IMF: अब आईएमएफ ने भी कहा- महंगाई का मुख्य कारण है कंपनियों की मुनाफाखोरी
आईएमएफ ने साफ तौर पर चेतावनी दी है कि अगर 2025 तक यूरोपियन सेंट्रल बैंक (ईसीबी) की तरफ से मुद्रास्फीति के तय लक्ष्य को हासिल करना है, तो कंपनियों को अपना मुनाफा घटाना होगा। ईसीबी ने मुद्रास्फीति दर को दो फीसदी तक लाने का लक्ष्य घोषित किया हुआ है...
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अब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने भी मान लिया है कि यूरोप में पिछले दो साल से जारी महंगाई का मुख्य कारण कंपनियों की मुनाफाखोरी है। इसके पहले कई अर्थशास्त्रियों ने भी अपने अध्ययन के आधार पर यह बात कही थी। उन अर्थशास्त्रियों में इसाबेला बेवर प्रमुख हैं। उनके अलावा भारत में महंगाई के संदर्भ में यही बात अर्थशास्त्री विरल आचार्य ने कही थी।
अब आईएमएफ की तरफ से अर्थशास्त्रियों नील-जैकब हानसेन, फ्रेडरिक टोस्कानी और जिंग झाऊ ने कहा है कि पिछले दो साल के दौरान कंपनियों ने लागत मूल्य में वृद्धि की तुलना में उत्पाद के मूल्य में अधिक वृद्धि की और यही यूरोप में महंगाई का प्रमुख कारण है। इस दौरान आम चर्चा रही है कि ऊर्जा की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण कंपनियों को उत्पादों के दाम बढ़ाने पड़े। लेकिन आईएमएफ की वेबसाइट पर प्रकाशित ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि उत्पादों के दाम जितने बढ़े, ऊर्जा की कीमत उतनी नहीं बढ़ी थी।
आईएमएफ ने साफ तौर पर चेतावनी दी है कि अगर 2025 तक यूरोपियन सेंट्रल बैंक (ईसीबी) की तरफ से मुद्रास्फीति के तय लक्ष्य को हासिल करना है, तो कंपनियों को अपना मुनाफा घटाना होगा। ईसीबी ने मुद्रास्फीति दर को दो फीसदी तक लाने का लक्ष्य घोषित किया हुआ है। आईएमएफ ने कहा है कि कंपनियों ने मुनाफा बढ़ाने के लिए वस्तुओं और सेवाओं के दाम बढ़ाए, जिसकी वजह से महंगाई बढ़ी और अब श्रमिक वर्ग के लोग उस महंगाई के बीच अपना जीवन-स्तर बरककार रखने के लिए तनख्वाह बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। इससे मुद्रास्फीति का एक दुश्चक्र बन गया है।
आईएमएफ के अर्थशास्त्रियों ने बताया है कि अक्तूबर 2022 में यूरो जोन में मुद्रास्फीति की दर 10.6 फीसदी तक पहुंच गई थी। इस वर्ष मई में यह दर गिर कर 6.1 फीसदी पर आ गई। लेकिन यह भी ईसीबी के लक्ष्य से बहुत ऊपर है। इस बीच महंगाई पर काबू पाने के लिए विभिन्न देशों के सेंट्रल बैंकों ने ब्याज दरों में बढ़ोतरी की है। उसका खराब असर विभिन्न देशों की आर्थिक वृद्धि पर हुआ है। जर्मनी सहित कई देश मंदी के शिकार हो गए हैं।
अपनी रिपोर्ट में अर्थशास्त्रियों ने महंगाई बढ़ाने वाले विभिन्न पहुलओं की एक सारणी शामिल की है। इन पहलुओं में कंपनियों का मुनाफा, श्रम लागत, आयात लागत, टैक्स आदि शामिल हैं। इनके बीच देखा गया है कि महंगाई बढ़ाने में सबसे ज्यादा 45 फीसदी योगदान मुनाफे का रहा है।
आईएमएफ के अर्थशास्त्री इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि कोरोना महामारी और यूक्रेन युद्ध से पैदा हुई परिस्थितियों से जहां श्रमिक वर्ग की वास्तविक आय गिरी, वहीं कारोबारी तबके ने अपने हितों की रक्षा कर ली। आज वस्तुओं और सेवाओं की कीमत में कंपनियों के मुनाफे का हिस्सा कोरोना महामारी से पहले की तुलना में एक फीसदी ज्यादा है। दूसरी तरफ श्रमिकों की वास्तविक आय महामारी से पहले की तुलना में दो फीसदी कम है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि 2022 में श्रमिकों की वास्तविक आय में पांच फीसदी की गिरावट आई। इसलिए वे अब अधिक वेतन की मांग कर रहे हैं। अगर कंपनियों ने अपना मुनाफा नहीं घटाया, तो श्रमिकों की मांग पूरी करने पर मुद्रास्फीति और बढ़ेगी।