क्या हुआ चीन के साथ, जिससे मचा हाहाकार
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दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के तौर पर शुमार चीनी अर्थव्यवस्था इस वक्त मंदी से और घटते निर्यात से जूझ रही है। वैश्विक निवेशकों का उसपर से भरोसा उठ रहा है और वह स्थिति संभालने में नाकाम सी प्रतीत हो रही है। इसलिए उसने अपनी मुद्रा युआन का दो फीसदी अवमूल्यन कर दिया। इसके बाद स्थिति और खराब हो गयी।
चीन और दुनिया भर के शेयर बाजार में गिरावट ने भूचाल ला दिया। चीन में आर्थिक सुस्ती और उसकी मुद्रा के अवमूल्यन ने न सिर्फ करेंसी वार छेड़ दिया है बल्कि निर्यातकों को भी डरा दिया है। युआन का अवमूल्यन होने से निर्यातकों को सस्ते निर्यात का सामना करना होगा।
दुनिया भर के शेयर बाजारों में तेज गिरावट आई क्योंकि निवेशकों को डर है कि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में उभरते संकट का सबसे बुरा दौर आना बाकी है।
चीन द्वारा पेंशन फंड को शेयर बाजार में निवेश करने की अनुमति देने से भी निवेशकों पर खास असर नहीं पड़ा। चीन में शंघाई कंपोजिट इंडेक्स 8.5 फीसदी तक गिर गया। 2007 के बाद से यह सबसे खराब क्लोजिंग थी। पिछले सप्ताह शंघाई इंडेक्स 12 फीसदी तक गिरा है। जून के मध्य से इसमें 30 फीसदी तक गिरावट आई है।
छोटे निवेशकों को बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ है। इससे कम्युनिस्ट पार्टी की उस योजना को धक्का लग सकता है, जिसके तहत स्टेट इंडस्ट्री के सुधार के लिए बाजार से पैसा जुटाने की बात की जा रही है। यह गिरावट ऐसे समय में आई है जब निर्यात, मैन्यूफैक्चरिंग और चीन की दूसरी इंडस्ट्री कमजोर हो रही है।
चीन में तेल की मांग घटने और इस्राइल द्वारा वैश्विक बाजार में आपूर्ति बढ़ाए जाने से ब्रेंट क्रूड के अलावा अमेरिकी क्रूड के वायदा भाव मार्च 2009 के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए। ब्रेंट क्रूड 45 डॉलर प्रति बैरल और अमेरिकी क्रूड का अक्तूबर वायदा 40 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था।
मुद्रा का अवमूल्यन कर सकते हैं अन्य देश
जब से चाइना सेंट्रल बैंक ने युआन का अवमूल्यन किया है डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत में लगातार गिरावट आई है। रुपये की कीमत में गिरावट का सिलसिला इतना तेज रहा है कि सोमवार को जब शेयर बाजार में कोहराम मचा रुपया 66.76 रुपये प्रति डॉलर के स्तर पर पहुंच गया।
अगर युआन डॉलर की तुलना में रुपये से ज्यादा कमजोर होता है तो इस बात का खतरा है कि चीन की वस्तुएं भारत में डंप की जाएंगी या लागत से कम कीमत पर बेची जाएंगी।
2014-15 में पिछले वर्ष की तुलना में चीन से आयात बढ़कर 60 अरब डॉलर तक पहुंच गया है, वहीं चीन को हमारा निर्यात गिरकर 12 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। इससे दोनों देशों के बीच बड़े पैमाने पर व्यापार असंतुलन पैदा हो गया है, जो गंभीर चिंता की बात है।
विशेषज्ञों का मानना है कि युआन का अवमूल्यन व्यापार संतुलन और ज्यादा चीन के पक्ष में झुका देगा। ऐसी चिंताएं भी हैं कि चीन के इस कदम से दूसरे देशों के केंद्रीय बैंक अपने निर्यातकों की मदद करने के लिए अपनी मुद्रा का अवमूल्यन कर सकते हैं।
रुपए में गिरावट से आप की जेब पर असर
वास्तव में रुपये में गिरावट का मतलब है कि कच्चे तेल का आयात महंगा हो जाएगा। उपभोक्ताओं को पेट्रोप पंप पर ज्यादा खर्च करना होगा क्योंकि भारत अपनी तेल जरूरतों का 80 फीसदी तक आयात करता है।
कमजोर रुपये का मतलब है कि हमारा आयात बिल उतना कम नहीं होगा जितना ऐतिहासिक तौर पर तेल कीमतों में गिरावट की वजह से होना चाहिए। इसी तरह से उम्मीद है कि कंप्यूटर, आयातित मोबाइल फोन ओर सोना महंगा हो सकता है। कमजोर रुपये का मतलब है कि आपको विदेशी शिक्षा के लिए डॉलर खरीदने के लिए ज्यादा भुगतान करना होगा।
इसी तरह से अगर आप विदेश में छुट्टियों की योजना बना रहे हैं तो आपके लिए बेहतर है कि आप इसके लिए ज्यादा पैसे की व्यवस्था कर लें। आपको एअर टिकट, होटल का किराया, शॉपिंग के लिए ज्यादा कीमत चुकाना होगा।