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चीनी के बाद दाल बिगाड़ेगी रसोई का बजट?: आयात घटा, बुवाई भी रही कम; त्योहार से पहले मंडरा रहा महंगाई का संकट

Fri, 21 Aug 2026 06:46 AM IST
हिमांशु सिंह चंदेल बोनस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बोनस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Fri, 21 Aug 2026 06:46 AM IST
सार

देश में दालों के आयात में कमी और खरीफ सीजन में बुवाई का रकबा घटने से आने वाले दिनों में कीमतों पर दबाव बढ़ने की आशंका है। अल-नीनो के कारण पैदावार प्रभावित होने की चिंता भी है। हालांकि सरकार ने करीब 30 लाख टन दालों का बफर स्टॉक तैयार किया है। ऐसे में सवाल है कि क्या यह भंडार त्योहारी सीजन में दालों की महंगाई रोकने के लिए पर्याप्त होगा? आइए, सबकु विस्तार से जानते हैं...

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Pulses Price Hike: Will Falling Imports and Sowing Push Up Dal Prices Before Festive Season?
त्योहार से पहले महंगाई पर सरकार कितनी तैयार? - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

चीनी की बढ़ती कीमतों की चर्चा खत्म भी नहीं हो पाई थी कि अब दाल के दाम पर बात शुरू हो गई। भारत में दालों की कीमतों को लेकर चिंता बढ़ रही है। घरेलू उत्पादन में संभावित कमी और आयात घटने से बाजार में आपूर्ति पर दबाव पड़ सकता है। 2026 के पहले छह महीनों में देश में दालों का आयात 31.80 लाख टन रहा, जो पिछले साल की इसी अवधि के 32.27 लाख टन से 1.46 फीसदी कम है। इसके साथ ही खरीफ सीजन में दालों की बुवाई का रकबा भी पिछले साल से कम है। अगर उत्पादन भी प्रभावित हुआ तो त्योहारी सीजन में दालों की कीमत बढ़ सकती है।
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दालों के आयात में कितनी कमी आई है?

जनवरी से जून 2026 के दौरान तुअर का आयात 5.05 लाख टन रहा। भारत को तुअर की बड़ी आपूर्ति अफ्रीकी देशों से मिली। मोजाम्बिक ने 1.83 लाख टन से अधिक तुअर भेजकर सबसे ज्यादा आपूर्ति की। इसके बाद म्यांमार से 1.23 लाख टन, तंजानिया से 1.01 लाख टन और सूडान से 49,049 टन दाल आई। कुल आयात में मामूली कमी है, लेकिन घरेलू उत्पादन पर मौसम का असर पड़ा तो आयात की कम मात्रा बाजार के लिए चिंता बढ़ा सकती है।
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क्या दालों की बुवाई का रकबा भी घटा है?

  • कृषि मंत्रालय के अनुसार 14 अगस्त तक देश में 108.14 लाख हेक्टेयर में दलहन फसलों की बुवाई हुई है। 
  • पिछले साल इसी समय यह आंकड़ा 108.49 लाख हेक्टेयर था। यानी इस साल रकबा करीब 35 हजार हेक्टेयर कम है। 
  • अरहर की बुवाई 40.31 लाख हेक्टेयर में हुई है, जो पिछले साल के 42.01 लाख हेक्टेयर से 1.69 लाख हेक्टेयर कम है। 
  • मूंग का रकबा भी 32.05 लाख हेक्टेयर है, जो पिछले साल से 1.37 लाख हेक्टेयर कम है। 
  • अन्य दालों का रकबा 3.14 लाख हेक्टेयर रहा, जो 27 हजार हेक्टेयर कम है।

अल-नीनो से पैदावार पर क्यों बढ़ी चिंता?

दालों की बुवाई का रकबा भले ही करीब 108 लाख हेक्टेयर है, लेकिन अब चिंता फसल की पैदावार को लेकर है। दालों की फसल को बीच के चरण में अच्छी बारिश की जरूरत होती है। अगस्त के अंत से सितंबर के बीच अल-नीनो के मजबूत होने के संकेत बताए गए हैं। इससे बारिश का पैटर्न प्रभावित हो सकता है और प्रति हेक्टेयर पैदावार पर असर पड़ सकता है। निजी मौसम एजेंसी ने 70 फीसदी सूखे की आशंका जताई है। अगर मौसम खराब रहा तो कम रकबा और कम उत्पादकता दोनों मिलकर दालों की उपलब्धता घटा सकते हैं।
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सरकार के पास महंगाई रोकने के लिए क्या तैयारी है?

  • सरकार का कहना है कि फिलहाल घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि उसके पास पर्याप्त बफर स्टॉक मौजूद है। 

  • सरकार ने करीब 30 लाख टन दालों का भंडार तैयार किया है। 
  • इसमें अरहर, उड़द, मूंग, चना और मसूर शामिल हैं। सरकार बाजार की कीमतों पर लगातार नजर रख रही है। 
  • अगर किसी दाल की कीमत में असामान्य तेजी आती है तो बफर स्टॉक से योजनाबद्ध तरीके से दाल बाजार में उतारी जाएगी। 
  • इससे त्योहारी सीजन में अचानक आपूर्ति की कमी को रोकने की कोशिश होगी।

क्या त्योहारी सीजन में दालों की कीमत पर नजर रखना जरूरी है?

देश में हर साल कुल दलहन उत्पादन करीब 256.83 लाख टन होता है। इसमें चना दाल की हिस्सेदारी करीब 40 फीसदी है। अरहर की हिस्सेदारी 15 से 20 फीसदी, जबकि उड़द और मूंग की हिस्सेदारी करीब 8 से 10 फीसदी है। इस साल आयात में कमी, कुछ प्रमुख दालों के घटते रकबे और मौसम की चिंता एक साथ सामने आई है। हालांकि सरकारी बफर स्टॉक कीमतों को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि फसल आने तक उत्पादन कितना रहता है और त्योहारी मांग बढ़ने पर बाजार में दालों की उपलब्धता कैसी रहती है।
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