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Foreign Exchange Reserves: भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में फिर से बढ़ोतरी, कई हफ्ते की गिरावट के बाद आई उछाल
Sun, 08 Dec 2024 09:19 AM IST
पवन पांडेय
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला
Published by: पवन पांडेय
Updated Sun, 08 Dec 2024 09:19 AM IST
सार
लगातार आठ हफ्ते की गिरावट के बाद भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में फिर से बढ़ोतरी शुरू हो गई है, जो कई महीनों के निचले स्तर पर पहुंच गया है। इससे पहले सितंबर में 704.89 बिलियन अमेरिकी डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर को छूने के बाद से भंडार में गिरावट आ रही थी।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : ANI
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विस्तार
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में एक बार फिर से बढ़ोतरी शुरू हो गई है, इसके साथ ही लगातार आठ हफ्ते की गिरावट पर लगाम भी लग गई है, जो कई महीनों के निचले स्तर पर पहुंच गया है। 29 नवंबर को समाप्त सप्ताह में, विदेशी मुद्रा भंडार 1.510 बिलियन अमेरिकी डॉलर बढ़कर 658.091 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया, जैसा कि इस सप्ताह की शुरुआत में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के आंकड़ों से पता चला।
सबसे उचे स्तर को छूने बाद शुरू हुई थी गिरावट
सितंबर में 704.89 बिलियन अमेरिकी डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर को छूने के बाद से भंडार में गिरावट आ रही थी। रुपये के तेज अवमूल्यन को रोकने के उद्देश्य से आरबीआई के हस्तक्षेप के कारण भंडार में गिरावट आ रही है। पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार बफर घरेलू आर्थिक गतिविधियों को वैश्विक झटकों से बचाने में मदद करता है। आरबीआई के नवीनतम आंकड़ों से पता चला है कि भारत की विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां (एफसीए), जो विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा घटक है, 568.852 बिलियन अमेरिकी डॉलर पर है। आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में स्वर्ण भंडार 66.979 बिलियन अमेरिकी डॉलर है।
भारत ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार में लगभग 58 बिलियन USD जोड़े
वहीं, अनुमान बताते हैं कि भारत का विदेशी मुद्रा भंडार अब अनुमानित आयात के लगभग एक वर्ष को कवर करने के लिए पर्याप्त है। 2023 में, भारत ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार में लगभग 58 बिलियन अमेरिकी डॉलर जोड़े, जबकि 2022 में इसमें 71 बिलियन अमेरिकी डॉलर की संचयी गिरावट आई। विदेशी मुद्रा भंडार या एफएक्स भंडार, किसी देश के केंद्रीय बैंक या मौद्रिक प्राधिकरण की तरफ से रखी गई संपत्तियां हैं, जो मुख्य रूप से अमेरिकी डॉलर जैसी आरक्षित मुद्राओं में होती हैं, जिनका छोटा हिस्सा यूरो, जापानी येन और पाउंड स्टर्लिंग में होता है।
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भारतीय रुपया सबसे स्थिर मुद्राओं में से एक
आरबीआई विदेशी मुद्रा बाजारों पर बारीकी से नजर रखता है, केवल व्यवस्थित बाजार स्थितियों को बनाए रखने और रुपये की विनिमय दर में अत्यधिक अस्थिरता को रोकने के लिए हस्तक्षेप करता है, बिना किसी निश्चित लक्ष्य स्तर या सीमा का पालन किए। आरबीआई अक्सर रुपये के मूल्यह्रास को रोकने के लिए डॉलर बेचने समेत तरलता का प्रबंधन करके हस्तक्षेप करता है। एक दशक पहले, भारतीय रुपया एशिया की सबसे अस्थिर मुद्राओं में से एक था। तब से, यह सबसे स्थिर मुद्राओं में से एक बन गया है। आरबीआई ने रणनीतिक रूप से रुपया मजबूत होने पर डॉलर खरीदे हैं और कमजोर होने पर बेचे हैं, जिससे निवेशकों के लिए भारतीय परिसंपत्तियों का आकर्षण बढ़ा है।
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सबसे उचे स्तर को छूने बाद शुरू हुई थी गिरावट
सितंबर में 704.89 बिलियन अमेरिकी डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर को छूने के बाद से भंडार में गिरावट आ रही थी। रुपये के तेज अवमूल्यन को रोकने के उद्देश्य से आरबीआई के हस्तक्षेप के कारण भंडार में गिरावट आ रही है। पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार बफर घरेलू आर्थिक गतिविधियों को वैश्विक झटकों से बचाने में मदद करता है। आरबीआई के नवीनतम आंकड़ों से पता चला है कि भारत की विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां (एफसीए), जो विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा घटक है, 568.852 बिलियन अमेरिकी डॉलर पर है। आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में स्वर्ण भंडार 66.979 बिलियन अमेरिकी डॉलर है।
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भारत ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार में लगभग 58 बिलियन USD जोड़े
वहीं, अनुमान बताते हैं कि भारत का विदेशी मुद्रा भंडार अब अनुमानित आयात के लगभग एक वर्ष को कवर करने के लिए पर्याप्त है। 2023 में, भारत ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार में लगभग 58 बिलियन अमेरिकी डॉलर जोड़े, जबकि 2022 में इसमें 71 बिलियन अमेरिकी डॉलर की संचयी गिरावट आई। विदेशी मुद्रा भंडार या एफएक्स भंडार, किसी देश के केंद्रीय बैंक या मौद्रिक प्राधिकरण की तरफ से रखी गई संपत्तियां हैं, जो मुख्य रूप से अमेरिकी डॉलर जैसी आरक्षित मुद्राओं में होती हैं, जिनका छोटा हिस्सा यूरो, जापानी येन और पाउंड स्टर्लिंग में होता है।
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भारतीय रुपया सबसे स्थिर मुद्राओं में से एक
आरबीआई विदेशी मुद्रा बाजारों पर बारीकी से नजर रखता है, केवल व्यवस्थित बाजार स्थितियों को बनाए रखने और रुपये की विनिमय दर में अत्यधिक अस्थिरता को रोकने के लिए हस्तक्षेप करता है, बिना किसी निश्चित लक्ष्य स्तर या सीमा का पालन किए। आरबीआई अक्सर रुपये के मूल्यह्रास को रोकने के लिए डॉलर बेचने समेत तरलता का प्रबंधन करके हस्तक्षेप करता है। एक दशक पहले, भारतीय रुपया एशिया की सबसे अस्थिर मुद्राओं में से एक था। तब से, यह सबसे स्थिर मुद्राओं में से एक बन गया है। आरबीआई ने रणनीतिक रूप से रुपया मजबूत होने पर डॉलर खरीदे हैं और कमजोर होने पर बेचे हैं, जिससे निवेशकों के लिए भारतीय परिसंपत्तियों का आकर्षण बढ़ा है।