने के लिए कई देशों के साथ एमओयू साइन किया है। दरअसल, ये विदेशी संगठन इन्वेस्टमेंट प्रमोशन एजेंसी के तौर पर काम करते हैं।
इनमें जेट्रो जापान, इन्वेस्ट इन अमेरिका, यूके ट्रेड एंड इन्वेस्ट, यूके इंडिया बिजनेस काउंसिल, इन्विटालिया इटली, यूबीआई फ्रांस व इन्वेस्ट इन फ्रांस, चेक इन्वेस्ट चेक गणराज्य, कोतरा साउथ कोरिया, बीआईओ मॉरीशस, जेनेक्स इन्वेस्ट कजाकिस्तान और साउदी अरब जनरल इन्वेस्टमेंट अथॉरिटी शामिल हैं।
इन सभी एजेंसियों के साथ भारतीय प्रतिनिधियों द्वारा नियमित बातचीत की जा रही है। इन्वेस्टमेंट इंडिया को विदेशों में स्थित सभी भारतीय दूतावासों से भी मदद मिलती है।
चीनी कंपनियों पर कस रहा है शिकंजा
सीमा विवाद के चलते केंद्रीय गृह मंत्रालय ने भी चीनी कंपनियों पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। किसी भी विदेशी कंपनी को भारत में कारोबार करने से पहले सिक्योरिटी इश्यू को लेकर गृह मंत्रालय की मंजूरी लेनी पड़ती है।
सूत्र बताते हैं कि दोनों देशों के ताजा प्रकरण में चीन की कई ऐसी कंपनियां हैं, जिन्होंने भारत में निवेश करने के लिए आवेदन दे रखा है। अब हो सकता है कि इन कंपनियों को सिक्योरिटी क्लीयरेंस न मिले।
गृह मंत्रालय को प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के करीब दो दर्जन आवेदन मिले हैं। जिन देशों की कंपनियों ने आवेदन किया है, उनमें हॉगकांग, चीन व कई अन्य देश भी शामिल हैं।
चीनी कंपनियों के आवेदनों की गहराई से जांच हो रही है। सूत्रों के अनुसार, ऐसा संभावित है कि जांच के बाद चीन की कई कंपनियों को भारत में निवेश करने की इजाजत न मिले।