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गांवों में कोरोना: किसानों-मजदूरों के संक्रमित होने से बीमार होगी अर्थव्यवस्था, मांग कमजोर होने से टूट सकती है उद्योगों की कमर

Mon, 17 May 2021 03:02 PM IST
Harendra Chaudhary अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Mon, 17 May 2021 03:02 PM IST
सार

कोरोना की पहली लहर में ग्रामीण क्षेत्रों में मांग बनी रही, जिससे उद्योगों को मजबूती मिली, लेकिन इस बार ग्रामीण क्षेत्रों में कोरोना संक्रमण बढ़ने से मांग कमजोर होने की आशंका...    

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Deep impact of the second wave of Coronavirus in villages, Experts said agricultural production may decline
आराम करता मजदूर - फोटो : PTI (for Reference)

विस्तार

कोरोना की पहली लहर में गांव औद्योगिक क्षेत्रों के लिए बड़ी उम्मीद बनकर उभरे थे। जिस समय शहरी क्षेत्रों में तालाबंदी-बेरोजगारी के कारण सभी जरूरी चीजों की मांग ठप पड़ गई थी, गांवों ने देश की अर्थव्यवस्था को संभाला। इस दौरान ऑटो सेक्टर से लेकर एफएमसीजी सेक्टर तक को ग्रामीण क्षेत्रों में मांग बने रहने से मजबूती मिली और अर्थव्यवस्था संभल गई।

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लेकिन कोरोना की दूसरी लहर का सबसे घातक असर गांवों पर ही देखा जा रहा है। उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र सहित देश के 12 से ज्यादा राज्यों में ग्रामीण क्षेत्रों में कोरोना कहर बनकर टूटा है। किसान-मजदूर भारी संख्या में बीमार हो रहे हैं और कोरोना के कारण गांवों में मौत बढ़ी है। विशेषज्ञों को आशंका है कि इसके कारण कृषि उत्पादन में कमी आ सकती है।

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धान के उत्पादन में आ सकती है कमी

कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा ने अमर उजाला को बताया कि किसानों और मजदूरों के बीमार पड़ने से धान की बुवाई पर असर पड़ सकता है। श्रमिकों में संक्रमण गहराने से वे कामकाज के लिए अन्य राज्यों को नहीं जा सकेंगे, इससे पंजाब-हरियाणा जैसे राज्यों में कृषि क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों की कमी हो सकती है। कृषि के सकल उत्पादन पर इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है।

अगर कृषि उत्पादन पर्याप्त मात्रा में नहीं हुआ तो किसानों के हाथ में पैसा कम पहुंचेगा और वे कम खरीदारी करेंगे और इस कारण ग्रामीण क्षेत्रों में मांग में कमी आ सकती है। इसी समय ग्रामीण क्षेत्रों में एफएमसीजी उत्पादों की मांग में कमी आ चुकी है। अगर कोरोना की स्थिति नहीं संभली और शादियों के सीजन पर भी इसका असर पड़ा तो भविष्य में यह असर और अधिक गहरा सकता है।

क्या करना चाहिए

देविंदर शर्मा के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में मांग बनी रहे, इसके लिए ग्रामीण क्षेत्रों में निवेश बढ़ाना होगा। ग्रामीण क्षेत्रों के स्वास्थ्य-शिक्षा और कृषि के क्षेत्रों में किया गया निवेश ग्रामीणों के हाथ में पैसा पहुंचाएगा। इस तरीके से सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में भी मांग में वृद्धि बरकरार रख सकती है।

ज्यादा असर की संभावना नहीं

वहीं, भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता गोपाल कृष्ण अग्रवाल ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में कोरोना होने के कारण इसका अर्थव्यवस्था पर बहुत अधिक असर पड़ने की संभावना नहीं है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी कोरोना के मामलों में कमी आ रही है। इसके आलावा वैक्सीन कार्यक्रम तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है।

अब तक 18 करोड़ लोगों को वैक्सीन दी जा चुकी है, जबकि जुलाई तक 34 करोड़ अन्य लोगों को भी वैक्सीन मिल चुकी होगी। इस प्रकार जुलाई-अगस्त तक देश के 52 करोड़ लोगों को वैक्सीन दी जा चुकी होगी। इसका असर होगा कि लोगों के बीमार पड़ने की संभावना कम हो जाएगी। लोग काम करेंगे और अर्थव्यवस्था चलती रहेगी।

गोपाल कृष्ण अग्रवाल के अनुसार 140 करोड़ आबादी वाले देश में मांग के कारण अर्थव्यवस्था ठप नहीं पड़ सकती। इस दौरान थोड़ी-थोड़ी मांग होने से भी अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल जाती है।

सबसे अहम बात है कि सभी अर्थशास्त्री मानते हैं कि मांग बढ़ाने का सबसे बड़ा माध्यम बाज़ार में तरलता (नकद पैसा) बढ़ाना होता है। लोगों के पास पैसा पहुंचता है तो वे खरीदारी करते हैं और बाज़ार में गति बनी रहती है।

इसी दौरान केंद्र सरकार जनहितकारी योजनाओं में निवेश बढ़ा रही है। रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया ने भी बैंकों और औद्योगिक क्षेत्र की बड़ी-बड़ी कंपनियों के पास ज्यादा नकदी पैसा उपलब्ध रहे, इसकी व्यवस्था की है। इन सभी कारणों से अनुमान है कि अर्थव्यवस्था में गति बनी रहेगी और देश डबल डिजिट के आसपास की बढ़ोतरी हासिल कर लेगा।

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