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India-China Trade: भारत-चीन व्यापार शुरू होने पर दोनों को हर साल 5-6 अरब डॉलर लाभ, US टैरिफ के नुकसान की भरपाई
Thu, 21 Aug 2025 07:16 AM IST
शुभम कुमार
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला
Published by: शुभम कुमार
Updated Thu, 21 Aug 2025 07:16 AM IST
सार
भारत और चीन के बीच लंबे समय से ठप पड़ा सीमा व्यापार फिर शुरू होने जा रहा है। एडीबी और विश्व बैंक का अनुमान है कि इससे दोनों देशों को हर साल 5-6 अरब डॉलर का लाभ होगा। शिपकी ला, सनाथुला और बोमडिला दर्रों को खोला जाएगा। भारत चीन को उर्वरक देगा, जबकि चीन भारत को दुर्लभ धातुएं आपूर्ति करेगा। इससे भारत की विनिर्माण क्षमता को मजबूती मिलेगी।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
भारत और चीन के बीच लंबे समय से ठप पड़ा सीमा व्यापार फिर शुरू होने जा रहा है। एशियन डेवलपमेंट बैंक (एडीबी) और विश्व बैंक का अनुमान है कि व्यापार बहाली से शुरुआती चरण में दोनों देशों को हर साल 5-6 अरब डॉलर का लाभ होगा। नई सहमति के तहत न सिर्फ हिमालयी दर्रों से पारंपरिक व्यापार को गति दी जाएगी, बल्कि दुर्लभ खनिजों और उर्वरक आपूर्ति की आपसी जरूरतें भी पूरी की जाएंगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम टैरिफ दबावों, विशेषकर अमेरिका की संरक्षणवादी नीतियों के बीच भारत को बड़ा राहत कवच देगा।
भारत-चीन सीमा व्यापार हजारों साल पुराना है, जो सिल्क रूट एवं हिमालयी दर्रों के जरिये सदियों तक चलता रहा। नाथू ला दर्रा (सिक्किम) 1962 के युद्ध के बाद बंद हो गया था, लेकिन 2006 में इसे फिर खोला गया। यहां से कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक्स और उपभोक्ता वस्तुओं का व्यापार होता है। लिपुलेख दर्रा उत्तराखंड में है। भारत-चीन सीमा व्यापार में इसका भी योगदान रहा है। हिमाचल प्रदेश स्थित शिपकी ला दर्रा ऐतिहासिक रूप से ऊन, नमक, मसाले और स्थानीय उत्पादों के आदान प्रदान के लिए जाना जाता रहा है।
मजबूत होगी भारत की विनिर्माण क्षमता
समझौते के तहत शिपकी ला दर्रा, सनाथुला दर्रा और अरुणाचल प्रदेश के बोमडिला मार्ग को प्राथमिकता से खोला जाएगा। भारतीय विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, चीन ने दुर्लभ धातुओं की आपूर्ति का आश्वासन दिया है, जिनकी सर्वाधिक जरूरत भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा और ऊर्जा क्षेत्रों को है। भारत बदले में चीन को फॉस्फेट और पोटाश आधारित उर्वरकों की आपूर्ति करेगा। भारतीय उद्योग परिसंघ के मुख्य अर्थशास्त्री अरुण चतुर्वेदी ने कहा, यह समझौता भारत की विनिर्माण क्षमता को मजबूती देगा और चीन की खाद्य सुरक्षा रणनीति में योगदान करेगा।
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ये भी पढ़ें:- Gaza: इस्राइल की नई योजना 50000 रिजर्व सैनिक तैनात होंगे; जहां अब तक कार्रवाई नहीं हुई, वहां चलेगा अभियान
अमेरिकी टैरिफ के नुकसान की भरपाई
भारतीय विदेश व्यापार संस्थान के वरिष्ठ अर्थशास्त्री डॉ. बिस्वजीत धर ने कहा, ट्रंप टैरिफ ने भारतीय निर्यातकों की लागत बढ़ा दी है। अगर भारत चीन के साथ दुर्लभ खनिजों और उर्वरकों के अलावा मध्यवर्ती औद्योगिक वस्तुओं का आयात बढ़ाता है, तो उत्पादन लागत घटेगी और अमेरिकी टैरिफ से होने वाला 3-5 अरब डॉलर का सालाना नुकसान काफी हद तक संतुलित हो सकेगा। चाइना इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल ट्रेड ने संकेत दिया है कि भारत-चीन व्यापार की बहाली अमेरिकी संरक्षणवादी नीतियों के दौर में भारत को बफर इकनॉमिक स्पेस दे सकती है।
दुर्लभ खनिज व उर्वरकों में चीन पर निर्भरता घटाए भारत: जीटीआरआई
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनीशिएटिव (जीटीआरआई) का कहना है, भारत को दुर्लभ खनिजों और उर्वरकों के निर्यात पर प्रतिबंधों में ढील देने का चीन का फैसला सकारात्मक संकेत है। लेकिन, भारत को पड़ोसी देश पर निर्भरता कम करने पर ध्यान देना होगा। 2024-25 में चीन के साथ भारत का 100 अरब डॉलर का खतरनाक व्यापार घाटा है।
ये भी पढ़ें:- ट्रंप को भारतवंशी निक्की हेली ने आईना दिखाया: कहा- भारत मूल्यवान साझेदार, मजबूत रिश्ते में खटास 'रणनीतिक आपदा'
जीटीआरआई ने कहा, 2014 और 2024 के बीच भारत के आयात परिदृश्य पर चीन का प्रभुत्व और भी बढ़ गया है। भारत के दूरसंचार और इलेक्ट्रॉनिक्स आयात में इसकी हिस्सेदारी 57.2 फीसदी तक पहुंच गई है। मशीनरी और हार्डवेयर का हिस्सा 44 फीसदी था। रसायन और फार्मा का हिस्सा 28.3 फीसदी के साथ दूसरे स्थान पर रहा। भारत के लिए एकमात्र वास्तविक सुरक्षा उपाय निर्भरता घटाकर, गहन विनिर्माण में निवेश कर और सच्चा उत्पाद राष्ट्र बन घरेलू स्तर पर मजबूती बनाना है। इससे भारत चीन से समान शर्तों पर बातचीत में बेहतर स्थिति में होगा।
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भारत-चीन सीमा व्यापार हजारों साल पुराना है, जो सिल्क रूट एवं हिमालयी दर्रों के जरिये सदियों तक चलता रहा। नाथू ला दर्रा (सिक्किम) 1962 के युद्ध के बाद बंद हो गया था, लेकिन 2006 में इसे फिर खोला गया। यहां से कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक्स और उपभोक्ता वस्तुओं का व्यापार होता है। लिपुलेख दर्रा उत्तराखंड में है। भारत-चीन सीमा व्यापार में इसका भी योगदान रहा है। हिमाचल प्रदेश स्थित शिपकी ला दर्रा ऐतिहासिक रूप से ऊन, नमक, मसाले और स्थानीय उत्पादों के आदान प्रदान के लिए जाना जाता रहा है।
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मजबूत होगी भारत की विनिर्माण क्षमता
समझौते के तहत शिपकी ला दर्रा, सनाथुला दर्रा और अरुणाचल प्रदेश के बोमडिला मार्ग को प्राथमिकता से खोला जाएगा। भारतीय विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, चीन ने दुर्लभ धातुओं की आपूर्ति का आश्वासन दिया है, जिनकी सर्वाधिक जरूरत भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा और ऊर्जा क्षेत्रों को है। भारत बदले में चीन को फॉस्फेट और पोटाश आधारित उर्वरकों की आपूर्ति करेगा। भारतीय उद्योग परिसंघ के मुख्य अर्थशास्त्री अरुण चतुर्वेदी ने कहा, यह समझौता भारत की विनिर्माण क्षमता को मजबूती देगा और चीन की खाद्य सुरक्षा रणनीति में योगदान करेगा।
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अमेरिकी टैरिफ के नुकसान की भरपाई
भारतीय विदेश व्यापार संस्थान के वरिष्ठ अर्थशास्त्री डॉ. बिस्वजीत धर ने कहा, ट्रंप टैरिफ ने भारतीय निर्यातकों की लागत बढ़ा दी है। अगर भारत चीन के साथ दुर्लभ खनिजों और उर्वरकों के अलावा मध्यवर्ती औद्योगिक वस्तुओं का आयात बढ़ाता है, तो उत्पादन लागत घटेगी और अमेरिकी टैरिफ से होने वाला 3-5 अरब डॉलर का सालाना नुकसान काफी हद तक संतुलित हो सकेगा। चाइना इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल ट्रेड ने संकेत दिया है कि भारत-चीन व्यापार की बहाली अमेरिकी संरक्षणवादी नीतियों के दौर में भारत को बफर इकनॉमिक स्पेस दे सकती है।
दुर्लभ खनिज व उर्वरकों में चीन पर निर्भरता घटाए भारत: जीटीआरआई
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनीशिएटिव (जीटीआरआई) का कहना है, भारत को दुर्लभ खनिजों और उर्वरकों के निर्यात पर प्रतिबंधों में ढील देने का चीन का फैसला सकारात्मक संकेत है। लेकिन, भारत को पड़ोसी देश पर निर्भरता कम करने पर ध्यान देना होगा। 2024-25 में चीन के साथ भारत का 100 अरब डॉलर का खतरनाक व्यापार घाटा है।
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जीटीआरआई ने कहा, 2014 और 2024 के बीच भारत के आयात परिदृश्य पर चीन का प्रभुत्व और भी बढ़ गया है। भारत के दूरसंचार और इलेक्ट्रॉनिक्स आयात में इसकी हिस्सेदारी 57.2 फीसदी तक पहुंच गई है। मशीनरी और हार्डवेयर का हिस्सा 44 फीसदी था। रसायन और फार्मा का हिस्सा 28.3 फीसदी के साथ दूसरे स्थान पर रहा। भारत के लिए एकमात्र वास्तविक सुरक्षा उपाय निर्भरता घटाकर, गहन विनिर्माण में निवेश कर और सच्चा उत्पाद राष्ट्र बन घरेलू स्तर पर मजबूती बनाना है। इससे भारत चीन से समान शर्तों पर बातचीत में बेहतर स्थिति में होगा।