Artificial Intelligence: किस बला का नाम है ‘चैट जीपीटी’? जिससे निपटना भविष्य के इंसानों के लिए होगी चुनौती
Chat GPT Software: चैट जीपीटी साॅफ्टवेयर को बनाने का श्रेय सैम अल्टमैन नाम के व्यक्ति को जाता है, उन्होंने इसकी शुरुआत वर्ष 2015 में वर्तमान में दुनिया के दूसरे सबसे अमीर शख्स एलन मस्क के साथ मिलकर की थी। उस समय इस प्रोजेक्ट की शुरुआत एक नन प्रॉफिट कंपनी के रूप में की गई थी। आगे चलकर बिल गेट्स की कंपनी माइक्रोसॉफ्ट ने इसमें निवेश किया।
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पिछले दो दशकों से गूगल हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा है। इंटरनेट पर हर छोटी से बड़ी चीज के लिए हमें गूगल पर निर्भर रहना पड़ता है। हम किसी विषय के बारे में अपनी जिज्ञासा गूगल के सामने रखते हैं और वह पलक झपकते ही परिणाम सामने रख देता है। लंबे समय से हम उस पर निर्भर हैं। पर आज हम आपको बताएंगे गूगल से भी एक कदम आगे की चीज के बारे में, जिसकी इन दिनों इंटरनेट व सोशल मीडिया पर खूब चर्चा है। लोग यह भी कयास लगा रहे हैं कि यह तकनीक भी पूर्व की भांति इंसानी नौकरियों पर अपना गाज गिराएगी और एक दिन लोग इसका भी इस्तेमाल करने के आदी हो जाएंगे। आइये जानते हैं वह कौन सी तकनीक है, जो भविष्य में गूगल से भी आगे निकल सकती है?
# Chat GPT का पूरा नाम है जेनेरेटिव प्रीट्रेंड ट्रांसफॉर्मर
बाजार में पिछले कई दिनों से जिस तकनीक की खूब चर्चा है असल में वह एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस साॅफ्टवेयर है। इसका नाम है चैट जीपीटी यानी जेनेरेटिव प्रीट्रेन्ड ट्रांसफॉर्मर (Generative Pretrained Transformer)। इसे एनएमएस (न्यूरल नेटवर्क बेस्ड मशीन लर्निंग मॉडल) का अत्याधुनिक रूप भी माना जाता है। यह साफ्टवेयर ना केवल गूगल की तरह सर्च इंजन का काम करता है बल्कि आपकी किसी भी जिज्ञासा का बिल्कुल साफ, सटीक और तर्कसंगत जवाब मुहैया कराता है वह भी रियल टाइप में। यही कारण है कि यह सॉफ्टवेयर खासा लोकप्रिय हाे रहा है। चैट जीपीटी साॅफ्टवेयर को बनाने का श्रेय सैम अल्टमैन नाम के व्यक्ति को जाता है, उन्होंने इसकी शुरुआत वर्ष 2015 में वर्तमान में दुनिया के दूसरे सबसे अमीर शख्स एलन मस्क के साथ मिलकर की थी। उस समय इस प्रोजेक्ट की शुरुआत एक नन प्रॉफिट कंपनी के रूप में की गई थी। बाद में एलन मस्क इस प्रोजेक्ट से अलग हो गए थे। आगे चलकर बिल गेट्स की कंपनी माइक्रोसॉफ्ट ने इसमें निवेश किया और यह नन प्रॉफिट कंपनी फॉर प्रॉफिट बन गई। फिलहाल इस कंपनी की वैल्यू 20 बिलियन डॉलर है।
# महज एक हफ्ते में ही दस लाख हुए यूजर, ट्विटर व फेसबुक को छोड़ा पीछे
सैम अल्टमैन की मानें तो चैट जीपीटी के एक हफ्ते से भी कम समय में दस लाख यानी एक मिलियन उपयोगकर्ता हो गए हैं। वर्ल्ड स्टेटिस्टिक्स नाम के एक ट्विटर हैंडल के अनुसार नेफ्लिक्स को यह आंकड़ा छूने में करीब साढ़े तीन साल का समय लग गया था। वहीं दस लाख उपभोक्ताओं की उपलब्धि हासिल करने में ट्विटर को दो साल और फेसबुक को 10 महीने लग गए थे। इंस्टाग्राम ने 10 लाख यूजर का आंकड़ा तीन महीने में हासिल किया था जबकि स्पॉटफाई को यह उपलब्धि हासिल करने में पांच महीने का वक्त लगा था।
# शिक्षण संस्थानों और शिक्षकों के पेशे पर बड़ा असर डाल सकता है एआई आधारित चैट जीपीटी
एक समाचारपत्र के संपादकीय में पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश प्रभु और हरियाणा के सोनीपत स्थित ऋषिहुड विश्वविद्यालय के कुलपति शोभित माथुर ने इस चैट जीपीटी के बारे में लिखते हुए कहा है कि एआई चैटबॉट चैट जीपीटी ने इंटरनेट पर चर्चा का विषय बना हुआ है। उन्होंने अपने आलेख में बताया है कि इस एआई आधारित चैट जीपीटी सॉफ्वेयर का चलन आम होने से शिक्षकों के पेशे पर बहुत बड़ा असर पड़ेगा। इसकी चुनौती से निपटने के लिए शिक्षकों को खुद को बदलना पड़ेगा। चैट जीपीटी में प्राकृतिक भाषा को समझने और प्रभावशाली सटीकता और रचनात्मकता के साथ प्राकृतिक भाषाओं में प्रतिक्रिया देने की क्षमता है, अपनी सीमाओं के बावजूद, यह एक ही समय में रोमांचक और डरावना दोनों है।
# मनुष्यों की नकल करने वाली मशीनों का सबसे सटीक प्रदर्शन है चैट जीपीटी
चैट जीपीटी अब तक के इतिहास में मनुष्यों की नकल करने वाली मशीनों का सबसे सटीक प्रदर्शन है, यहां तक कि कुछ मामलों यह मनुष्यों से भी बेहतर है। यह बहुत हद तक डरावनी बात है। इस चैट जीपीटी कई उद्योगों को प्रभावित कर सकता है, और सबसे पहले जिस क्षेत्र के प्रभावित होने की आशंका है वह है शिक्षण का क्षेत्र। इस सॉफ्टवेयर का चलन बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने पर होमवर्क, आलेख लेखन और कोडिंग असेसमेंट जैसी चीजें अप्रासंगिक हो जाएंगी। इस सॉफ्टवेयर की मदद से तैयार आलेख किसी भी प्लेगरिज्म चेकर से चेक किया जाए उसमें समानता नहीं पकड़ पाएगा। इसके साथ ही उपलब्ध संसधनों के आधार पर यह कोडिंग करने, उनका विवरण तैयार करने और डिबगिंग करने में सक्षम होगा। ऐसे में इतना तय है कि वर्तमान समय के शिक्षकों को इस चैट जीपीटी से खुद को बेहतर साबत करने के लिए खुद को नए सिरे से इनोवेट करना पड़ेगा।
चैट जीपीटी के सामान्य चलन में आने के बाद वे खुद किसी क्लासरूम के विशेषज्ञ नहीं रह जाएंगे। अब तक उनके सामने सिर्फ गूगल की चुनौती थी, जो सटीक नहीं थी। अब इस नए सॉफ्टवेयर के चलन में आने के बाद उनके सामने एक ऐसा प्रतिद्वंदी होगा जो कई मामलों में उनसे भी सटीक होगा। ऐसे में भविष्य में यह एक बड़ा सवाल होगा कि यदि बच्चे एआई चैट जीपीटी के माध्यम से ही पढ़ाई कर लेंगे तो फिर शिक्षकों का क्या औचित्य रह जाएगा? ऐसे में शिक्षकों के लिए यह चुनौती होगी कि वे भविष्य में ना केवल बच्चों को पढ़ाई करवाएं बल्कि उन्हें पढ़ने का उद्देश्य भी बताएं। साथ ही उन्हें यह भी बताएं कि इस पढ़ाई का महत्व क्या है और इसे कैसे करना है? इसका मतलब है कि उन्हें खुद को मेटा टीचर्स के रूप में बदलना होगा। इसके लिए समुचित प्रशिक्षण की आवश्यकता होगी। चैट जीपीटी जैसे सॉफ्टवेयर्स के चलन में आने से मशीनों को प्रशिक्षित करने और उन्हें बेहतर करने के काम की प्रकृति भी बदलेगी। ऐसे स्थिति में कंपनियों की प्रतिस्पर्धी खूबियां गौण हो जाएंगी। इससे रोजगार का तरीका बदलेगा और नई नौकरियों का सृजन होगा।