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चिंता का विषय: तालिबान के कब्जे से अफगानिस्तान में भारत के निवेश का क्या होगा? द्विपक्षीय व्यापार पर भी पड़ेगा असर

Tue, 17 Aug 2021 01:11 PM IST
‌डिंपल अलावाधी बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: ‌डिंपल अलावाधी Updated Tue, 17 Aug 2021 01:11 PM IST
सार

भारत और अफगानिस्तान के मजबूत ऐतिहासिक संबंध रहे हैं। दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय कारोबार होता है। अफगानिस्तान में भारत ने 400 से अधिक प्रोजेक्ट्स पर काम किया है। 

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India investment in Afghanistan many projects have been funded import export may also be impacted
तालिबान के कब्जे से अफगानिस्तान में भारत के निवेश का क्या होगा? - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

20 साल के बाद अफगानिस्तान पर एक बार फिर से तालिबान का कब्जा हो गया है। अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद अफरातफरी का माहौल है। वहां के लोग देश छोड़ने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। देश में स्थिति भयावह बनी हुई है। इसका सीधा असर भारत और अफगानिस्तान के व्यापार पर भी पड़ेगा। दोनों देशों का व्यापारिक संबंध सदियों पुराना है। भारत दक्षिण एशिया में अफगानिस्तान के उत्पादों का सबसे बड़ा बाजार है। 

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2020-21 में दोनों देशों के बीच हुआ 10,387 करोड़ रुपये का व्यापार
भारत, अफगानिस्तान से किशमिश, अखरोट, बादाम, अंजीर, पिस्ता, सूखे खूबानी जैसे मेवों का आयात करता है। इसके अलावा वहां से अनार, सेब, चेरी, खरबूजा, तरबूज, हींग, जीरा और केसर का भी आयात किया जाता है। वित्त वर्ष 2020-21 में दोनों देशों के बीच 1.4 अरब डॉलर यानी करीब 10,387 करोड़ रुपये का व्यापार हुआ था। उससे पहले वित्त वर्ष 2019-20 में दोनों देशों के बीच 1.5 अरब डॉलर यानी करीब 11,131 करोड़ रुपये का व्यापार हुआ था। 2020-21 में भारत ने अफगानिस्तान को करीब 6,129 करोड़ रुपये के उत्पादों का निर्यात किया था, जबकि भारत ने 37,83 करोड़ रुपये के उत्पादों का आयात किया था।
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द्विपक्षीय व्यापार में आएगी कमी, सावधान रहें निर्यातक
अब निर्यातकों का कहना है कि तालिबान के काबुल पर कब्जा से दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार पर काफी असर पड़ेगा। फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन (फियो) के महानिदेशक अजय सहाय ने इस संदर्भ में कहा कि घरेलू निर्यातकों को भुगतान को लेकर सावधानी बरतनी चाहिए। अब व्यापार प्रभावित होगा। वहीं फियो के पूर्व अध्यक्ष और देश के प्रमुख निर्यातक एसके सराफ ने भी इस मामले में बयान दिया। उन्होंने कहा कि द्विपक्षीय व्यापार में काफी कमी आएगी। इतना ही नहीं, फियो के उपाध्यक्ष खालिद खान ने भी इसी तरह का बयान दिया। उन्होंने कहा कि कुछ समय के लिए व्यापार पूरी तरह से ठप भी हो सकता है।
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भारत ने अफगानिस्तान में किया है 22,350 करोड़ रुपये का निवेश 
तालिबान का काबुल पर कब्जा भारत के लिए एक बड़ी चुनौती है। भारत ने ढांचागत क्षेत्र समेत शिक्षा आदि पर अफगानिस्तान में करीब 22,350 करोड़ रुपये का निवेश किया है। भारत ने अफगानिस्तान में रोड, डैम, अस्पताल, आदि बनाए हैं। विदेश मंत्रालय के अनुसार, अफगानिस्तान में भारत ने 400 से अधिक छोटे-बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम किया है। आइए जानते हैं कुछ मुख्य प्रोजेक्ट्स के बारे में-

काबुल में संसद
भारत ने करीब 675 करोड़ रुपये में अफगानिस्तान की संसद का निर्माण भी करवाया था। साल 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका उद्घाटन किया था। इस दौरान पीएम मोदी ने  भारत-अफगानिस्तान की दोस्ती के बारे में कई बातें कही थीं। साथ ही अफगानिस्तान में लोकतंत्र के लिए भारत की भूमिका का जिक्र भी किया था। इतना ही नहीं, संसद में एक ब्लॉक का नाम देश के पूर्व भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के नाम पर भी रखा गया था।

सलमा डैम
साल 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी के साथ अफगानिस्तान के हेरात प्रांत में सलमा डैम का उद्घाटन किया था। 42 मेगावॉट की क्षमता वाला यह एक हाइड्रोपावर और सिचाईं का प्रोजेक्ट है। इस डैम को अफगानिस्तान और भारत फ्रेंडशिप डैम के रूप में भी जाना जाता है। मालूम हो कि हेरात प्रांत में हरी रुद नदी पर बने सलमा डैम से बड़े स्तर पर बिजली का उत्पादन होता है। साथ ही, यह डैम 75 हजार हेक्टेयर जमीन को पानी देने के काम भी आता है।

जरांज-देलाराम हाइवे
भारत ने 218 किलोमीटर लंबा जरंज-देलाराम हाइवे का निर्माण कराया था। जरंज, अफगानिस्तान में ईरान बॉर्डर के करीब से गुजरता है। इसे बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन (BRO) की ओर से तैयार किया गया था। इस हाई प्रोफाईल प्रोजेक्ट के निर्माण में 15 करोड़ डॉलर की लागत आई थी। मालूम हो कि विदेश मंत्री जयशंकर ने बताया था कि जरांज-देलाराम हाइवे से ही भारत ने कोविड-19 महामारी के दौरान 75,000 टन का गेहूं अफगानिस्तान भिजवाया था। 

स्तोर पैलेस
साल 2016 में अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ घनी और पीएम मोदी ने काबुल में 19वीं सदी में निर्माण किए गए स्तोर पैलेस का उद्घाटन किया था। 2009 में भारत, अफगानिस्तान और आगा खान डेवलपमेंट नेटवर्क के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। इसके तहत महल के दोबारा निर्माण का काम फिर से शुरू हुआ था। मालूम हो कि साल 1919 में रावलपिंडी समझौते में इस महल को आधार माना गया था। इसी समझौते के तहत अफगानिस्तान एक स्वतंत्र देश बन सका था। 

स्वास्थ्य क्षेत्र
दोनों देशों के बीच संबंध काफी पुराना है। भारत ने काबुल में साल 1972 में बच्चों के अस्पताल का पुर्ननिर्माण कराया था। इसके बाद साल 1985 में इसका नाम इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट रखा दिया गया था। इतना ही नहीं, भारत ने बदाखाशान, बाल्ख, कंधार, खोस्त, कुनार सहित अपगानिस्तान में कई इलाकों में क्लीनिक्स का निर्माण भी कराया है।


परिवहन क्षेत्र
विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारत ने अफगानिस्तान को शहरी ट्रांसपोर्टेशन के लिए 400 बसें और 200 मिनी बसें भी दी थीं। साथ ही अफगान नेशनल आर्मी के लिए 285 मिलिट्री व्हीकल्स दिए गए थे। पांच शहरों में अस्पतालों के लिए 10 एंबुलेंस भी दी गईं थी। 

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