एक्सप्लेनर: हूती ने अरामको को क्यों बनाया निशाना, सऊदी अरब की इस कंपनी क्या इतिहास और कितना बड़ा कारोबार?
सऊदी अरब की सरकारी तेल कंपनी अरामको पर 13 अक्तूबर की रात धहरान में हमला हुआ। दुनिया की प्रमुख तेल कंपनियों में शामिल अरामको का कारोबार कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और पेट्रोकेमिकल उत्पादों तक फैला है। कंपनी की आपूर्ति में रुकावट आने से अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार और भारत जैसे आयातक देशों पर असर पड़ सकता है। आइए जानते हैं।
विस्तार
सऊदी अरब की कंपनी अरामको पर हुए हमले ने एक बार फिर इसे चर्चा में ला दिया है। कंपनी पर हमला कब और कहां हुआ? आखिर इस कंपनी को निशाना बनाने के पीछे क्या वजह हो सकती है? कंपनी का इतिहास किया है? अरामको का कारोबार कितना बड़ा है? इसकी सुरक्षा सऊदी अरब के साथ-साथ दुनिया के लिए क्यों मायने रखती है?
अरामको पर हमला कब और कहां हुआ?
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, 13 अक्तूबर 2026 की रात सऊदी अरब के पूर्वी शहर धहरान में अरामको के प्रशासनिक भवन पर हमला हुआ। सऊदी अरब के ऊर्जा मंत्रालय के मुताबिक, घटना के बाद इमारत में सीमित आग लगी। किसी के घायल होने या जान जाने की खबर नहीं आई।
यह हमला सऊदी अरब और यमन के हूती विद्रोहियों के बीच बढ़ते तनाव के दौरान हुआ। सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन की राजधानी सना में एक ईंधन केंद्र के आसपास रहने वाले लोगों को जगह खाली करने की चेतावनी दी थी। इसके बाद हूती प्रवक्ता याह्या सरी ने सऊदी अरब के खिलाफ कार्रवाई की धमकी दी थी। रिपोर्ट के मुताबिक, इसके बाद अरामको के मुख्यालय परिसर को निशाना बनाया गया।
इसके बाद सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन ने हूती विद्रोहियों के नियंत्रण वाले इलाकों में हवाई हमले किए। इनमें सना और उसके पश्चिम में स्थित सुबाहा ईंधन केंद्र भी शामिल था।
क्या है सऊदी अरामको?
सऊदी अरामको सऊदी अरब की सरकारी कंपनी है। इसका पूरा नाम सऊदी अरेबियन ऑयल कंपनी है। यह कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की खोज और उत्पादन करती है। इसके अलावा, कंपनी तेल को पेट्रोल और डीजल जैसे उत्पादों में बदलने का काम भी करती है।
अरामको पेट्रोकेमिकल उत्पाद भी बनाती है। इनका इस्तेमाल प्लास्टिक, पैकेजिंग और कई औद्योगिक वस्तुओं को बनाने में होता है। इस तरह कंपनी का कारोबार तेल और गैस के उत्पादन से लेकर उनसे जुड़े उत्पाद तैयार करने तक फैला है।
कैसे शुरू हुई अरामको की कहानी?
अरामको की शुरुआत 1933 में हुई थी। उस साल सऊदी अरब की सरकार ने अमेरिकी कंपनी स्टैंडर्ड ऑयल ऑफ कैलिफोर्निया के साथ तेल की खोज के लिए समझौता किया। इसके बाद इस काम के लिए कैलिफोर्निया अरेबियन स्टैंडर्ड ऑयल कंपनी बनाई गई।
सऊदी अरब के रेगिस्तानी इलाकों में सर्वे के बाद 1935 में तेल की खोज के लिए ड्रिलिंग शुरू हुई। शुरुआती वर्षों में कंपनी को ज्यादा सफलता नहीं मिली। 1937 में कंपनी के मुख्य भूवैज्ञानिक मैक्स स्टाइनकी ने लगातार कोशिशें जारी रखने की सलाह दी।
आखिरकार, 1938 में दमाम नंबर 7 कुएं से व्यावसायिक स्तर पर तेल उत्पादन शुरू हुआ। इसे ‘प्रॉस्पेरिटी वेल’ यानी समृद्धि का कुआं भी कहा गया। इस खोज ने सऊदी अरब में तेल उद्योग के विस्तार की नींव रखी।
कैसे बढ़ा तेल उत्पादन?
1949 तक कंपनी का कच्चे तेल का उत्पादन रोजाना पांच लाख बैरल तक पहुंच गया। बढ़ते उत्पादन को दूसरे देशों तक पहुंचाने के लिए परिवहन व्यवस्था का विस्तार किया गया। 1950 में कंपनी ने 1,212 किलोमीटर लंबी ट्रांस-अरेबियन पाइपलाइन पूरी की। इससे सऊदी अरब के पूर्वी हिस्से से भूमध्य सागर तक तेल पहुंचाना आसान हुआ।
1951 में कंपनी ने अरब की खाड़ी में सफानिया तेल क्षेत्र की खोज की। अरामको के इतिहास के मुताबिक, उस समय यह दुनिया का सबसे बड़ा खोजा गया समुद्र के भीतर स्थित तेल क्षेत्र था।
1958 तक कंपनी का कच्चे तेल का उत्पादन रोजाना 10 लाख बैरल से अधिक हो गया। 1962 में उसका कुल कच्चा तेल उत्पादन पांच अरब बैरल तक पहुंच गया। 1971 में औसत दैनिक उत्पादन बढ़कर 44.9 लाख बैरल हो गया।
सऊदी अरब की सरकार के नियंत्रण में कैसे आई कंपनी?
1970 के दशक में अरामको के स्वामित्व में बड़ा बदलाव हुआ। 1973 में सऊदी अरब की सरकार ने कंपनी की 25 फीसदी हिस्सेदारी खरीदी। 1974 में यह हिस्सेदारी बढ़कर 60 फीसदी हो गई। इसके बाद 1980 में सरकार ने कंपनी का पूरा स्वामित्व हासिल कर लिया।
1988 में सऊदी अरेबियन ऑयल कंपनी यानी सऊदी अरामको आधिकारिक रूप से स्थापित हुई। नई कंपनी ने पुरानी अरामको की जिम्मेदारियां संभालीं। अली आई. अल-नईमी कंपनी के पहले सऊदी अध्यक्ष बने और बाद में इसके अध्यक्ष एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी की जिम्मेदारी भी संभाली।
तेल उत्पादन से अंतरराष्ट्रीय कारोबार तक कैसे पहुंची अरामको?
1989 में अरामको ने अमेरिकी कंपनी टेक्साको के साथ मिलकर स्टार एंटरप्राइजेज नाम का संयुक्त उपक्रम बनाया। यह तेल उत्पादन और निर्यात से आगे बढ़कर रिफाइनिंग के कारोबार में विस्तार की दिशा में अहम कदम था।
आगे चलकर यह कारोबार मोटिवा से जुड़ा। 2017 में अरामको पोर्ट आर्थर, टेक्सास स्थित रिफाइनरी की अकेली मालिक बन गई। कंपनी के मुताबिक, यह उत्तरी अमेरिका की सबसे बड़ी एकल-स्थल कच्चे तेल की रिफाइनरी है।
1990 के दशक में अरामको ने दूसरे देशों में भी निवेश बढ़ाया। 1991 में उसने दक्षिण कोरिया की एस-ऑयल कंपनी में 35 फीसदी हिस्सेदारी खरीदी। 1994 में फिलीपींस की पेट्रॉन कॉर्पोरेशन में 40 फीसदी हिस्सेदारी हासिल की। 1996 में उसने ग्रीस की मोटर ऑयल हेलास और उससे जुड़ी एविनॉइल कंपनी में निवेश किया।
इन विस्तारों के साथ अरामको का कारोबार एशिया, यूरोप और उत्तरी अमेरिका के बाजारों तक पहुंच गया।
कितनी बड़ी है अरामको?
अरामको के पास तेल और गैस का विशाल भंडार है। कंपनी की 2025 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, 31 दिसंबर 2025 तक उसके पास 247.2 अरब बैरल तेल के बराबर हाइड्रोकार्बन भंडार थे। इस आंकड़े में तेल और प्राकृतिक गैस जैसे संसाधन शामिल हैं।
कंपनी की सालाना पेट्रोकेमिकल उत्पादन क्षमता 2025 में 5.93 करोड़ टन थी। अरामको में 76 हजार से अधिक कर्मचारी काम करते हैं और कंपनी का कारोबार कई देशों में फैला है।
अरामको की कमाई कितनी है?
अरामको की 2025 की वित्तीय रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनी का समायोजित शुद्ध मुनाफा करीब 104.7 अरब डॉलर था। 2024 में यह 110 अरब डॉलर था।
- समायोजित शुद्ध मुनाफा: 2025 में करीब 104.7 अरब डॉलर।
- कारोबार से मिली नकदी: 2025 में करीब 136.2 अरब डॉलर।
- मुक्त नकदी प्रवाह: 2025 में करीब 85.4 अरब डॉलर।
- निवेश पर कमाई का अनुपात: 2025 में 19.8 फीसदी रहा।
कारोबार से मिली नकदी का मतलब है कि कंपनी की नियमित गतिविधियों से कितना पैसा आया। वहीं, मुक्त नकदी प्रवाह वह राशि है जो परिचालन खर्च और पूंजीगत निवेश के बाद बचती है। निवेश पर कमाई का अनुपात बताता है कि कंपनी ने अपने कारोबार में लगाई गई पूंजी से कितना रिटर्न हासिल किया।
अरामको इतनी अहम क्यों है?
तेल उत्पादन में बड़ी हिस्सेदारी
अरामको ने 2025 में रोजाना औसतन 1.29 करोड़ बैरल तेल के बराबर हाइड्रोकार्बन का उत्पादन किया। इसमें तरल हाइड्रोकार्बन का उत्पादन रोजाना 1.07 करोड़ बैरल था। इससे कंपनी के उत्पादन का पैमाना समझा जा सकता है।
कई देशों को तेल की आपूर्ति
अरामको एशिया समेत कई अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल की आपूर्ति करती है। इसी तेल से पेट्रोल, डीजल और विमान ईंधन जैसे उत्पाद बनाए जाते हैं। अगर कंपनी के उत्पादन या आपूर्ति में बड़ी रुकावट आती है, तो इसका असर उन बाजारों पर पड़ सकता है जो इस आपूर्ति पर निर्भर हैं।
वैश्विक तेल बाजार में सऊदी अरब की भूमिका
अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में सऊदी अरब दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल उत्पादक देश था। वैश्विक कच्चे तेल उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी करीब 11.3 फीसदी थी। ऐसे में सऊदी अरब में तेल उत्पादन या उसकी आपूर्ति प्रभावित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों पर दबाव पड़ सकता है।
गैस और पेट्रोकेमिकल कारोबार
अरामको ने 2025 में रोजाना औसतन 11.4 अरब मानक घन फीट प्राकृतिक गैस का उत्पादन किया। कंपनी पेट्रोकेमिकल उत्पाद भी बनाती है, जिनका इस्तेमाल प्लास्टिक, पैकेजिंग और औद्योगिक वस्तुओं के निर्माण में होता है।
सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था में योगदान
अरामको सऊदी अरब की प्रमुख सरकारी कंपनियों में शामिल है। इसके मुनाफे, निवेश और सरकार को मिलने वाले राजस्व का देश की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ता है। यही वजह है कि कंपनी के उत्पादन और कारोबार में किसी बड़े बदलाव पर सऊदी अरब की आर्थिक स्थिति के लिहाज से भी नजर रखी जाती है।
अरामको के बड़े प्रोजेक्ट कौन-कौन से हैं?
अरामको ने तेल और गैस के उत्पादन के लिए कई बड़े प्रोजेक्ट विकसित किए हैं। इनमें तेल क्षेत्र, गैस संयंत्र और पेट्रोकेमिकल परिसर शामिल हैं।
शायबाह तेल क्षेत्र: यह सऊदी अरब के रुब अल-खाली रेगिस्तान में स्थित है। इसकी खोज 1968 में हुई थी। 2016 तक इसकी उत्पादन क्षमता रोजाना 10 लाख बैरल हो गई थी।
मनीफा तेल क्षेत्र: इसकी खोज 1957 में हुई थी। यह समुद्र में स्थित तेल क्षेत्र है, जहां उत्पादन के लिए 27 कृत्रिम द्वीप बनाए गए। यहां 2013 में उत्पादन शुरू हुआ और 2017 तक इसकी क्षमता रोजाना नौ लाख बैरल हो गई।
सदारा पेट्रोकेमिकल परिसर: यह अरामको और अमेरिकी कंपनी डॉव का संयुक्त प्रोजेक्ट है। इसका निर्माण 2011 में शुरू हुआ था। इसमें करीब 20 अरब डॉलर के निवेश की योजना थी। परिसर में प्लास्टिक और विशेष रसायन बनाने के लिए 26 औद्योगिक इकाइयां शामिल हैं।
फाधिली गैस संयंत्र: इस संयंत्र की डिजाइन क्षमता रोजाना 2.5 अरब घन फीट गैस संसाधित करने की है। कंपनी के मुताबिक, 2021 में इसने अपनी निर्धारित क्षमता हासिल कर ली थी।
वसीत गैस संयंत्र: इस संयंत्र में अक्तूबर 2015 में उत्पादन शुरू हुआ। 2016 में यह अपनी पूरी क्षमता पर पहुंच गया। यह कंपनी के गैस कारोबार का प्रमुख हिस्सा है।
इन परियोजनाओं से पता चलता है कि अरामको का कारोबार केवल कच्चे तेल के उत्पादन तक सीमित नहीं है। कंपनी प्राकृतिक गैस और पेट्रोकेमिकल उत्पादों में भी निवेश करती है।
भारत में अरामको की मौजूदगी क्या है?
अरामको ने 2016 में भारत में अपनी औपचारिक मौजूदगी स्थापित की थी। कंपनी की भारतीय इकाई अरामको एशिया इंडिया प्राइवेट लिमिटेड का कार्यालय गुरुग्राम के सेक्टर 43 स्थित टू होराइजन सेंटर में है। कार्यालय का उद्घाटन 8 अक्तूबर 2017 को हुआ था।
भारत में कंपनी का काम कच्चे तेल और एलपीजी के कारोबार, आपूर्तिकर्ताओं के प्रबंधन, कारोबारी अवसरों और तकनीकी सहयोग से जुड़ा है। इस तरह भारत में उसकी मौजूदगी केवल निवेश प्रस्तावों तक सीमित नहीं है।
रिलायंस इंडस्ट्रीज के साथ क्या था अरामको का सौदा?
अगस्त 2019 में अरामको ने रिलायंस इंडस्ट्रीज के तेल से रसायन कारोबार यानी ओ2सी में 20 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने का प्रस्ताव रखा था। उस समय इस कारोबार का अनुमानित मूल्य करीब 75 अरब डॉलर था। प्रस्तावित हिस्सेदारी की कीमत करीब 15 अरब डॉलर थी।
हालांकि, नवंबर 2021 में दोनों कंपनियों ने सौदे को आगे नहीं बढ़ाने का फैसला किया। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इसके पीछे कारोबार के मूल्यांकन को लेकर मतभेद, कोविड-19 के बाद बदली परिस्थितियां और परिचालन संबंधी जटिलताएं थीं।
रत्नागिरी रिफाइनरी परियोजना में अरामको की क्या भूमिका है?
अरामको महाराष्ट्र के रत्नागिरी में प्रस्तावित रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल परियोजना से भी जुड़ी रही है। अप्रैल 2018 में कंपनी ने इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम के गठबंधन के साथ इस परियोजना को लेकर समझौता किया था।
इस परियोजना में तेल की रिफाइनिंग के साथ पेट्रोकेमिकल उत्पाद बनाने की योजना है। हालांकि, जमीन और दूसरी चुनौतियों के कारण इसे आगे बढ़ाने में देरी हुई। बीपीसीएल की 2024-25 की वार्षिक रिपोर्ट में समझौते को आगे बढ़ाने के संबंध में चर्चा का उल्लेख है। अबू धाबी की राष्ट्रीय तेल कंपनी एडीएनओसी इस परियोजना से बाहर हो चुकी है।
भारत सऊदी अरब से कितना तेल खरीदता है?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से कच्चा तेल खरीदकर पूरा करता है। सऊदी अरब भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है। दोनों देशों के बीच एलपीजी का कारोबार भी होता है।
रियाद स्थित भारतीय दूतावास के आर्थिक और वाणिज्यिक विवरण के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने सऊदी अरब से 3.588 करोड़ मीट्रिक टन कच्चा तेल आयात किया। यह भारत के कुल कच्चे तेल आयात का 13.81 फीसदी था।
इसी अवधि में भारत ने सऊदी अरब से 29.4 लाख मीट्रिक टन एलपीजी आयात की। यह भारत के कुल एलपीजी आयात का 13.08 फीसदी था। ये आंकड़े सऊदी अरब से हुए कुल आयात के हैं, केवल अरामको से हुई खरीद के नहीं।
अरामको पर हमले का तेल की कीमतों पर क्या असर पड़ सकता है?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें मांग, उत्पादन, उपलब्ध आपूर्ति और परिवहन की स्थिति से प्रभावित होती हैं। किसी बड़े तेल उत्पादक क्षेत्र में सुरक्षा संबंधी घटना होने पर बाजार में चिंता बढ़ सकती है। हालांकि, कीमतों पर वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करता है कि तेल के उत्पादन या आपूर्ति में कितनी रुकावट आती है।
रॉयटर्स के मुताबिक, 14 अक्तूबर 2026 को सऊदी अरब के प्रमुख शेयर बाजार सूचकांक में 0.7 फीसदी की गिरावट आई। अरामको के शेयर भी 0.5 फीसदी नीचे आए। इससे पहले 13 अक्तूबर को कारोबार बंद होने के समय कंपनी के शेयर का भाव 25.78 सऊदी रियाल था।