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India-US: 8 जुलाई तक किस प्रारूप में हो सकता है व्यापार समझौता, किन क्षेत्रों में डील की संभावना, दिक्कत कहां?
Mon, 30 Jun 2025 04:52 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Mon, 30 Jun 2025 04:52 PM IST
सार
भारत और अमेरिका के बीच जिस व्यापार समझौते को लेकर बातचीत हो रही है, अगर वह लागू होता है तो उसका प्रारूप क्या हो सकता है? अमेरिका की ट्रेड डील के लिए क्या-क्या मांगें हैं? भारत इन मांगों के मद्देनजर कैसे अपने हितोंं को बचाने की कोशिश में है? दोनों देशों के लिए यह व्यापार समझौता इतना अहम क्यों है? अगर यह व्यापार समझौता होता है, तो इसमें क्या-क्या शामिल हो सकता है? आइये जानते हैं...
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नरेंद्र मोदी, डोनाल्ड ट्रंप।
- फोटो : एएनआई (फाइल)
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विस्तार
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि वह अलग-अलग देशों पर लगाए गए आयात शुल्क पर अस्थायी रोक को 9 जुलाई के आगे नहीं बढ़ाएंगे। यानी इस तारीख से अमेरिका में आयात होने वाले उत्पाद और सेवाओं पर एक तय टैरिफ लगना शुरू हो जाएगा। ट्रंप के एलान के तहत अमेरिका ने 2 अप्रैल 2025 से भारतीय उत्पादों पर 26 फीसदी टैरिफ लागू कर दिया था। हालांकि, ट्रंप ने इसके बाद 90 दिनों के लिए इस आयात शुल्क पर अस्थायी रोक लगा दी थी। अमेरिकी राष्ट्रपति ने तब यह चेतावनी देते हुए कहा था कि अमेरिकी टैरिफ से बचने के लिए देशों के पास 8 जुलाई तक का समय है। यानी आठ जुलाई से जिन भी देशों ने अमेरिका के साथ टैरिफ कम करने को लेकर समझौता नहीं किया, उन पर आयात शुल्क की बढ़ी हुई दरें लागू रहेंगी।
अब ट्रंप के ताजा एलान के बाद भारत के वाणिज्य मंत्रालय ने व्यापार समझौते को जल्द पटरी पर लाने और इससे जुड़े मतभेदों को दूर करने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। बताया जा रहा है कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते के जरिए भारत ट्रंप के 26 फीसदी टैरिफ को किनारे करने की कोशिश में है। इसके चलते दोनों देश अलग-अलग क्षेत्रों में उत्पादों और सेवाओं के लिए अपने बाजार को खोलने पर चर्चा कर रहे हैं। इस बातचीत के जल्द ही खत्म होने और दोनों देशों के बीच एक ट्रेड डील के होने के आसार हैं।
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अब ट्रंप के ताजा एलान के बाद भारत के वाणिज्य मंत्रालय ने व्यापार समझौते को जल्द पटरी पर लाने और इससे जुड़े मतभेदों को दूर करने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। बताया जा रहा है कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते के जरिए भारत ट्रंप के 26 फीसदी टैरिफ को किनारे करने की कोशिश में है। इसके चलते दोनों देश अलग-अलग क्षेत्रों में उत्पादों और सेवाओं के लिए अपने बाजार को खोलने पर चर्चा कर रहे हैं। इस बातचीत के जल्द ही खत्म होने और दोनों देशों के बीच एक ट्रेड डील के होने के आसार हैं।
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर भारत और अमेरिका के बीच जिस व्यापार समझौते को लेकर बातचीत हो रही है, अगर वह लागू होता है तो उसका प्रारूप क्या हो सकता है? अमेरिका की ट्रेड डील के लिए क्या-क्या मांगें हैं? भारत इन मांगों के मद्देनजर कैसे अपने हितोंं को बचाने की कोशिश में है? दोनों देशों के लिए यह व्यापार समझौता इतना अहम क्यों है? अगर यह व्यापार समझौता होता है, तो इसमें क्या-क्या शामिल हो सकता है? आइये जानते हैं...
पहले जानें- किस प्रारूप में लागू हो सकता है भारत-अमेरिका का व्यापार समझौता?
भारत में वाणिज्यिक मामलों में रिसर्च से जुड़ी संस्था- ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनीशिएटिव (जीटीआरआई) की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते पर बातचीत अपने अंतिम चरण में है। इस चर्चा के बाद दोनों देश एक वृहद ट्रेड डील के पहले चरण का एलान कर सकते हैं। यानी दोनों देशों के बीच एक भरे-पूरे व्यापार समझौते के होने की संभावना फिलहाल कम है। यह अंतरिम व्यापार समझौता हो सकता है, जैसा कि अमेरिका और ब्रिटेन के बीच इस साल मई में हुआ है।
भारत में वाणिज्यिक मामलों में रिसर्च से जुड़ी संस्था- ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनीशिएटिव (जीटीआरआई) की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते पर बातचीत अपने अंतिम चरण में है। इस चर्चा के बाद दोनों देश एक वृहद ट्रेड डील के पहले चरण का एलान कर सकते हैं। यानी दोनों देशों के बीच एक भरे-पूरे व्यापार समझौते के होने की संभावना फिलहाल कम है। यह अंतरिम व्यापार समझौता हो सकता है, जैसा कि अमेरिका और ब्रिटेन के बीच इस साल मई में हुआ है।
हालांकि, भारत ने अमेरिका की इन मांगों पर प्रतिरोध दिखाया है। खासकर कृषि और डेयरी के क्षेत्र में। इसकी वजह है भारत का बड़ा कृषि क्षेत्र, जो कि उपज को पैदा करने और इसकी बिक्री के लिए सबसे अधिक भारत के बाजार पर ही निर्भर है। ऐसे में अगर अमेरिका के कृषि उत्पाद कम दरों पर भारत में मुहैया होते हैं तो इससे भारतीय किसानों को झटका लग सकता है। इतना ही नहीं इससे भारत की न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) मुहैया कराने की प्रणाली भी मुश्किल में आ सकती है।
India US Trade Deal: भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर बनी सहमति; ट्रंप की समयसीमा से एक दिन पहले हो सकता है एलान
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भारत इस व्यापार समझौते से क्या चाहता है?
बताया जाता है कि व्यापार समझौते के लिए बातचीत शुरू होने के दौरान भारत अपने निर्यात किए जाने वाले प्रमुख उत्पादों पर अमेरिका से कोई आयात शुल्क नहीं चाहता था। इनमें टेक्सटाइल (कपड़ा) क्षेत्र से जुड़े उत्पाद, चमड़ा उत्पाद, फार्मा क्षेत्र के उत्पाद, कुछ इंजीनियरिंग से जुड़े उत्पाद और ऑटो क्षेत्र के उत्पाद शामिल थे।
हालांकि, कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि ट्रंप प्रशासन भारत के उत्पादों पर तुरंत टैरिफ को घटाकर शून्य रखने पर सहमत नहीं है। दूसरी तरफ भारत अमेरिका के साथ समझौते में इस बात की गारंटी भी चाहता है कि एक बार डील होने के बाद उत्पादों पर भविष्य में टैरिफ नहीं बढ़ाया जाएगा।
भारत का कृषि और डेयरी क्षेत्र अब तक सरकार के संरक्षण में रहा है। कृषि प्रधान देश होने की वजह से भारत ने लगभग सभी देशों पर टैरिफ की उच्च दरें लगाई हैं। इसके जरिए भारत अपने किसानों और उनके उत्पादों को संरक्षण देने की मंशा रखता है। इसी तरह भारत ने अब तक जितने भी देशों से मुफ्त व्यापार समझौते किए हैं, उनके लिए अपने डेयरी क्षेत्र को न खोलने का फैसला तय रखा है।
बताया जाता है कि व्यापार समझौते के लिए बातचीत शुरू होने के दौरान भारत अपने निर्यात किए जाने वाले प्रमुख उत्पादों पर अमेरिका से कोई आयात शुल्क नहीं चाहता था। इनमें टेक्सटाइल (कपड़ा) क्षेत्र से जुड़े उत्पाद, चमड़ा उत्पाद, फार्मा क्षेत्र के उत्पाद, कुछ इंजीनियरिंग से जुड़े उत्पाद और ऑटो क्षेत्र के उत्पाद शामिल थे।
हालांकि, कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि ट्रंप प्रशासन भारत के उत्पादों पर तुरंत टैरिफ को घटाकर शून्य रखने पर सहमत नहीं है। दूसरी तरफ भारत अमेरिका के साथ समझौते में इस बात की गारंटी भी चाहता है कि एक बार डील होने के बाद उत्पादों पर भविष्य में टैरिफ नहीं बढ़ाया जाएगा।
भारत का कृषि और डेयरी क्षेत्र अब तक सरकार के संरक्षण में रहा है। कृषि प्रधान देश होने की वजह से भारत ने लगभग सभी देशों पर टैरिफ की उच्च दरें लगाई हैं। इसके जरिए भारत अपने किसानों और उनके उत्पादों को संरक्षण देने की मंशा रखता है। इसी तरह भारत ने अब तक जितने भी देशों से मुफ्त व्यापार समझौते किए हैं, उनके लिए अपने डेयरी क्षेत्र को न खोलने का फैसला तय रखा है।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर क्या-क्या उम्मीदें?
- जीटीआरआई के मुताबिक, भारत-अमेरिका के बीच समझौते के लिए एक अहम कदम अमेरिकी औद्योगिक उत्पादों, जैसे ऑटो क्षेत्र पर लगाया जाने वाला भारी-भरकम टैरिफ घटाना होगा। ट्रंप बीते कई वर्षों से बाइक कंपनी हार्ले डेविडसन का उदाहरण देकर टैरिफ कम करने की मांग उठाते रहे हैं।
- इसके अलावा कृषि लेन-देन के क्षेत्र में भारत अमेरिकी उत्पादों, जैसे इथेनॉल, बादाम, सेब, एवोकाडो, वाइन व अन्य उत्पादों के टैरिफ में कुछ छूट मुहैया करा सकता है। यानी इन उत्पादों को भारत में कुछ पाबंदियों के साथ एंट्री मिल सकती है।
- हालांकि, भारत के अपने संवेदनशील सेक्टर, जैसे- डेयरी, चावल और गेहूं जैसे उत्पादों को अमेरिकी उत्पादों से बचाने के लिए टैरिफ घटाने की संभावना काफी कम है। इसके जरिए भारत अपनी ग्रामीण व्यवस्था और खाद्य सुरक्षा को भी संरक्षित रखना चाहेगा।
- समझौते के तहत भारत अमेरिका के कूटनीतिक निर्यातों को लेने पर सहमति जता सकता है। इनमें कच्चा तेल, एलएनजी, वाणिज्यिक एयरक्राफ्ट और परमाणु ऊर्जा से जुड़े उपकरण शामिल हो सकते हैं।
भारत-अमेरिका के बीच व्यापार समझौते में अवरोधों पर विशेषज्ञ की क्या चिंता?
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अमेरिका की तरफ से बाजार खोलने की मांगों को भारत मान लेता है तो आने वाले समय में इससे भारत में दिक्कतें आ सकती हैं। खासकर कृषि क्षेत्र में, जहां भारत के पास अपने किसानों की तरफ से की गई पैदावार को खरीदने की तय प्रणालियां है। इन प्रणालियों की रक्षा के लिए भारत को अपने मानकों पर टिके रहना चाहिए। जीटीआरआई के मुताबिक, अमेरिका के साथ व्यापार समझौता राजनीतिक लक्ष्यों के साथ आगे नहीं बढ़ना चाहिए और न ही इन्हें एकतरफा होना चाहिए। समझौते से हमारे किसानों, डिजिटल ईकोसिस्टम और स्वायत्त नियामकों का संरक्षण भी जरूरी है।
अमेरिकी वेबसाइट पॉलिटिको (Politico) से बातचीत में दो अधिकारियों ने नाम न उजागर करने की शर्त पर कहा कि व्हाइट हाउस की भारत के बाजारों को खोलने की मांग और इसके साथ ही क्षेत्र में कांटों भरी भूराजनीतिक स्थितियों के चलते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के सामने अपनी घरेलू जनता के हितों को संभालने का दबाव बढ़ गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अमेरिका की तरफ से बाजार खोलने की मांगों को भारत मान लेता है तो आने वाले समय में इससे भारत में दिक्कतें आ सकती हैं। खासकर कृषि क्षेत्र में, जहां भारत के पास अपने किसानों की तरफ से की गई पैदावार को खरीदने की तय प्रणालियां है। इन प्रणालियों की रक्षा के लिए भारत को अपने मानकों पर टिके रहना चाहिए। जीटीआरआई के मुताबिक, अमेरिका के साथ व्यापार समझौता राजनीतिक लक्ष्यों के साथ आगे नहीं बढ़ना चाहिए और न ही इन्हें एकतरफा होना चाहिए। समझौते से हमारे किसानों, डिजिटल ईकोसिस्टम और स्वायत्त नियामकों का संरक्षण भी जरूरी है।
अमेरिकी वेबसाइट पॉलिटिको (Politico) से बातचीत में दो अधिकारियों ने नाम न उजागर करने की शर्त पर कहा कि व्हाइट हाउस की भारत के बाजारों को खोलने की मांग और इसके साथ ही क्षेत्र में कांटों भरी भूराजनीतिक स्थितियों के चलते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के सामने अपनी घरेलू जनता के हितों को संभालने का दबाव बढ़ गया है।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि रहे सैयद अकबरुद्दीन के मुताबिक, भारतीयों के लिए इससे ज्यादा परेशान करने वाला विचार नहीं होगा कि उनकी सरकार को एक विदेशी नेता की तरफ से धौंस जमाने की कोशिश की जा रही है। ऐसे में एक ऐसा व्यापार समझौता, जो कि दोनों देशों की जीत हो सकता था, वह अब साझेदारी की जगह समर्पण के तौर पर भी देखा जा सकता है।