Pax Silica Explainer: तेल-हथियारों का दौर खत्म, अब चिप तय करेगा दुनिया में किसकी चलेगी? जानें भारत की भूमिका
कोविड-19 के बाद चिप किल्लत'से जन्मी नई वैश्विक व्यवस्था 'पैक्स सिलिका' की शुरुआत कैसे हुई? दुनिया में जारी सेमीकंडक्टर रेस में भारत की रणनीतिक भूमिका क्या है? पढ़ें इससे जुड़ी पूरी रिपोर्ट।
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बीसवीं सदी में दुनिया पर राज करने के लिए तेल और स्टील की जरूरत होती थी, लेकिन 21वीं सदी की महाशक्ति अब एक छोटी सी सिलिकॉन चिप तय कर रही है। इसी तर्ज पर दुनिया 'पैक्स सिलिका' के एक नए युग में प्रवेश कर चुकी है। यह अमेरिका के नेतृत्व वाला एक ऐसा आक्रामक भू-राजनीतिक और आर्थिक गठबंधन है, जिसने सेमीकंडक्टर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की दुनिया में चीन के एकाधिकार को तोड़ने के लिए कूटनीतिक बिसात बिछा दी है। इस वैश्विक रेस में सबसे बड़ा उलटफेर करते हुए भारत ने 20 फरवरी 2026 को इस एलीट ग्रुप में अपनी औपचारिक एंट्री दर्ज करा ली है। यह कदम भारत को महज एक आयातक से निकालकर चीन के सबसे बड़े और मजबूत विकल्प के रूप में स्थापित करने जा रहा है।
कैसे हुआ पैक्स सिलिका का जन्म?
- ऐतिहासिक संदर्भ: जिस तरह अतीत में 'पैक्स रोमाना' या 'पैक्स अमेरिकाना' ने वैश्विक शक्ति संतुलन को परिभाषित किया था, आज वही भूमिका चिप्स और डेटा नियंत्रण की है।
- कोविड-19 का प्रभाव: इसकी जड़ें महामारी के दौरान चरमराई वैश्विक आपूर्ति शृंखला और दुनिया भर में पैदा हुई चिप की भारी किल्लत में हैं।
- रणनीतिक निर्भरता का अहसास: प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं ने महसूस किया कि ऑटोमोबाइल से लेकर रक्षा उपकरणों तक, उनकी पूरी औद्योगिक मशीनरी कुछ विशिष्ट एशियाई देशों पर अत्यधिक निर्भर है।
- भू-राजनीतिक अस्थिरता: अमेरिका-चीन के बीच बढ़ते तकनीकी तनाव और ताइवान जलडमरूमध्य की अनिश्चितता ने इस विचार को जन्म दिया कि भविष्य की वैश्विक शांति अब 'सिलिका' के निर्बाध प्रवाह पर निर्भर है।
क्या है पैक्स सिलिका का मकसद?
- आपूर्ति शृंखला में लचीलापन: गठबंधन का घोषित लक्ष्य वैश्विक स्तर पर एक मजबूत और लचीली सप्लाई चेन तैयार करना है।
- चीन को अलग-थलग करना: इसका एक बड़ा छिपा हुआ उद्देश्य सेमीकंडक्टर क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकना और उसे वैश्विक व्यवस्था से अलग करना है।
- दुर्लभ खनिजों पर काउंटर: वर्तमान में 60% से अधिक दुर्लभ खनिजों के प्रसंस्करण पर चीन का कब्जा है, जिसे चुनौती देना इस गठबंधन की प्राथमिकता है।
- मूविंग गैप सिद्धांत: वाशिंगटन इस सिद्धांत के माध्यम से एआई और सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में चीन पर एक स्थायी तकनीकी बढ़त बनाए रखना चाहता है।
- सिलिकॉन कर्टेन: सहयोगी देशों के बीच निर्यात नियंत्रण और पूंजी समन्वय के जरिए एक 'सिलिकॉन पर्दा' तैयार करना, ताकि चीन को अत्याधुनिक एआई मॉडल बनाने वाले उपकरणों से वंचित रखा जा सके।
कौन-कौन से देश हैं पैक्स सिलिका का हिस्सा?
इस महा-गठबंधन में ऑस्ट्रेलिया, इस्राइल, जापान, नीदरलैंड, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, अमेरिका और ब्रिटेन शामिल हैं, जबकि ताइवान एक पर्यवेक्षक की भूमिका में है। हाल ही में यूएई और कतर जैसे देशों के जुड़ने से इस समूह को सस्ती ऊर्जा का भी लाभ मिला है। इस पारिस्थितिकी तंत्र में अमेरिका डिजाइन, सॉफ्टवेयर और बौद्धिक संपदा (आईपी) का नेतृत्व कर रहा है। ताइवान अपनी दिग्गज कंपनी टीएसएमसी (टीएसएमसी) के जरिए उन्नत चिप्स का निर्माण कर रहा है, जबकि जापान और नीदरलैंड लिथोग्राफी जैसे जटिल उपकरणों की आपूर्ति में अपना एकाधिकार रखते हैं।
पैक्स सिलिका समूह में भारत के शामिल होने का क्या मतलब?
अमेरिका-भारत व्यापार समझौते के बाद कूटनीतिक संबंधों में आई गर्माहट के चलते भारत ने इस गठबंधन में अपनी जगह पक्की की है। भारत की यह एंट्री दुनिया को एक स्पष्ट संदेश है कि कोई भी 'चाइना प्लस वन' रणनीति नई दिल्ली के बिना पूरी नहीं हो सकती। भारत इस गठबंधन की मेज पर दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा दुर्लभ पृथ्वी भंडार, 1.45 अरब नागरिकों का डेटा और एक विशाल जनसांख्यिकीय लाभांश लेकर आया है। इसके अलावा, दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत सेमीकंडक्टर डिजाइनर पहले से ही भारत में मौजूद हैं, जो इसे चिप डिजाइन का ग्लोबल पावरहाउस बनाते हैं। पैक्स सिलिका में शामिल होने से 'सेमीकॉन इंडिया' को जबर्दस्त रफ्तार मिलेगी, विदेशी निवेश (एफडीआई) आएगा और टाटा ग्रुप जैसी भारतीय कंपनियों को माइक्रोन जैसी ग्लोबल चिप कंपनियों के साथ काम करने का बड़ा मौका मिलेगा। भारत अब चिप्स का केवल उपभोग नहीं करेगा, बल्कि असेंबली, टेस्टिंग, मार्किंग और पैकेजिंग (एटीएमपी) में भी अपना दबदबा बनाएगा।
पैक्स सिलिका में शामिल होने के बीच भारत के लिए क्या सावधानी जरूरी?
हालांकि, पैक्स सिलिका का सफर भारत के लिए पूरी तरह से आसान नहीं होगा। इस एलीट क्लब में नई दिल्ली को कई नीतिगत चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। भारत अपने घरेलू टेक सेक्टर को बचाने के लिए संरक्षणवादी नीतियों, भारी सब्सिडी और आयात नियमों पर काफी निर्भर करता है। इन घरेलू नीतियों का पैक्स सिलिका के मुक्त-बाजार दृष्टिकोण और समन्वित एंटी-डंपिंग उपायों के साथ टकराव हो सकता है, जिसके लिए भारत को बेहद सधी हुई कूटनीति की आवश्यकता होगी।
पैक्स सिलिका में शामिल होना भारत के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ है। यह बताता है भारत अब वैश्विक तकनीक का भविष्य तय करने वाले इस संभ्रांत गठबंधन में अपनी स्थायी जगह बना चुका है। एआई और चिप्स के इस वैश्विक महायुद्ध में भारत का एक निर्णायक महाशक्ति के रूप में उभरना तय है।