एक्सप्लेनर: क्या होता है आईपीओ, कंपनियां क्यों लाती हैं; आम लोग कैसे कर सकते हैं इसमें निवेश?
जियो प्लेटफॉर्म्स के मेगा आईपीओ को लेकर शेयर बाजार में चर्चा तेज है। ऐसे में समझिए आईपीओ क्या होता है, कंपनियां इसके जरिए पैसा क्यों जुटाती हैं और आम निवेशक इसमें कैसे निवेश कर सकते हैं। साथ ही जानिए आईपीओ से जुड़ी जरूरी शब्दावली, शेयरों की कीमत तय होने से लेकर आवंटन और लिस्टिंग तक की प्रक्रिया और निवेश से जुड़े जोखिम।
विस्तार
जियो के मेगा आईपीओ की इन दिनों शेयर बाजार में खूब चर्चा हो रही है। रिलायंस इंडस्ट्रीज की जियो प्लेटफॉर्म्स के इस आईपीओ के जरिए 30,213 करोड़ रुपये जुटाने की योजना है।
ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर आईपीओ क्या होता है? कंपनियां इसे क्यों लाती हैं? इससे जुड़ी कौन-कौन सी शब्दावली होती है? कंपनियों को किन प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है? आम लोग इसमें कैसे निवेश कर सकते हैं?
आईपीओ से क्या समझते हैं?
आईपीओ का पूरा नाम इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग है। जब कोई कंपनी पहली बार अपने शेयर आम निवेशकों को खरीदने के लिए पेश करती है, तो इसे आईपीओ कहा जाता है। इसके जरिए निवेशकों को कंपनी में हिस्सेदारी खरीदने का मौका मिलता है।
आईपीओ पूरा होने और शेयर स्टॉक एक्सचेंज पर सूचीबद्ध होने के बाद निवेशक इन शेयरों की बाजार में खरीद-बिक्री कर सकते हैं।
कंपनियां आईपीओ क्यों लाती हैं?
कंपनियां अपनी अलग-अलग वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए आईपीओ लाती हैं। इसके प्रमुख कारण हैं:
- कारोबार का विस्तार: नए बाजारों में पहुंचने और कारोबार बढ़ाने के लिए।
- नई परियोजनाएं: नए प्लांट, सुविधाएं और दूसरी परियोजनाएं शुरू करने के लिए।
- कर्ज चुकाना: कंपनी पर मौजूद कर्ज का बोझ कम करने के लिए।
- नई तकनीक और शोध: तकनीक विकसित करने और शोध पर खर्च करने के लिए।
- पुराने निवेशकों को मौका: मौजूदा शेयरधारक अपनी हिस्सेदारी का कुछ हिस्सा बेच सकते हैं।
- बाजार में पहचान: शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने से कंपनी की पहचान बढ़ सकती है।
आईपीओ के बाद कंपनी को अपने वित्तीय प्रदर्शन और जरूरी कारोबारी जानकारियां नियमानुसार सार्वजनिक करनी होती हैं।
आईपीओ में नए शेयर जारी होते हैं या पुराने शेयर बिकते हैं?
आईपीओ में यह समझना जरूरी है कि शेयर कंपनी जारी कर रही है या मौजूदा शेयरधारक अपनी हिस्सेदारी बेच रहे हैं। इससे पता चलता है कि शेयरों की बिक्री से मिलने वाली रकम किसे मिलेगी।
1. फ्रेश इश्यू
इसमें कंपनी नए शेयर जारी करती है। इनकी बिक्री से मिलने वाली रकम कंपनी को मिलती है, जिसका इस्तेमाल कारोबार बढ़ाने, कर्ज चुकाने या नई परियोजनाओं के लिए किया जा सकता है।
2. ऑफर फॉर सेल
इसमें कंपनी के मौजूदा शेयरधारक अपने शेयर बेचते हैं। इससे मिलने वाली रकम आम तौर पर शेयर बेचने वाले निवेशकों को मिलती है, कंपनी को नहीं।
किसी आईपीओ में फ्रेश इश्यू, ऑफर फॉर सेल या दोनों शामिल हो सकते हैं। इसलिए आवेदन से पहले यह देखना जरूरी है कि आईपीओ से मिलने वाली रकम का इस्तेमाल कैसे होगा।
आईपीओ कितने प्रकार के होते हैं?
शेयरों की कीमत तय करने के तरीके के आधार पर आईपीओ मुख्य रूप से दो तरह के होते हैं।
1. फिक्स्ड प्राइस इश्यू
इसमें कंपनी आईपीओ खुलने से पहले ही शेयर की कीमत तय कर देती है। निवेशक उसी कीमत पर शेयर खरीदने के लिए आवेदन करते हैं।
2. बुक बिल्डिंग इश्यू
इसमें कंपनी शेयर की एक निश्चित कीमत के बजाय प्राइस बैंड जारी करती है। निवेशक तय दायरे में बोली लगाते हैं और इन बोलियों के आधार पर शेयर की अंतिम कीमत तय होती है।
क्या होता है प्राइस बैंड?
बुक बिल्डिंग आईपीओ में शेयर की न्यूनतम और अधिकतम कीमत के बीच एक दायरा तय किया जाता है। इसे प्राइस बैंड कहते हैं।
- फ्लोर प्राइस: प्राइस बैंड की सबसे कम कीमत।
- कैप प्राइस: प्राइस बैंड की सबसे ज्यादा कीमत।
- इश्यू प्राइस: वह अंतिम कीमत जिस पर आईपीओ के शेयर आवंटित किए जाते हैं।
उदाहरण के लिए, अगर किसी आईपीओ का प्राइस बैंड 100 से 120 रुपये है, तो निवेशक निर्धारित नियमों के अनुसार, इस दायरे में बोली लगा सकते हैं। अंतिम कीमत बोलियों और मांग के आधार पर तय होती है।
आईपीओ से जुड़ी जरूरी शब्दावली क्या-क्या है?
आईपीओ की प्रक्रिया और कंपनी के दस्तावेजों को समझने के लिए कुछ शब्दों का अर्थ जानना जरूरी है।
- इश्यूअर (Issuer): आईपीओ के जरिए शेयर जारी करने वाली कंपनी।
- अंडरराइटर (Underwriter): आईपीओ की प्रक्रिया में कंपनी की मदद करने वाली वित्तीय संस्था या मध्यस्थ।
- डीआरएचपी (DRHP): ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस। इसमें कंपनी के कारोबार, वित्तीय स्थिति, योजनाओं और जोखिमों की जानकारी होती है।
- आरएचपी (RHP): रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस। इसमें आईपीओ से जुड़ी अद्यतन जानकारी दी जाती है।
- सब्सक्रिप्शन: आईपीओ में शेयरों के लिए निवेशकों की ओर से किए गए आवेदन।
- अलॉटमेंट: निवेशकों को शेयर आवंटित करने की प्रक्रिया।
- लिस्टिंग: स्टॉक एक्सचेंज पर कंपनी के शेयर सूचीबद्ध होने की प्रक्रिया।
- लिस्टिंग गेन: शेयर की लिस्टिंग कीमत इश्यू प्राइस से अधिक होने पर मिलने वाला अंतर। इसकी कोई गारंटी नहीं होती।
क्या होता है लॉट साइज?
आईपीओ में निवेशक आम तौर पर शेयरों की एक निर्धारित संख्या के लिए आवेदन करते हैं। इस संख्या को लॉट साइज कहते हैं। आवेदन के लिए जरूरी रकम शेयर की कीमत और एक लॉट में शामिल शेयरों की संख्या पर निर्भर करती है।
उदाहरण के लिए, अगर एक लॉट में 100 शेयर हैं और इश्यू प्राइस 110 रुपये प्रति शेयर है, तो एक लॉट के लिए 11,000 रुपये की जरूरत होगी। यह केवल समझाने के लिए दिया गया उदाहरण है।
ओवरसब्सक्रिप्शन और अंडरसब्सक्रिप्शन क्या हैं?
आईपीओ में उपलब्ध शेयरों के मुकाबले निवेशकों की मांग को इन शब्दों से समझा जाता है।
- ओवरसब्सक्रिप्शन: उपलब्ध शेयरों से ज्यादा शेयरों के लिए आवेदन आना।
- अंडरसब्सक्रिप्शन: उपलब्ध शेयरों की तुलना में कम आवेदन आना।
ओवरसब्सक्रिप्शन होने पर हर आवेदक को शेयर मिलना जरूरी नहीं है। आवंटन संबंधित नियमों और निवेशक की श्रेणी के अनुसार किया जाता है।
कौन होते हैं एंकर निवेशक?
एंकर निवेशक बड़े संस्थागत निवेशक होते हैं, जिन्हें बुक बिल्डिंग आईपीओ में निर्धारित प्रक्रिया के तहत आम निवेशकों के लिए इश्यू खुलने से पहले शेयरों के लिए बोली लगाने का अवसर दिया जाता है। उनकी भागीदारी से आईपीओ में बड़े निवेशकों की शुरुआती रुचि का संकेत मिल सकता है। हालांकि, इससे यह तय नहीं होता कि दूसरे निवेशकों को भी फायदा होगा।
क्या होता है ग्रीन शू ऑप्शन?
ग्रीन शू ऑप्शन ऐसा प्रावधान है, जिसके तहत तय शर्तों के अनुसार आईपीओ में मूल योजना से अधिक शेयर आवंटित किए जा सकते हैं। इसे ओवर-अलॉटमेंट ऑप्शन भी कहा जाता है। यह सुविधा हर आईपीओ में होना जरूरी नहीं है।
क्या होता है फ्लिपिंग?
कुछ निवेशक आईपीओ में मिले शेयरों को लंबे समय तक रखने के बजाय लिस्टिंग के शुरुआती दिनों में ही बेच देते हैं। कम समय में शेयर बेचकर मुनाफा कमाने की कोशिश वाली इस रणनीति को फ्लिपिंग कहते हैं। हालांकि, शेयर की कीमत बढ़ने की गारंटी नहीं होती और कीमत गिरने पर नुकसान भी हो सकता है।
आईपीओ में आवेदन करने के लिए क्या जरूरी है?
आईपीओ में आवेदन करने के लिए निवेशक को कुछ जरूरी शर्तें पूरी करनी होती हैं।
- पैन कार्ड: वैध पैन कार्ड होना चाहिए।
- डीमैट खाता: शेयरों को इलेक्ट्रॉनिक रूप में रखने के लिए डीमैट खाते की जरूरत होती है।
- आवेदन का माध्यम: आईपीओ के नियमों के अनुसार आवेदन और भुगतान की प्रक्रिया पूरी करनी होती है।
- ट्रेडिंग खाता: आवेदन के लिए हर स्थिति में ट्रेडिंग खाते की जरूरत नहीं होती, लेकिन लिस्टिंग के बाद शेयर बेचने के लिए इसकी जरूरत पड़ सकती है।
आम आदमी आईपीओ में आवेदन कैसे कर सकता है?
आम निवेशक ब्रोकर के एप या वेबसाइट, बैंक की नेट बैंकिंग सुविधा या एएसबीए (एप्लिकेशन सपोर्टेड बाय ब्लॉक्ड अमाउंट) के जरिए आईपीओ में आवेदन कर सकते हैं।
1. आईपीओ चुनें: ब्रोकर के ऐप या वेबसाइट पर उपलब्ध आईपीओ की सूची देखें। बैंक की नेट बैंकिंग में भी आवेदन का विकल्प देख सकते हैं।
2. कंपनी की जानकारी पढ़ें: कंपनी के कारोबार, वित्तीय स्थिति और संभावित जोखिमों को समझें।
3. आवेदन भरें: शेयरों की संख्या, बोली की कीमत और जरूरी विवरण दर्ज करें।
4. रकम ब्लॉक करें: यूपीआई या एएसबीए के जरिए आवेदन की रकम ब्लॉक करें। एएसबीए के तहत रकम बैंक खाते में ब्लॉक रहती है और शेयर आवंटित होने पर ही जरूरी रकम काटी जाती है।
5. अलॉटमेंट का इंतजार करें: आईपीओ बंद होने के बाद नियमों के अनुसार शेयर आवंटन की प्रक्रिया पूरी होती है। हर आवेदक को शेयर मिलना जरूरी नहीं है।
6. शेयरों की लिस्टिंग देखें: शेयर आवंटित होने पर वे डीमैट खाते में जमा होते हैं। लिस्टिंग के बाद निवेशक उन्हें अपने पास रख सकते हैं या स्टॉक एक्सचेंज पर बेच सकते हैं।
अगर शेयर आवंटित नहीं होते, तो ब्लॉक की गई रकम जारी कर दी जाती है।
आईपीओ लाने के लिए किसी कंपनी को किन चरणों से गुजरना पड़ता है?
आईपीओ लाने के लिए कंपनी को कई वित्तीय, कानूनी और नियामकीय प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। इसके लिए कंपनी वित्तीय संस्थाओं, मर्चेंट बैंकरों, ऑडिटरों और कानूनी सलाहकारों की मदद लेती है।
1. सलाहकारों की नियुक्ति: कंपनी आईपीओ की तैयारी, दस्तावेज तैयार करने और नियामकीय प्रक्रियाओं में मदद के लिए विशेषज्ञों की नियुक्ति करती है।
2. डीआरएचपी तैयार करना: कंपनी अपने कारोबार, वित्तीय स्थिति, प्रबंधन, भविष्य की योजनाओं और संभावित जोखिमों की जानकारी के साथ ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस तैयार करती है।
3. सेबी की समीक्षा: कंपनी डीआरएचपी को भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) की नियामकीय प्रक्रिया के तहत जमा करती है। सेबी दस्तावेजों की समीक्षा कर सकता है और जरूरत पड़ने पर कंपनी से स्पष्टीकरण या बदलाव मांग सकता है। इसका उद्देश्य निवेशकों के सामने कंपनी और आईपीओ से जुड़ी जरूरी जानकारी उपलब्ध कराना है।
4. रोड शो: कंपनी के अधिकारी संभावित निवेशकों के सामने कारोबार, वित्तीय प्रदर्शन और भविष्य की योजनाएं रखते हैं। इन प्रस्तुतियों और बैठकों को रोडशो कहा जाता है।
5. कीमत और तारीख तय करना: कंपनी आईपीओ के प्रकार के अनुसार शेयरों की कीमत या प्राइस बैंड तय करती है। इसके बाद आईपीओ खुलने और बंद होने की तारीखों की घोषणा की जाती है।
6. आवेदन और शेयर आवंटन: आईपीओ खुलने पर निवेशक निर्धारित समय में आवेदन करते हैं। आईपीओ बंद होने के बाद नियमों के अनुसार शेयरों का आवंटन किया जाता है।
7. स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्टिंग: प्रक्रिया पूरी होने के बाद कंपनी के शेयर स्टॉक एक्सचेंज पर सूचीबद्ध होते हैं। इसके बाद निवेशक बाजार में इन शेयरों की खरीद-बिक्री कर सकते हैं।
इश्यू प्राइस और लिस्टिंग प्राइस में क्या अंतर है?
इश्यू प्राइस: वह कीमत जिस पर आईपीओ के तहत निवेशकों को शेयर पेश किए जाते हैं और आवंटन की अंतिम कीमत तय होती है।
लिस्टिंग प्राइस: वह कीमत जिस पर कंपनी के शेयर स्टॉक एक्सचेंज पर कारोबार शुरू करते हैं।
लिस्टिंग प्राइस बाजार में खरीद और बिक्री के ऑर्डर के आधार पर तय होती है। यह इश्यू प्राइस से अधिक, बराबर या कम हो सकती है।
लिस्टिंग के दिन कारोबार कैसे शुरू होता है?
आईपीओ की लिस्टिंग के दिन शेयरों की शुरुआती कीमत तय करने के लिए प्री-ओपन प्रक्रिया होती है।
- सुबह 9 से 9:45 बजे: निवेशक खरीदने और बेचने के ऑर्डर देते हैं।
- सुबह 9:45 से 9:55 बजे: ऑर्डर का मिलान कर शुरुआती कीमत तय की जाती है।
- सुबह 9:55 से 10 बजे: नियमित कारोबार शुरू होने से पहले की प्रक्रिया होती है।
- सुबह 10 बजे: शेयरों की खरीद-बिक्री शुरू होती है।