हिमालयी जड़ी-बूटियां खेत में उगाकर उत्तराखंड के किसान बन रहे हैं अमीर
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हिमालयी इलाकों में पाई जाने वाली बेशकीमती जड़ी-बूटियां अब खेतों में भी उगने लगी हैं। तमाम बीमारियों में काम आने वाली संजीवनी सरीखी इन जड़ी-बूटियों की खेती से अच्छा मुनाफा मिलने के कारण परंपरागत खेती करने के बजाय किसान इस ओर आकर्षित हो रहे हैं। राज्य के हिमालयी क्षेत्र से सटे गांवों में छह हजार से अधिक परिवार जड़ी-बूटी की खेती कर रहे हैं।
उगा रहे हैं यह जड़ी-बूटियां
उत्तराखंड राज्य के उच्च हिमालयी क्षेत्र में कुटकी, अतीस, सालमपंजा, जटामासी, गंदरायण, वज्रदंती, कूट, चिरायता, वन तुलसी सहित कई बहुमूल्य जड़ी-बूटियां पाई जाती हैं। तमाम बीमारियों के उपचार में काम आने वाली इन जड़ी-बूटियों का पहले सीधा दोहन किया जाता था। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले लोग माइग्रेशन के समय इन जड़ी-बूटियों को घाटी में लाते थे। अधिक दोहन होने के कारण जड़ी-बूटियों के संकट में पड़ने के बाद सालमपंजा, जटामासी सहित कुछ अन्य जड़ी-बूटियों के दोहन व बिक्री को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया। इनका दोहन केवल नाप भूमि में खेती करने के बाद ही किया जा सकता है।
6 हजार किसान कर रहे हैं खेती
सीधे जड़ी बूटी की अच्छी मांग को देखते हुए वर्तमान में बागेश्वर, पिथौरागढ़, चमोली, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग के हिमालयी क्षेत्र से लगभग छह हजार परिवार इन जड़ी-बूटियों की खेती कर रहे हैं। बागेश्वर के खलझूनी गांव के किसान भानी चंद आदि जड़ी-बूटी के साथ ही नाप भूमि में टॉनिक, मधुमेह की दवा बनाने के काम आने वाला किलमोड़ा उगाकर अच्छी आय अर्जित कर रहे हैं। उत्पादित जड़ी बूटी को भेषज संघ, एचआरडीआई के माध्यम से मंडी में बेचा जाता है। जंबू, गंदरायण 800-1,000 रुपये किलो, जबकि कुटकी 500 रुपये किलो के हिसाब से बिकता है। जड़ी-बूटी की कीमत ग्रेडिंग के आधार पर तय की जाती है।
विभिन्न रोगों में रामबाण हैं जड़ी-बूटियां
कुटकी नामक जड़ी बुखार, पीलिया, मधुमेह, न्यूमोनिया में काम आती है। लीवर से संबंधित जितने भी टॉनिक बनते हैं, उनमें कुटकी की मात्रा जरूर होती है। डोलू गुम चोट में, मुलेठी खांसी में, अतीस पेट दर्द में, सालमपंजा शारीरिक दुर्बलता में लाभदायक होता है।
गंदरायण कब्ज, गैस सहित पेट की तमाम समस्याओं में रामबाण साबित होता है। इसे राजमा की दाल में विशेष तौर पर प्रयोग किया जाता है। जंबू की तासीर गर्म होने के कारण इसे दाल में डाला जाता है। भोजपत्र, रतन जोत सहित कई प्रकार की जड़ी ऐसी हैं, जो धूप में प्रयोग होती हैं।
किसानों का प्रोत्साहन के साथ प्रशिक्षण
गोपेश्वर के जड़ी-बूटी शोध संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. विजय भट्ट ने बताया कि आयुर्वेदिक दवाओं में इस्तेमाल होने से बाजार में जड़ी-बूटी की अच्छी मांग है। परंपरागत खेती के बजाय जड़ी-बूटी की खेती करने से किसानों को अच्छा लाभ मिलता है। इसे देखते हुए किसानों को जड़ी-बूटी की खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसके लिए किसानों को समय-समय पर प्रशिक्षण भी दिया जाता है।
टेबल
रोग काम आने वाली जड़ी-बूटी
बुखार, पीलिया, मधुमेह, न्यूमोनिया कुटकी
खांसी मुलेठी
पेट दर्द अतीस
शारीरिक दुर्बलता सालमपंजा
कब्ज, गैस सहित पेट की समस्याएं गंदरायण
चोट डोलू गुम