Nuvama Report: भारतीय IT कंपनियों ने आठ साल में H-1B वीजा पर निर्भरता घटाई, स्थानीय भर्तियों पर दे रहीं ध्यान
नुवामा की रिपोर्ट के अनुसार भारतीय आईटी कंपनियों ने बीते आठ वर्षों में एच-1बी वीजा पर निर्भरता को काफी हद तक कम कर लिया है। यही वजह है कि नए फैसले का झटका कंपनियां आसानी से झेल सकेंगी। साथ ही कंपनियां अब पहले से ज्यादा लोकल हायरिंग पर ध्यान दे रही हैं, जिससे ऐसे नीति-आधारित बदलावों का असर सीमित हो जाता है।
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एच-1बी वीजा फीस में भारी बढ़ोतरी किए जाने से भारतीय आईटी कंपनियों पर इसका प्रभाव सीमित रहेगा। नुवामा की रिपोर्ट में यह दावा किया गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने शुक्रवार, 19 सितंबर को एक कार्यकारी आदेश जारी कर एच-1बी वीजा पर नया शुल्क लागू किया है। इसके तहत अब नए एच-1बी वीजा आवेदन पर 1,500 डॉलर की जगह सीधे 100,000 डॉलर फीस देनी होगी।
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बीते आठ वर्षों में एच-1बी वीजा पर निर्भरता हुई कम
यह कदम भारतीय आईटी कंपनियों के परिचालन और वित्तीय प्रदर्शन को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, कंपनियों ने बीते आठ वर्षों में एच-1बी वीजा पर निर्भरता को काफी हद तक कम कर लिया है। यही वजह है कि नए फैसले का झटका कंपनियां आसानी से झेल सकेंगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय आईटी कंपनियां अब पहले से ज्यादा लोकल हायरिंग पर ध्यान दे रही हैं, जिससे ऐसे नीति-आधारित बदलावों का असर सीमित हो जाता है। कंपनियों को निकट अवधि में वित्तीय और परिचालन दबाव झेलना पड़ सकता है। हालांकि, लंबे समय में ऑफशोरिंग बढ़ाकर इस बोझ को काफी हद तक संतुलित करने की उम्मीद जताई जा रही है।
एच-1बी वीजा पर अतिरिक्त शुल्क देना अलाभकारी
नुवामा की रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा हालात में आईटी सर्विस कंपनियां नई बढ़ी हुई फीस का भुगतान करने की संभावना कम ही है। इसका कारण यह है कि भारतीय आईटी कंपनियों में एच-1बी वीजा धारकों की औसत सैलरी 80,000 से 1,20,000 डॉलर के बीच होती है। इसके ऊपर अतिरिक्त 1,00,000 डॉलर फीस देना वीजा को अलाभकारी बना देगा।
कंपनियां वैकल्पिक रणनीतियों पर देंगी जोर
रिपोर्ट के अनुसार, कंपनियां इस स्थिति से निपटने के लिए वैकल्पिक रणनीतियों पर जोर देंगी। इनमें क्लाइंट्स के साथ कॉन्ट्रैक्ट दोबारा तय कर लागत साझा करना, अमेरिका में लोकल टैलेंट की भर्ती बढ़ाना और कनाडा व लैटिन अमेरिका जैसे नजदीकी क्षेत्रों का विस्तार शामिल है।
सबसे बड़ा दांव ऑफशोरिंग पर लगाया जा सकता है, जहां भारत और अन्य किफायती बाजारों में काम का बड़ा हिस्सा स्थानांतरित कर खर्च को कम किया जाएगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि मध्यम और लंबी अवधि में स्थिति स्थिर हो सकती है, क्योंकि सेक्टर की कंपनियां कारोबार को अधिक कुशल बनाने के नए तरीके तलाश लेंगी।
इसमें विदेशी कर्मचारियों पर ज्यादा निर्भरता और विदेशी बाजारों में स्थानीय भर्ती को बढ़ावा देने में दिख सकता है। हालांकि, निकट भविष्य में उद्योग को ऊंची लागत वाले माहौल के अनुसार ढलने तक अस्थिरता का सामना करना पड़ सकता है।