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आज का साक्षात्कार: 45 लाख आदिवासियों को उद्यमी बनाने की तैयारी

Mon, 09 Sep 2019 06:16 AM IST
संदीप भट्ट बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: संदीप भट्ट Updated Mon, 09 Sep 2019 06:16 AM IST
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45 lakh tribals will become entrepreneurs Pravir Krishna Managing Director TRIFED
ट्राइफेड के प्रबंध निदेशक प्रवीर कृष्णा
प्रधानमंत्री वन धन योजना के तहत सरकार आदिवासियों को उद्यमी बनाने की तैयारी में है। इसके तहत केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय चालू वित्त वर्ष में देशभर में 3,000 वन धन विकास केंद्र स्थापित करेगा। मंत्रालय ने इन केंद्रों को स्थापित करने की जिम्मेदारी ट्राइबल कोऑपरेटिव मार्केटिंग डेवलपमेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (ट्राइफेड) को सौंपी है। आधुनिक शिक्षा प्रणाली से वंचित रहने वाले वनवासी कैसे उद्यमी बनेंगे, इस पर शिशिर चौरसिया  ने ट्राइफेड के प्रबंध निदेशक प्रवीर कृष्णा से बातचीत की। पेश है अंश :
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आजादी के सात दशक बाद भी आदिवासी समुदाय मजदूरी में ही लगा है। वे आगे कैसे बढ़ेंगे?  

देखिए... पारंपरिक बंधन को काटना बड़ा मुश्किल होता है। लेकिन सरकार ने आदिवासियों में उद्यमशीलता को बढ़ावा देने का फैसला किया है तो ऐसा जरूर होगा। हम उनके जीवन यापन के तरीके को ही इंटरप्रेन्योरशिप में बदलना चाहते हैं। इसका फर्क देखिए... यदि कोई मजदूरी करता है तो एक दिन में उसे अधिकतम 400 रुपये मिलेंगे जबकि वह अपने कौशल का उपयोग मजदूरी के बदले साहसी बनने में करे और अपना कारोबार खड़ा करे तो वह एक दिन में 4,000 रुपये भी आसानी से कमा सकेगा। यही तो उन्हें समझाना है। उनकी मदद के लिए सरकार ने पहले से ही वन अधिकार कानून में इमारती लकड़ी और कुछ खास उत्पादों को छोड़कर शेष उत्पादों का मालिकाना हक  वनवासियों को दे दिया है। वे जहां रह रहे हैं, उस जमीन के मालिक तो वे ही हैं। इससे बिचौलिये और ठेकेदारों से मुक्ति मिलेगी। अभी तक तो वे बिचौलिये या ठेकेदारों के भरोसे हैं, जो उनकी आमदनी का 70 फीसदी हिस्सा खुद हड़प लेते हैं।
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सरकार चाहती है कि जंगलों में निवास करने वाले वनवासी भी उद्यमी बने। इसके लिए क्या योजना है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक परिवर्तनकारी पहल के तहत जनजातीय समुदाय के लिए अतिरिक्त आमदनी के महत्व पर जोर दिया है। मुझे याद है कि इस योजना की शुरुआत करते वक्त प्रधानमंत्री ने कहा था कि वन-धन, जन-धन और गोबर-धन योजनाओं में जनजातीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बदलने की क्षमता है। इसके लिए राज्यों को क्रमबद्ध तरीके से तीनों ही योजनाओं को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। इसके तहत सबसे पहले छत्तीसगढ़ के बीजापुर में पहला वन-धन विकास केंद्र स्थापित किया गया था। हालांकि, इस योजना पर राज्यों ने उतना ध्यान नहीं दिया, जितना अपेक्षित था। हमने इस दिशा में तेजी से काम शुरू कर दिया है। इसके तहत इसी साल 3,000 केंद्र खोले जाएंगे और भविष्य में ऐसे 50,000 केंद्र खोले जाने हैं। हर साल नौ लाख वनवासियों (आदिवासियों) को उद्यमी बनाया जाएगा यानी पांच साल में 45 लाख आदिवासी उद्यमी बनेंगे।
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वनवासी आधुनिक शिक्षा से बहुत दूर हैं। उनके पास पूंजी भी नहीं है। ऐसे में उद्यम कैसे खड़ा हो पाएगा?

आपने सही कहा... उनमें आधुनिक शिक्षा की कमी है। पूंजी का अभाव है। इसलिए तय किया गया है कि वन-धन विकास केंद्र में शुरुआती 15 लाख रुपये की पूंजी दी जाएगी। इससे वहां ढांचागत संरचना बनेगी और कुछ जरूरी मशीनरी आएगी। इसके बाद हमने नियम बनाया है कि उस केंद्र से जुड़ने वाले स्वयं सहायता समूह को पांच लाख रुपये की कार्यशील पूंजी का इंतजाम करना होगा। इसके लिए उन्हें विभिन्न सरकारी योजनाओं की मदद मिलेगी। अनिवार्य रूप से पांच लाख रुपये की कार्यशील पूंजी का इंतजाम इसलिए करने को कहा गया है ताकि उन्हें इस बात का एहसास रहे कि उद्यम उन्हीं के पैसे से चल रहा है, इसलिए उसे बेहतर तरीके से चलाना है।

वनवासियों के पास उद्यम चलाने लायक कौशल है?

वनवासियों में कौशल तो खूब है, लेकिन उनके पास मार्केटिंग और पैकेजिंग आदि का ज्ञान नहीं है। इस कमी को दूर करने के लिए वन-धन योजना से जुड़ने वाले सभी स्वयं सहायता समूह के सदस्यों को उनके गांव में ही मार्केटिंग, क्वालिटी कंट्रोल और पैकेजिंग आदि का प्रशिक्षण दिया जाएगा। उन केंद्रों में बने सामानों की बिक्री सिर्फ वहीं नहीं होगी बल्कि उन्हें देश-विदेश में बेचा जाएगा। ऐसे केंद्रों में बनने वाले सामानों की एक पूरी प्रक्रिया तय की गई है। सामान की गुणवत्ता के लिए मानक बनाए गए हैं, जिन पर खरा उतरने वाले ही आगे काम जारी रख सकेंगे।

वनवासियों के पास मार्केटिंग तंत्र नहीं है, ऐसे में वे सामान कहां बेचेंगे?

वनवासियों के बनाए सामानों को बेचने की जिम्मेदारी ट्राइफेड ने ली है। ट्राइफेड के देशभर में 106 आउटलेट हैं। इसके अलावा हमने हाल ही में अमेरिकी ई-कॉमर्स कंपनी अमेजन डॉट कॉम से करार किया है ताकि उनके सामान सिर्फ देश में ही नहीं बल्कि दुनियाभर के 190 देशों में बिक सकें। देश में सभी इलाकों तक उनके सामानों की पहुंच बनाने के लिए अमेजन के अलावा फ्लिपकार्ट जैसी अन्य ई-कामर्स कंपनियों से करार किया गया है। वनवासियों के बनाए सभी उत्पाद ‘ट्राइफेड डॉट इन’ पर भी उपलब्ध होंगे।


आदिवासियों को उद्यमी बनाने के लिए 3,000 वन धन विकास केंद्र खोले जाएंगे। उन्हें मार्केटिंग और पैकेजिंग का प्रशिक्षण दिया जाएगा।प्रवीर कृष्णा, प्रबंधन निदेशक, ट्राइफेड

 
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