Economy: आर्थिक मोर्चे पर मिल रहे मजबूत संकेत, मोदी की आर्थिक नीतियों पर कैसे सवाल उठाएगा विपक्ष
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विस्तार
लोकसभा चुनाव की तैयारियों में तेजी आ चुकी है और इसके साथ ही विपक्ष ने केंद्र सरकार पर हमले भी तेज कर दिए हैं। विपक्ष की ओर से सरकार पर सबसे बड़ा हमला उसकी आर्थिक नीतियों को लेकर है। विपक्ष का आरोप है कि बेरोजगारी बढ़ रही है, अर्थव्यवस्था कमजोर हो रही है और लोगों की आर्थिक क्षमता घट रही है। लेकिन विपक्ष के इन दावों के उलट आईएमएफ आने वाले वर्षों में भारत की विकास दर छह फीसदी से अधिक होने का अनुमान लगा रहा है। साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि दुनिया की अर्थव्यवस्था की कुल वृद्धि में अकेले भारत की हिस्सेदारी 16 फीसदी के करीब रह सकती है। जीएसटी कर संग्रह में भी लगातार वृद्धि होने से देश की अर्थव्यवस्था के बेहतर होने का संकेत मिल रहा है। ऐसे में बड़ा प्रश्न है कि विपक्ष के केंद्र सरकार की नीतियों पर हमला कितना जमीनी है और लोकसभा चुनाव में इसका क्या असर पड़ सकता है?
अपना ही रिकॉर्ड तोड़ रहा देश- विष्णु मित्तल
आर्थिक मामलों के जानकार और भाजपा नेता विष्णु मित्तल ने अमर उजाला से कहा कि मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर विपक्ष के इन हमलों का आंकड़े साथ नहीं देते। अर्थव्यवस्था के हर मोर्चे पर बेहतर आंकड़े सामने आ रहे हैं और इसके आलोक में कहा जा सकता है कि सरकार सही आर्थिक नीतियों पर आगे बढ़ रही है, जिसका परिणाम लगातार बेहतर आंकड़ों के रूप में सामने आ रहा है। विश्व बैंक, आईएमएफ और प्रतिष्ठित आर्थिक पत्र-पत्रिकाओं की रिपोर्ट भी केंद्र के आंकड़े को सही करार देते हैं। ऐसे में विपक्ष के दावों को सही नहीं कहा जा सकता।
विष्णु मित्तल ने कहा कि वित्त वर्ष 2023-24 में नवंबर माह तक का जीएसटी कर संग्रह पिछले वर्ष के इसी समय अवधि की तुलना में 11.9 फीसदी अधिक है। अभी तक 1.50 लाख करोड़ रुपये के जीएसटी कर संग्रह को एक बेंच मार्क माना जा रहा था, लेकिन इस वित्त वर्ष में 1.60 लाख करोड़ रुपये का कर संग्रह रिकॉर्ड छह बार दर्ज किया जा चुका है। अकेले नवंबर माह में ही 1.67 लाख करोड़ रुपये से अधिक जीएसटी कर संग्रह किया गया, जो पिछले वर्ष के इसी माह की तुलना में 15 फीसदी ज्यादा है। इस तरह हम कह सकते हैं कि भारत स्वयं अपना ही रिकॉर्ड लगातार तोड़ रहा है। अर्थव्यवस्था में जिस तरह की मजबूती के संकेत मिल रहे हैं, आने वाले समय में भी यह क्रम लगातार बरकरार रह सकता है।
जीएसटी कर संग्रह सीधे तौर पर सेवाओं और वस्तुओं के उत्पादन और बिक्री पर लगता है। यदि इसका आकार बढ़ रहा है, तो यह प्रमाणित तथ्य हो गया कि देश में सेवाओं-वस्तुओं के उत्पादन-निर्माण और बिक्री में वृद्धि हो रही है। यह किसी भी अर्थव्यवस्था को मापने का सबसे प्रत्यक्ष और मजबूत संकेत है।
'बेरोजगारी के आंकड़े दुरुस्त करे विपक्ष'
विष्णु मित्तल ने कहा कि हमारी अर्थव्यवस्था का लगभग छह फीसदी संगठित क्षेत्र से आता है, जबकि लगभग 94 फीसदी हिस्सेदारी असंगठित क्षेत्र की है। सकल अर्थव्यवस्था के बेहतर प्रदर्शन के लिए आवश्यक है कि असंगठित क्षेत्र भी उतनी ही मजबूती से प्रदर्शन करे। यदि असंगठित क्षेत्र में उत्पादन और निर्माण की गतिविधियां ज्यादा नहीं होतीं, तो देश विकास दर का यह लक्ष्य कभी हासिल नहीं कर पाता। लेकिन चूंकि, सकल घरेलू उत्पाद का आकार लगातार बढ़ रहा है, यह माना जा सकता है कि असंगठित क्षेत्र भी बेहतर प्रदर्शन कर रहा है। इसका सीधा परिणाम असंगठित क्षेत्र में नौकरियों के अवसरों के रूप में सामने आता है। यानी असंगठित क्षेत्र भी बेहतर प्रदर्शन कर रहा है और यहां नौकरियों की भी पर्याप्त उपलब्धता बनी हुई है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बेहतर होने का प्रमाण
2023 में देश में एफएमसीजी उत्पादों की खपत में लगभग आठ फीसदी औसत की दर से वृद्धि होने का अनुमान लगाया जा रहा है। देश में ग्रामीण आबादी की हिस्सेदारी लगभग दो तिहाई है और एफएमसीजी उत्पादों का लगभग 40 फीसदी यहीं पर खपत होता है। यदि ग्रामीण क्षेत्र में एफएमसीजी उत्पादों की खपत में वृद्धि हो रही है, तो यह तभी संभव है जब लोगों की खरीद क्षमता में वृद्धि हो और यह तभी हो सकता है, जब लोगों के हाथों में पैसा पहुंचे। यह संकेत भी प्रमाणित करता है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था बेहतर हो रही है।
विष्णु मित्तल ने कहा कि विपक्ष सरकार पर यह आरोप लगाता रहा है कि बेरोजगारी दर बढ़ रही है, लेकिन ये आंकड़े उसके दावों की पोल खोल देते हैं। उन्होंने कहा कि सच्चाई यह है कि अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ने, विदेशी निवेश में लगातार वृद्धि होने और दुनिया के बाजारों में खलबली मचने के बाद भारत में भरोसा बढ़ने के कारण यहां लगातार नए उद्यम स्थापित हो रहे हैं, जिससे नौकरियों के अवसरों में वृद्धि हो रही है।
'निवेश को मोदी ने बनाया मूल मंत्र'
आर्थिक मामलों के जानकार डॉ. नागेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को गति देने का मूल मंत्र यह रहा है कि वहां की सरकार आधारभूत ढांचे में निवेश करे। इससे लगभग 50 उद्योंगों को गति मिलती है। इनके गति में आने के बाद अन्य उद्योगों में भी तेजी आती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्ता में आने के बाद से ही निवेश को विकास का मूल मंत्र बना लिया और पूरे देश में सड़कों, रेल नेटवर्क, एतिहासिक-आध्यात्मिक इमारतों के निर्माण में भारी धन झोंका। इसका परिणाम हुआ कि जहां पूरे देश के मूलभूत ढांचे में विकास हुआ, वहीं देश की अर्थव्यवस्था को गति मिली।
किसी देश के विकसित हो जाने के बाद मूलभूत ढांचे में विकास की संभावनाएं कम होने लगती हैं, इससे उनका विकास भी ठहरने लगता है। इसी तरह की स्थिति इस समय अमेरिका और यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्थाओं में दिखाई दे रही है। लेकिन चूंकि, भारत विकासशील अर्थव्यवस्था वाला देश है, हमारी आबादी और इसका क्षेत्रफल बहुत बड़ा है, हमारे पास अभी मूलभूत ढांचे में विकास की असीम संभावनाएं मौजूद हैं। इससे यह भी निष्कर्ष निकलता है कि आने वाले समय में देश के अर्थव्यवस्था की गति लगातार तेज बनी रहेगी। यदि आईएमएफ और अन्य बड़ी प्रतिष्ठित संस्थाएं भारत की अर्थव्यवस्था के बेहतर होने के संकेत देख रही हैं, तो इसका मूल कारण इसी सोच में समाया हुआ है।
यहां सुधार की जरूरत
आर्थिक विशषज्ञ डॉ. कृष्ण कुमार ने कहा कि देश कई मोर्चों पर बेहतर प्रगति कर रहा है, लेकिन अर्थव्यवस्था के कई संकेत ऐसे भी हैं जहां देश को बहुत सुधार करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि किसी देश की अर्थव्यवस्था के बेहतर होने से हर नागरिक के जीवन स्तर को बेहतर होने का दावा नहीं किया जा सकता। हर नागरिक के जीवन स्तर को ऊंचा करने के बाद ही किसी देश की अर्थव्यवस्था सही मायने में अच्छी और बेहतर कही जा सकती है।
प्रति व्यक्ति आय के मामले में लक्जमबर्ग और आयरलैंड जैसे देश इस मामले में दुनिया में टॉप पर हैं, जबकि दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का होने के बाद भी भारत इस मामले में बहुत पीछे है। इसी प्रकार मानव विकास सूचकांक के मामले में भी देश बहुत पीछे है। सरकार को इन मोर्चों पर बेहतर करने की जरूरत है।