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Defence: भारत में बने डिफेंस सिस्टम पर बढ़ रहा दुनिया का भरोसा, कंपनियों को निर्यात ऑर्डर बढ़ने की उम्मीद

Tue, 01 Jul 2025 05:22 PM IST
नविता स्वरूप बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, मुंबई Published by: नविता स्वरूप Updated Tue, 01 Jul 2025 05:22 PM IST
सार

Defence Sector: भारत को अब चीन प्लस के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है और विश्व स्तर पर एक स्टेबल लैंड माना जाता है। दुनिया भर के देश भारत में बने रक्षा उत्पाद पर भरोसा करते हैं।  भारत की टैक्नोलॉजी  और कम बजट में बने डिफेंस सिस्टम फिल्ड प्रूवन हैं यानी फिल्ड पर काम करते हैं, जिसकी वजह भारतीय डिफेंस कंपनियों को अधिक एक्सपोर्ट ऑर्डर मिलने की संभावना है।

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Defence systems made in India are field proven, now the world has faith in them
रक्षा विनिर्माण - फोटो : एएनआई

विस्तार

नाटो के सदस्य देशों ने बीते 25 जून को अपने डिफेंस बजट को बढ़ाने पर सहमति जताई है। इन देशों ने वित्त वर्ष 2035 तक अपने डिफेंस बजट को बढ़ाकर जीडीपी के 5 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रखा है, जो अभी केवल 2 प्रतिशक के आसपास है। नाटो देशों के इस बयान के बाद भी डिफेंस शेयरों में तेजी शुरू हो गई है। उद्योग का कहना है कि नाटो देशों के इस कदम से भारतीय डिफेंस कंपनियों को अधिक एक्सपोर्ट ऑर्डर मिलने की संभावना है। वहीं दूसरी और इनके लिए ज्वाइंट वेंचर के नए मौके भी खुल सकते हैं।

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भारत में बने डिफेंस सिस्टम फिल्ड प्रूवन, विश्व को हुआ भरोसा

पारस डिफेंस एंड स्पेस टेक्नोलॉजीज के निदेशक अमित महाजन ने अमर उजाला डॉटकॉम को बताया कि ऑपरेशन सिंदूर से यह साबित हो चुका है कि, भारत में बने डिफेंस सिस्टम ने बेहतर प्रदर्शन किया, वहीं चीन के बने डिफेंस सिस्टम बुरी तरह फेल हो गए, इससे भारत के डिफेंस सिस्टम को लेकर वैश्विक स्तर पर विश्वास बढ़ा है। भारत को अब चीन प्लस के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है और विश्व स्तर पर एक स्टेबल लैंड माना जाता है। यानी विश्व भारतीय रक्षा उत्पाद पर भरोसा करते हैं।  भारत की टैक्नोलॉजी और यहां के कम बजट में बने डिफेंस सिस्टम फिल्ड प्रूवन यानी फिल्ड पर काम करते हैं, जिस पर विश्व को पूरा भरोसा हो गया है। जिसकी वजह भारतीय डिफेंस कंपनियों को अधिक एक्सपोर्ट ऑर्डर मिलने की संभावना है। उन्होंने बताया कई टेक्नोलॉजी अभी भारत में नहीं है, लेकिन उस क्षेत्र में अन्य देशों की कंपनियों के साथ समझौता कर उस टेक्नोलॉजी को भारत लाने पर जोर दिया जा रहा है। 

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हाइड्रोजन पावर ड्रोन और ऑप्टिकल फाइबर कैमरों पर हो रहा काम

वे कहते हैं कि हमारे एंटी ड्रोन सिस्टम (दुश्मनों के ड्रोन को पहचान कर उसको गिराना )जिसको ऑपरेशन सिंदूर में सफलता मिली, हम उस पर तेजी से काम कर रहे हैं। वर्तमान समय में ड्रोन बैटरी द्वारा चलाए जाते हैं, लेकिन अब हाइड्रोजन पावर ड्रोन के इस्तेमाल पर काम किया जा रहा है। बैटरी से चलने वाले ड्रोन 12 घंटे तक उड़ान भर सकते हैं, जबकि हाइड्रोजन पावर ड्रोन की उड़ने क्षमता काफी अधिक होती है। साथ ही अब ड्रोन में ऑप्टिकल फाइबर कैमरों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस नई तकनीक के कैमरों का इस्तेमाल सबमरीन और ड्रोन में किया जा रहा है, इसे ऑपरेटर सीधे कैमरे के जरिए से कंट्रोल करता है। हमने रिसर्च एंड डेवलपमेंट का चक्र पहले जो वर्षों का होता था उसे 6 से 9 महीने किया जा चुका है,  हाल ही में कंपनी को इजरायल से 300 करोड़ रुपये के ऑर्डर भी प्राप्त हुए हैं।

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मेक इंडिया के बाद तैयार हुआ डिफेंस उद्योग का आधार

उनका कहना है कि मेक इन इंडिया से भारतीय डिफेंस उद्योग का आधार बन गया है। दस साल पहले इस उद्योग में कोई विजिबिलटी नहीं थी, लेकिन अब उद्योग में तेजी आई है। भारत का यह सेक्टर काफी तेजी से ग्रो कर रहा है। इसलिए हमें उम्मीद है कि भारत अपने 5 बिलियन डॉलर के एक्सपोर्ट लक्ष्य को प्राप्त कर लेगा। अजेलिया कैपिटल के संह संस्थापक और प्रबंध भागीदार अभिजीत श्रीवास्तव कहते हैं देश में डिफेंस सेक्टर के साथ ही 2030 तक इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, रिन्यूएबल एनर्जी, बैटरी स्टोरेज जैसे कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में 600 बिलियन अमेरिकी डॉलर के निवेश के अवसर होंगे। यह देश में मजबूत निर्माण सहित डिफेंस सेक्टर को भी सहायक होंगे।

रक्षा क्षेत्र के लिए सेमीकंडक्टर निर्माण घरेलू स्तर किया जाना महत्वपूर्ण

आरआईआर पावर इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड के अध्यक्ष और निदेशक डॉ. हर्षद मेहता कहते हैं भारत डिफेंस क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है। जिसमें रिन्यूएबल एनर्जी और सेमीकंडक्टर के इकोसिस्टम को भी मजूबत किया जा रहा है। यह डिफेंस सेक्टर के सहायक है। मेक इन इंडिया की पहल के तहत सेमीकंडक्टर का निर्माण देश में किया जाना महत्वपूर्ण है। क्योंकि सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत रखने से रक्षा प्रौद्योगिकियों के लिए आयात पर निर्भरता कम हो जाती है। हमने हाल ही में 618 करोड़ के निवेश के साथ देश में सेमीकंडक्टर विनिर्माण की क्षमताओं को बढ़ावा दिया है, इससे महत्वपूर्ण डिफेंस सेक्टर में इस्तेमाल होने वाली प्रौद्योगिकियों के लिए आयात पर कम निर्भरत होना पड़ेगा।

सरकार छह महीने में एक नई रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (डीएपी 2025) आएगी

विशेषज्ञ बताते हैं कि भारत ऑपरेशन सिंदूर के बाद अपनी डिफेंस क्षमता और सर्विलांस क्षमताओं को मजबूत करने पर काम कर रहा है। इसके लिए सरकार की ओर से सशस्त्र बलों के लिए 52 सैटेलाइट को लॉन्च करने और एक व्यापक सैन्य अंतरिक्ष प्रोग्राम को तैयार करने का प्रस्ताव रखा गया है। डिफेंस रिसर्च और डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेश (डीआरडीओ) ने अग्नि-5 मिसाल सिस्टम के नए वर्जन पर तेजी से काम शुरू कर दिया है। हाल ही में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने मानव रहित हवाई वाहनों ड्रोन की युद्ध में उपयोगिता को देखते हुए सैन्य ग्रेड ड्रोन के लिए देश की उत्पादन क्षमता को बढ़ाने के लिए कहा है, साथ ही रक्षा खरीदी चक्र को दो साल तक कम करने को कहा है। उन्होंने यह भी कहा है कि सरकार छह महीने में एक नई रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (डीएपी 2025) लेकर आएगी। उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में कहा कि भारत में ड्रोन के लिए एक महत्वपूर्ण विर्निमाण इको सिस्टम है, लेकिन इसका बहुत बड़ा हिस्सा नागरिक ड्रोन का है। सैन्स ग्रेड ड्रोन में का हिस्सा काफी कम है, इसलिए देश में जो चार से पांच निर्माता कंपनियां है, जिनके पास ड्रोन बनाने की क्षमता है उन्हें इसे और विकसित करने की जरूरत है।

भारत के रक्षा उत्पादन में जोरदार वृद्धि की संभावना

हाल ही में भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) और केपीएमजी इंडिया की रक्षा क्षेत्र विजन रिपोर्ट पेश की गई। इस रिपोर्ट के अनुसार भारत का रक्षा बजट 2025-26 (वित्त वर्ष 26) के लिए 6.81 ट्रिलियन रुपये से लगभग पांच गुना बढ़कर 2047 में 31.7 ट्रिलियन रुपये हो सकता है, जबकि रक्षा उत्पादन वित्त वर्ष 24 के लिए 1.46 ट्रिलियन रुपये से छह गुना बढ़कर  8.8 ट्रिलियन रुपये हो सकता है।

रक्षा निर्यात 2047 में बढ़कर 2.8 ट्रिलियन रुपये हो जाएगा

रिपोर्ट के अनुसार भारत का रक्षा निर्यात 2047 में बढ़कर 2.8 ट्रिलियन रुपये हो जाएगा, जो वित्त वर्ष 2025 में 24,000 करोड़ रुपये से लगभग 12 गुना अधिक है।

आरएंडडी पर भारत का खर्च भी बढ़ेगा

वहीं कुल अनुसंधान और विकास (आरएंडडी) पर खर्च मौजूदा समय में रक्षा बजट के 4 प्रतिशत से बढ़कर 8 से 10 प्रतिशत हो सकता है और रक्षा खर्च सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) के 2 प्रतिशत से बढ़कर 4 से 5 प्रतिशत हो सकता है।

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