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Labour Codes: नए लेबर कोड्स से महिलाओं के कार्यबल में भागीदारी को कैसे मिलेगा बढ़ावा? जानें रिपोर्ट का दावा

Sat, 13 Dec 2025 01:05 PM IST
रिया दुबे बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: रिया दुबे Updated Sat, 13 Dec 2025 01:05 PM IST
सार

AIOE और कानून फर्म शार्दुल अमरचंद द्वारा जारी श्वेत पत्र के अनुसार, नए लेबर कोड्स से देश में महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी को बढ़ावा मिल सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ये कोड्स रोजगार को अधिक सुरक्षित, संरक्षित और सुलभ बनाकर महिलाओं के लिए काम को टिकाऊ बनाएंगे, जिससे विभिन्न क्षेत्रों में उनकी भागीदारी बढ़ेगी।

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How will the new labor codes boost women's participation in the workforce? Learn what the report claims
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Adobestock

विस्तार

नए लेबर कोड्स से देश में महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। यह बात अखिल भारतीय नियोक्ता संगठन (AIOE) और कानून फर्म शार्दुल अमरचंद द्वारा जारी एक श्वेत पत्र में कही गई है।

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'ब्रेकिंग द ग्लास सीलिंग: हाउ द लेबर कोड्स बूस्ट वीमेंस पार्टिसिपेशन इन इंडियाज वर्कफोर्स' शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में कहा गया है कि नए लेबर कोड्स रोजगार को अधिक सुरक्षित, संरक्षित और सुलभ बनाकर महिलाओं के लिए कार्यस्थल के अवसरों का विस्तार कर सकती हैं।
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श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी

श्वेत पत्र के अनुसार, भारत का कानूनी ढांचा सामाजिक बदलाव के साथ विकसित हुआ है, जिसका असर महिला श्रम बल भागीदारी दर में स्पष्ट रूप से दिखता है। वर्ष 2017-18 में यह दर 23.3% थी, जो बढ़कर 2023-24 में 41.7% तक पहुंच गई है।

महिलाओं के हित में बने कानून

रिपोर्ट में कहा गया है कि इस प्रगति को महिलाओं के हित में बने कानूनों, जैसे मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 और कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (निवारण) अधिनियम, 2013, के साथ-साथ सरकारी पहलों जैसे मिशन शक्ति, नव्या और वाइज-किरण से भी मजबूती मिली है। रिपोर्ट में तर्क दिया गया कि नए लेबर कोड्स पुराने कानूनों को एक सरल और अधिक सुंसगत संरचना में मिलाकर भारत के रोजगार कानून ढांचे का आधुनिकीकरण करती हैं। 

नए लेबर कोड्स का असर सीमित न रहने की संभावना

श्वेत पत्र के अनुसार, नए लेबर कोड्स का एक प्रमुख असर यह हो सकता है कि वे केवल नए अवसर पैदा करने तक सीमित न रहकर, काम को अधिक टिकाऊ और सुरक्षित बनाएं, जिससे विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ सके।

सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के तहत मातृत्व संरक्षण को मजबूत बनाए रखा गया है। इसके अनुसार पात्र महिला कर्मचारियों को 26 सप्ताह का सवेतन मातृत्व अवकाश मिलता रहेगा, जबकि दत्तक और सरोगेसी माताओं के लिए 12 सप्ताह का अवकाश जारी रहेगा।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि नर्सिंग ब्रेक, चिकित्सकीय सहायता और गर्भावस्था व प्रसव से जुड़े दस्तावेजों की सरल प्रक्रिया जैसे प्रावधान महिलाओं पर पड़ने वाले आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी दबाव को कम करने में मददगार हैं, जो अक्सर उन्हें स्थायी रूप से कार्यबल से बाहर होने के लिए मजबूर कर देते हैं।

श्वेत पत्र ने कर्मचारी राज्य बीमा (ESI) कवरेज के विस्तार की ओर भी ध्यान दिलाया, जिसे अब सभी उद्योगों और जिलों, यहां तक कि प्लांटेशन सेक्टर तक लागू किया गया है, जहां बड़ी संख्या में महिलाएं कार्यरत हैं।

इसके अलावा, गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाना एक दूरदर्शी कदम बताया गया है, खासकर उन महिलाओं के लिए, जो देखभाल की जिम्मेदारियों के चलते लचीले काम पर निर्भर रहती हैं।



रिपोर्ट के अनुसार, व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थितियां कोड्स महिलाओं को उनकी सहमति और पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था के साथ रात की शिफ्ट सहित सभी प्रतिष्ठानों में काम करने की अनुमति देती है। इसे आईटी, स्वास्थ्य, विमानन और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में महिलाओं की आय और करियर प्रगति पर लगी अदृश्य छत को हटाने वाला परिवर्तनकारी प्रावधान बताया गया है।

केवल कानून बना देना काफी नहीं

हालांकि, श्वेत पत्र ने यह भी चेताया कि केवल कानून बना देने से बदलाव नहीं आएगा। वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि नियोक्ता इन्हें कैसे लागू करते हैं, बाजार कितना सहयोगी रहता है और सहायक संस्थाएं कितनी प्रभावी भूमिका निभाती हैं।

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