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Quick Commerce: कम समय में डिलीवरी देने वाले प्लेटफॉर्म युवाओं की पसंद; सबसे ज्यादा यहां कर रहे हैं विजिट
Sat, 27 Sep 2025 06:04 AM IST
शिव शुक्ला
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Published by: शिव शुक्ला
Updated Sat, 27 Sep 2025 06:04 AM IST
सार
भारतीय ई-कॉमर्स बाजार 2018 में 22 अरब डॉलर से बढ़कर 2024 में 123 अरब डॉलर हो गया है। फिर भी केवल 40 फीसदी आबादी ही ऑनलाइन खरीदारी करती है। ऐसे में बाजार के विस्तार की गुंजाइश है।
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Quick Commerce
- फोटो : freepik
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विस्तार
टेक्नोलॉजी और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के साथ क्विक कॉमर्स भी उत्पादों की डिलीवरी में प्रमुख भूमिका निभा रहा है। 13 से 28 साल के युवा सबसे कम समय में डिलीवरी करने वाले प्लेटफॉर्म को तवज्जो दे रहे हैं। इन्हीं प्लेटफॉर्म पर सबसे ज्यादा विजिट हो रहा है। आने वाले समय में कुछ घंटों में मिलने वाली डिलीवरी पर ही ई-कॉमर्स कंपनियों का फोकस होगा।
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विभिन्न रिपोर्ट के मुताबिक, फैशन से लेकर ग्रॉसरी व ब्यूटी से पर्सनलर केयर जैसे उत्पाद कुछ मिनटों में ग्राहकों तक पहुंच रहे हैं। उदाहरण के तौर पर शिपरॉकेट का औसत डिलीवरी समय 24 घंटे से लेकर 3.5 दिन है। मासिक एक से 1.5 करोड़ लेनदेन करने वाले शिपरॉकेट के पास चार लाख रिटेलर हैं। शिपरॉकेट डीटूसी ब्रांड और छोटे एवं मझोले उद्योगों के साथ मिलकर काम करता है। शिपरॉकेट के सह-संस्थापक एवं सीओओ गौतम कपूर कहते हैं, भारत का क्विक कॉमर्स बाजार 2030 तक 40 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। फिर भी, देश का अधिकांश फुलफिलमेंट इन्फ्रास्ट्रक्चर पुरानी प्रणालियों और ग्राहकों से दूर स्थित इन्वेंट्री पर आधारित है। ग्राहकों की जरूरतों और खुदरा विक्रेताओं की आपूर्ति के बीच का अंतर बढ़ता जा रहा है। शिपरॉकेट इसी अवसरों का लाभ उठाकर कम समय में आपूर्ति सुनिश्चिता करता है और मिनटों में भी डिलीवरी कर देता है।
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अभी 40 फीसदी आबादी ही खरीदती है ऑनलाइन
भारतीय ई-कॉमर्स बाजार 2018 में 22 अरब डॉलर से बढ़कर 2024 में 123 अरब डॉलर हो गया है। फिर भी केवल 40 फीसदी आबादी ही ऑनलाइन खरीदारी करती है। ऐसे में बाजार के विस्तार की गुंजाइश है। शिपरॉकेट के मुताबिक, टियर-2 और टियर-3 शहरों में सबसे ज्यादा ऑर्डर वापस होते हैं। टियर-2 शहरों में 17.68 फीसदी और टियर-3 शहरों में 22.17 फीसदी लोग उत्पादों को विभिन्न कारणों से वापस कर देते हैं। टियर-3 शहरों में कैशऑन डिलीवरी का हिस्सा 60.95 फीसदी है। टियर-2 शहरों में यह 54.51 फीसदी है।
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