Budget 2025: पब्लिक सेक्टर की बीमा कंपनियों के अस्तित्व पर क्यों मंडरा रहा खतरा? वित्त मंत्री से लगाई गुहार
डब्ल्यूएफटीयू एपीआरओ ने वित्त मंत्री से इन मुद्दों पर सही परिप्रेक्ष्य में विचार करने, सार्वजनिक क्षेत्र के बीमाकर्ताओं को मजबूत करने और भारत की वित्तीय पारिस्थितिकी तंत्र में उनकी भूमिका को सुरक्षित करने के लिए उचित निर्णय लेने की अपील की है।
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सार्वजनिक क्षेत्र की सामान्य बीमा कंपनियों की ट्रेड यूनियनें और उसके कर्मचारी, मौजूदा स्थिति को लेकर आक्रोशित हैं। वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियंस (डब्ल्यूएफटीयू) के उप महासचिव और एशिया प्रशांत क्षेत्रीय कार्यालय के प्रभारी सी. श्रीकुमार ने केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को एक ज्ञापन सौंपा है। इसमें 8 प्रमुख मांगों का जिक्र किया गया है। उन्होंने बताया कि सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनियों के अस्तित्व पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। श्रीकुमार ने बीमा क्षेत्र में 100 फीसदी एफडीआई का विरोध करते हुए सार्वजनिक क्षेत्र की सामान्य बीमा कंपनियों (पीएसजीआईसी) के सामने आने वाली गंभीर चुनौतियों का समाधान करने का अनुरोध किया है। मौजूदा परिस्थितियां सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के अस्तित्व के लिए एक चुनौती बन गई हैं। जनरल इंश्योरेंस एम्प्लॉइज ऑल इंडिया एसोसिएशन के नेता अमरजीत कौर, बिनॉय विश्वम पूर्व सांसद और त्रिलोक सिंह भी कई बार वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से मुलाकात कर बीमा क्षेत्र के कर्मचारियों की विभिन्न मांगों को लागू करने का आग्रह कर चुके हैं।
डब्ल्यूएफटीयू एपीआरओ ने वित्त मंत्री से इन मुद्दों पर सही परिप्रेक्ष्य में विचार करने, सार्वजनिक क्षेत्र के बीमाकर्ताओं को मजबूत करने और भारत की वित्तीय पारिस्थितिकी तंत्र में उनकी भूमिका को सुरक्षित करने के लिए उचित निर्णय लेने की अपील की है। वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियंस के एशिया प्रशांत क्षेत्रीय कार्यालय द्वारा कहा गया है कि यह क्षेत्र वर्तमान में लंबे समय तक कुप्रबंधन और सरकार द्वारा अपनाई जा रही नीतियों के कारण गंभीर वित्तीय अस्थिरता और संगठनात्मक अक्षमता से ग्रस्त है। बीमा क्षेत्र में एफडीआई बढ़ाने के लिए एक विधेयक लाकर बीमा क्षेत्र को और अधिक उदार बनाने के सरकार के कदम से सार्वजनिक क्षेत्र में बीमा कंपनियों के अस्तित्व पर गंभीर खतरा पैदा हो रहा है। इसके मद्देनजर, बीमा क्षेत्र में सौ प्रतिशत एफडीआई की अनुमति देने के प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया गया है। ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि एफडीआई की सीमा बढ़ाने से बीमा क्षेत्र में उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ है।
पूर्ण विदेशी स्वामित्व की अनुमति देने से सार्वजनिक क्षेत्र के बीमाकर्ता हाशिए पर चले जाएंगे। ग्रामीण और अर्ध-शहरी बाजारों की सेवा में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका कमजोर हो जाएगी। अमूमन इन क्षेत्रों को निजी बीमा कंपनियां अक्सर नजरअंदाज कर देती हैं। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि मौजूदा 74% एफडीआई सीमा में से केवल 32.67% का उपयोग किया गया है। यह पूंजी की सीमित मांग को उजागर करता है। ऐसे मे राष्ट्रहित में इस नीति पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।
श्रीकुमार ने आंतरिक प्रतिस्पर्धा को खत्म करने, अस्वास्थ्यकर मूल्य निर्धारण प्रथाओं को कम करने और शहरी, अर्ध-शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में बाजार में पैठ बढ़ाने के लिए पीएसजीआईसी को एक एकल, मजबूत इकाई में समेकित करने की सलाह दी है। मर्ज की गई संरचना, परिचालन को सुव्यवस्थित करेगी। सेवा वितरण में विस्तार के लिए पूंजी निवेश में सुधार करेगी और दक्षता बढ़ाएगी।
प्रमुख सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करने के मकसद से पीएसजीआईसी के लिए पर्याप्त पूंजी समर्थन महत्वपूर्ण है। इसमें प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना और आयुष्मान भारत योजना शामिल है। सरकार के सामाजिक-आर्थिक उद्देश्यों को पूरा करने और वंचित आबादी तक पहुंच में सुधार के लिए ऐसा निवेश आवश्यक है। सरकार से निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने के लिए सख्त नियामक उपाय लागू करने का आग्रह किया गया है।
बीमा विनियामक और विकास द्वारा जारी दिशानिर्देशों का पालन, भारतीय प्राधिकरण (आईआरडीएआई) पॉलिसीधारकों की सुरक्षा और बाजार को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।हालांकि पूंजी की आवश्यकता को 100 करोड़ रुपये से घटाकर 50 करोड़ रुपये और शुद्ध स्वामित्व वाली निधि की आवश्यकता को 5,000 करोड़ रुपये से घटाकर 1,000 करोड़ रुपये करने से छोटे खिलाड़ी आकर्षित हो सकते हैं, लेकिन इस पर सावधानी से विचार किया जाना चाहिए।
राष्ट्रीयकरण से पहले के युग की याद दिलाने वाली शोषणकारी प्रथाओं के दोबारा उभरने से बचने के लिए सावधानी बरतनी चाहिए। पीएसजीआईसी में अभी भी पेंशन लाभों में एकरूपता का अभाव है। कई परिवारों को अन्य सरकारी क्षेत्रों में प्रदान की जाने वाली 30% की तुलना में केवल 15% पारिवारिक पेंशन मिलती है, जो एक विसंगति पैदा करती है।
श्रीकुमार के अनुसार, अगस्त 2022 से देय वेतन संशोधन जीआईपीएसए, डीएफएस और यहां तक कि वित्त मंत्री के साथ कई चर्चाओं के बावजूद अनसुलझा बना हुआ है। मुख्य श्रम आयुक्त (सीएलसी) के स्पष्ट निर्देशों की भी अनदेखी की गई है। वित्त मंत्री से इस लंबित मुद्दे को निपटाने के लिए तत्काल कार्रवाई का आग्रह किया गया है। पिछले एक दशक में सार्वजनिक क्षेत्र के बीमा विभाग में बड़े पैमाने पर सेवानिवृत्ति और नई भर्ती की कमी के कारण कर्मचारियों की भारी कमी हो गई है। इससे ग्राहक सेवा और बैक-ऑफिस संचालन प्रभावित हुआ है।
सेवा वितरण और परिचालन दक्षता में सुधार के लिए सभी संवर्गों में तत्काल भर्ती आवश्यक है। डब्ल्यूएफटीयू के उप महासचिव और एशिया प्रशांत क्षेत्रीय कार्यालय के प्रभारी ने कहा है कि हमें विश्वास है, वित्त मंत्री आगामी केंद्रीय बजट में उपरोक्त सभी मुद्दों की सही परिप्रेक्ष्य में जांच करेगा। वे सार्वजनिक क्षेत्र के बीमाकर्ताओं को मजबूत करने और भारत की वित्तीय पारिस्थितिकी प्रणाली में उनकी भूमिका को सुरक्षित करने के लिए उचित निर्णय लेंगी।