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आरबीआई पर लागू हुआ सेक्शन 7 तो कितना बढ़ेगा टकराव
बीबीसी हिंदी
Updated Wed, 31 Oct 2018 05:30 PM IST
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उर्जित पटेल
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केंद्र की मोदी सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक के बीच कड़वाहट और नीतिगत मतभेद बढ़ता ही जा रहा है। इस बढ़ते मतभेद और कड़वाहट के बीच आरबीआई ऐक्ट के सेक्शन-7 की चर्चा गर्म है। कई मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक केंद्र सरकार आरबीआई ऐक्ट के सेक्शन-7 लागू करने पर विचार कर रही है।
ये पहली बार है जब आजाद भारत की किसी सरकार में आरबीआई के खिलाफ सेक्शन-7 लागू करने पर चर्चा हो रही है। सोशल मीडिया पर भी इसकी खासी चर्चा है और ट्विटर पर RBI Act ट्रेंड कर रहा है। वित्त मंत्रालय ने इस बात की पुष्टि की है कि उसने हालिया कुछ हफ्तों में सेक्शन-7 के प्रावधानों का इस्तेमाल करते हुए रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल को कई चिट्ठियां भेजी थीं।
इन चिट्ठियों में नकदी प्रवाह से लेकर एनपीए (नॉन परफॉर्मिंग ऐसेट्स), नॉन-बैंक फाइनैंस कंपनियों और पूंजी की जरूरत जैसे तमाम मुद्दों की चर्चा की गई थी।
ऐसे में अहम सवाल ये है कि आरबीआई ऐक्ट का सेक्शन-7 आखिर है क्या?
-वैसे तो रिजर्व बैंक अपने आप में एक स्वायत्त निकाय है और सरकार से अलग अपने फैसले लेने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन कुछ तय स्थितियों में इसे सरकार के निर्देश सुनने पड़ते हैं।
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-आरबीआई ऐक्ट का सेक्शन-7 सरकार को यह अधिकार देता है कि वो रिजर्व बैंक को निर्देश जारी कर सके।
-सेक्शन-7 कहता है कि केंद्र सरकार समय-समय पर जनता के हित को ध्यान में रखते हुए और ऱिजर्व बैंक के गवर्नर से बात करके उसे निर्देश जारी कर सकती है।
-सेक्शन-7 लागू होने के बाद बैंक के कारोबार से जुड़े फैसले आरबीआई गवर्नर के बजाय रिजर्व बैंक के 'बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स' लेंगे। यानी आसान शब्दों में कहें तो सेक्शन-7 कहीं न कहीं आरबीआई गवर्नर के अधिकारों को कमजोर करता है।
-गवर्नर और उसके द्वारा नामित डेप्युटी गवर्नर की ग़ैरमौजूदगी में भी 'सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स' के पास सरकार के दिए निर्देशों का पालन करने का अधिकार होगा। यानी 'बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स' वो सारे फैसले लेने के लिए स्वतंत्र होगा जो सामान्य तौर पर रिजर्व बैंक लेता है।
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ये पहली बार है जब आजाद भारत की किसी सरकार में आरबीआई के खिलाफ सेक्शन-7 लागू करने पर चर्चा हो रही है। सोशल मीडिया पर भी इसकी खासी चर्चा है और ट्विटर पर RBI Act ट्रेंड कर रहा है। वित्त मंत्रालय ने इस बात की पुष्टि की है कि उसने हालिया कुछ हफ्तों में सेक्शन-7 के प्रावधानों का इस्तेमाल करते हुए रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल को कई चिट्ठियां भेजी थीं।
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इन चिट्ठियों में नकदी प्रवाह से लेकर एनपीए (नॉन परफॉर्मिंग ऐसेट्स), नॉन-बैंक फाइनैंस कंपनियों और पूंजी की जरूरत जैसे तमाम मुद्दों की चर्चा की गई थी।
ऐसे में अहम सवाल ये है कि आरबीआई ऐक्ट का सेक्शन-7 आखिर है क्या?
-वैसे तो रिजर्व बैंक अपने आप में एक स्वायत्त निकाय है और सरकार से अलग अपने फैसले लेने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन कुछ तय स्थितियों में इसे सरकार के निर्देश सुनने पड़ते हैं।
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-आरबीआई ऐक्ट का सेक्शन-7 सरकार को यह अधिकार देता है कि वो रिजर्व बैंक को निर्देश जारी कर सके।
-सेक्शन-7 कहता है कि केंद्र सरकार समय-समय पर जनता के हित को ध्यान में रखते हुए और ऱिजर्व बैंक के गवर्नर से बात करके उसे निर्देश जारी कर सकती है।
-सेक्शन-7 लागू होने के बाद बैंक के कारोबार से जुड़े फैसले आरबीआई गवर्नर के बजाय रिजर्व बैंक के 'बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स' लेंगे। यानी आसान शब्दों में कहें तो सेक्शन-7 कहीं न कहीं आरबीआई गवर्नर के अधिकारों को कमजोर करता है।
-गवर्नर और उसके द्वारा नामित डेप्युटी गवर्नर की ग़ैरमौजूदगी में भी 'सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स' के पास सरकार के दिए निर्देशों का पालन करने का अधिकार होगा। यानी 'बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स' वो सारे फैसले लेने के लिए स्वतंत्र होगा जो सामान्य तौर पर रिजर्व बैंक लेता है।
नोटबंदी पर उर्जित पटेल ने तोड़ी चुप्पी
- फोटो : self
वित्त मंत्रालय की सफाई
इस बीच वित्त मंत्रालय ने एक बयान जारी करके कहा है कि आरबीआई की स्वायत्तता आरबीआई ऐक्ट के प्रारूप से ही तय होगी। मंत्रालय ने कहा कि ये स्वायत्तता जरूरी है और सरकार इसे स्वीकार भी करेगी। पिछले हफ्ते आरबीआई के डेप्युटी गवर्नर विरल आचार्य ने कहा था कि आरबीआई की स्वायत्तता पर चोट की गई तो यह विनाशकारी होगा। कई विश्लेषकों का कहना है कि अगले साल चुनाव को देखते हुए सरकार का आरबीआई पर दबाव है कि वो नीतियों को लेकर उदारता दिखाए।
वित्त मंत्री अरुण जेटली आरबीआई पर यह आरोप लगा चुके हैं कि केंद्रीय बैंक 2008 से 2014 के बीच बैंकों को मनमानी क़र्ज देने से रोकने में नाकाम रहा है और इसी वजह से बैंकों के एनपीए बढ़कर 150 अरब डॉलर हो गए।
प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) की ओर से भी एक बयान जारी करके कहा गया है कि सरकार जनहित में रिजर्व बैंक के साथ तमाम मुद्दों पर विस्तार से चर्चा कर रही है। आरबीआई और सरकार में जारी टकराव के बीच मंगलवार को भारतीय मुद्रा रुपए में 43 पैसे की गिरावट आई और 74।11 तक पहुंच गया।
समाचार एजेंसी पीटीआई का कहना है कि अमरीकी डॉलर की मांग लगातार बढ़ रही है इसलिए रुपया दबाव में है। कहा जा रहा है कि सरकार और आरबीआई में कलह का असर निवेशकों पर भी पड़ रहा है।
क्या है कलह की जड़?
कहा जा रहा है कि आरबीआई और सरकार के बीच संबंधों में कड़वाह महीनों से थी, लेकिन हाल के दिनों में अर्थव्यवस्था में आई मंदी के कारण कलह सतह पर आ गई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमत, कमजोर होता रुपया और बैंकिंग सेक्टर में बेशुमार बढ़ते एनपीए के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था चौतरफा घिरी हुई है।
पिछले हफ्ते शुक्रवार को आरबीआई के डेप्युटी गवर्नर विरल आचार्य ने अपने भाषण में अर्जेंटीना के 2010 के आर्थिक संकट का जिक्र करते हुए चेताया था। कहा जा रहा है कि विरल काफी ग़ुस्से में थे और उनका भाषण दर्शकों को हैरान करने वाला था।
अर्जेंटीना के केंद्रीय बैंक के गवर्नर को जमा पूंजी सरकार को देने के लिए मजबूर किया गया था। अर्जेंटीना को डिफॉल्टर तक होना पड़ा था। विरल आचार्य ने कहा कि अर्जेंटीना को सरकार के हस्तक्षेप की भारी कीमत चुकानी पड़ी थी।
आचार्य ने कहा था, ''जो सरकारें केंद्रीय बैंकों की स्वतंत्रता का सम्मान नहीं करती हैं वहां के बाजार तत्काल या बाद में भारी संकट में फंस जाते हैं। अर्थव्यवस्था सुलगने लगती है और अहम संस्थाओं की भूमिका खोखली हो जाती है।''
अर्जेंटीना में 2010 में ठीक ऐसा ही हुआ था। विरल आचार्य न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में फाइनैंस के प्रोफेसर थे। विरल का कहना है कि उनका भाषण गवर्नर उर्जित पटेल की सहमति से था क्योंकि उन्होंने ही स्वयत्तता को लेकर अपनी बात कहने की वकालत की थी।
इस बीच वित्त मंत्रालय ने एक बयान जारी करके कहा है कि आरबीआई की स्वायत्तता आरबीआई ऐक्ट के प्रारूप से ही तय होगी। मंत्रालय ने कहा कि ये स्वायत्तता जरूरी है और सरकार इसे स्वीकार भी करेगी। पिछले हफ्ते आरबीआई के डेप्युटी गवर्नर विरल आचार्य ने कहा था कि आरबीआई की स्वायत्तता पर चोट की गई तो यह विनाशकारी होगा। कई विश्लेषकों का कहना है कि अगले साल चुनाव को देखते हुए सरकार का आरबीआई पर दबाव है कि वो नीतियों को लेकर उदारता दिखाए।
वित्त मंत्री अरुण जेटली आरबीआई पर यह आरोप लगा चुके हैं कि केंद्रीय बैंक 2008 से 2014 के बीच बैंकों को मनमानी क़र्ज देने से रोकने में नाकाम रहा है और इसी वजह से बैंकों के एनपीए बढ़कर 150 अरब डॉलर हो गए।
प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) की ओर से भी एक बयान जारी करके कहा गया है कि सरकार जनहित में रिजर्व बैंक के साथ तमाम मुद्दों पर विस्तार से चर्चा कर रही है। आरबीआई और सरकार में जारी टकराव के बीच मंगलवार को भारतीय मुद्रा रुपए में 43 पैसे की गिरावट आई और 74।11 तक पहुंच गया।
समाचार एजेंसी पीटीआई का कहना है कि अमरीकी डॉलर की मांग लगातार बढ़ रही है इसलिए रुपया दबाव में है। कहा जा रहा है कि सरकार और आरबीआई में कलह का असर निवेशकों पर भी पड़ रहा है।
क्या है कलह की जड़?
कहा जा रहा है कि आरबीआई और सरकार के बीच संबंधों में कड़वाह महीनों से थी, लेकिन हाल के दिनों में अर्थव्यवस्था में आई मंदी के कारण कलह सतह पर आ गई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमत, कमजोर होता रुपया और बैंकिंग सेक्टर में बेशुमार बढ़ते एनपीए के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था चौतरफा घिरी हुई है।
पिछले हफ्ते शुक्रवार को आरबीआई के डेप्युटी गवर्नर विरल आचार्य ने अपने भाषण में अर्जेंटीना के 2010 के आर्थिक संकट का जिक्र करते हुए चेताया था। कहा जा रहा है कि विरल काफी ग़ुस्से में थे और उनका भाषण दर्शकों को हैरान करने वाला था।
अर्जेंटीना के केंद्रीय बैंक के गवर्नर को जमा पूंजी सरकार को देने के लिए मजबूर किया गया था। अर्जेंटीना को डिफॉल्टर तक होना पड़ा था। विरल आचार्य ने कहा कि अर्जेंटीना को सरकार के हस्तक्षेप की भारी कीमत चुकानी पड़ी थी।
आचार्य ने कहा था, ''जो सरकारें केंद्रीय बैंकों की स्वतंत्रता का सम्मान नहीं करती हैं वहां के बाजार तत्काल या बाद में भारी संकट में फंस जाते हैं। अर्थव्यवस्था सुलगने लगती है और अहम संस्थाओं की भूमिका खोखली हो जाती है।''
अर्जेंटीना में 2010 में ठीक ऐसा ही हुआ था। विरल आचार्य न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में फाइनैंस के प्रोफेसर थे। विरल का कहना है कि उनका भाषण गवर्नर उर्जित पटेल की सहमति से था क्योंकि उन्होंने ही स्वयत्तता को लेकर अपनी बात कहने की वकालत की थी।
आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल (फाइल फोटो)
सरकार की आलोचना
इन तमाम विवादों और खबरों के बीच सरकार की आलोचनाओं का दौर जारी है। पूर्व वित्त मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी। चिदंबरम ने ट्वीट करके कहा, "जैसा कि रिपोर्टों से पता चल रहा है, सरकार ने आरबीआई ऐक्ट के सेक्शन-7 लागू करके रिजर्व बैंक को ऐसे 'निर्देश' दिए हैं जो पहले कभी नहीं दिए गए। मुझे डर है कि आज और भी बुरी खबरें सुनने को मिलेंगी।"
चिंदबरम ने लिखा, "हमने 1991, 2008 और 2013 में भी सेक्शन-7 लागू नहीं किया। मौजूदा वक्त में इसे लागू किए जाने की क्या जरूरत है। इससे पता चलता है कि सरकार अर्थव्यवस्था के बारे में तथ्यों को छिपा रही है और इसके लिए बुरी तरह हाथ-पैर मार रही है।" तनावपूर्ण हालात के बीच रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल के इस्तीफे की आशंकाएं भी हैं।
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक अगर स्थिति नियंत्रण में न रही तो उर्जित पटेल आरबीआई गवर्नर पद से इस्तीफा भी दे सकते हैं।
आरबीआई के गवर्नर उर्जित पटेल और वित्त मंत्रालय के बीच पत्राचार भी हुए हैं। सरकार ने पटेल से पूछा है कि आर्थिक तंगी से जूझ रही सरकारी कंपनियों और मार्केट में नक़दी की कमी को लेकर उनकी क्या राय है।
ब्लूमबर्ग का कहना है कि सरकार जनहित का हवाला दे आरबीआई पर सेक्शन-7 लगा सकती है। हालांकि इस बात को लेकर भी विवाद है कि जिस सेक्शन को कभी लागू नहीं किया गया उसे लागू करने का तरीका क्या होगा।
इन तमाम विवादों और खबरों के बीच सरकार की आलोचनाओं का दौर जारी है। पूर्व वित्त मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी। चिदंबरम ने ट्वीट करके कहा, "जैसा कि रिपोर्टों से पता चल रहा है, सरकार ने आरबीआई ऐक्ट के सेक्शन-7 लागू करके रिजर्व बैंक को ऐसे 'निर्देश' दिए हैं जो पहले कभी नहीं दिए गए। मुझे डर है कि आज और भी बुरी खबरें सुनने को मिलेंगी।"
चिंदबरम ने लिखा, "हमने 1991, 2008 और 2013 में भी सेक्शन-7 लागू नहीं किया। मौजूदा वक्त में इसे लागू किए जाने की क्या जरूरत है। इससे पता चलता है कि सरकार अर्थव्यवस्था के बारे में तथ्यों को छिपा रही है और इसके लिए बुरी तरह हाथ-पैर मार रही है।" तनावपूर्ण हालात के बीच रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल के इस्तीफे की आशंकाएं भी हैं।
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक अगर स्थिति नियंत्रण में न रही तो उर्जित पटेल आरबीआई गवर्नर पद से इस्तीफा भी दे सकते हैं।
आरबीआई के गवर्नर उर्जित पटेल और वित्त मंत्रालय के बीच पत्राचार भी हुए हैं। सरकार ने पटेल से पूछा है कि आर्थिक तंगी से जूझ रही सरकारी कंपनियों और मार्केट में नक़दी की कमी को लेकर उनकी क्या राय है।
ब्लूमबर्ग का कहना है कि सरकार जनहित का हवाला दे आरबीआई पर सेक्शन-7 लगा सकती है। हालांकि इस बात को लेकर भी विवाद है कि जिस सेक्शन को कभी लागू नहीं किया गया उसे लागू करने का तरीका क्या होगा।