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नकदी संकट पर RBI की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवाल, अपना रहा है कैजुअल अप्रोच

Sat, 21 Apr 2018 10:47 AM IST
शिशिर चौरसिया, अमर उजाला, नई दिल्ली
शिशिर चौरसिया, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sat, 21 Apr 2018 10:47 AM IST
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rbi assumed casual approach to deal with cash crunch problem
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नोटबंदी के डेढ़ साल बाद भी देश के कुछ स्थानों पर एक बार फिर से नोट तंगी के जो हालात बने, उसके लिए रिजर्व बैंक के आकलन की योग्यता पर सवाल उठने लगा है। यह सवाल देश के पूर्व मंत्री यशवंत सिन्हा ने तो उठाया ही है, सरकारी अधिकारी भी इस तरह की बातें करने लगे हैं।

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हालांकि रिजर्व बैंक ने इस तरह की किसी भी बात को सिरे से खारिज किया है। केंद्रीय वित्त मंत्रालय से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि पूरे प्रकरण में रिजर्व बैंक के आकलन की योग्यता पर सवाल उठता है।
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उसका काम बैंकिंग क्षेत्र का नियमन तो है ही, अर्थव्यवस्था में नोट की कितनी मांग है, इसका आकलन कर उस हिसाब से करेंसी नोट छपवाने का प्रबंध करना भी है। लेकिन पिछले कुछ महीनों में इस बारे में रिजर्व बैंक का प्रदर्शन ठीक नहीं लग रहा है।
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दिख रहा है कैजुअल अप्रोच
उन्होंने कहा कि चाहे करेंसी नोट छपवाना हो या सिक्का ढलवाना, सबमें रिजर्व बैंक कैजुअल अप्रोच अपना रहा है। उदाहरण के लिए कभी छापेखाने को 90 लाख पीस नोट छापने का आर्डर मिलता है और बाद में उसे घटा कर 70 लाख पीस कर दिया जाता है।

यही हालत सिक्के में भी है। इससे छापेखाने और टकसाल के अधिकारी भी ढंग से काम नहीं कर पाते हैं। यही नहीं, छपे नोटों को छापेखाने से उठाने में भी ढिलाई होती है और छपे नोटों को काफी दिन तक गोदामों में रखना पड़ता है।

बीते जून से नहीं छप रहा है 2000 रुपये का नोट

rbi assumed casual approach to deal with cash crunch problem

सूत्र के मुताबिक बीते जून से ही रिजर्व बैंक ने 2000 रुपये के नोट छपवाने बंद कर दिए। इसके अलावा 500 रुपये के नोट भी बहुत कम छप रहे हैं। 100 रुपये का तो नया नोट अभी आया ही नहीं है। इसलिए नोट छापने वाले प्रेस ले दे कर दस, बीस और पचास रुपये के नोट छाप रहे हैं। पर्याप्त काम नहीं रहने से करेंसी नोट प्रेस में कर्मचारियों का भी इंसेंटिव प्रभावित होता है।

रिजर्व बैंक और सरकार की है विफलता
भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और अटल बिहारी वाजयेयी सरकार में वित्त मंत्री रहे यशवंत सिन्हा ने शुक्रवार को कहा कि यह पूर्ण रूप से कुप्रबंधन है। एक टीवी चैनल से बातचीत में उन्होंने कहा कि चाहे रिजर्व बैंक की बात करें या सरकार की, दोनों अपनी भूमिका के निर्वाह में विफल रहे हैं।

उनके मुताबिक रिजर्व बैंक के पास ऐसी स्थिति सेे निपटने की कोई योजना नहीं थी। यह शुद्घ रूप से करेंसी नोट के वितरण तंत्र की विफलता है। उन्होंने सरकार को भी आड़े हाथों लेते हुए कहा कि यदि अर्थव्यवस्था में 70 हजार या एक लाख करोड़ रुपये के करेंसी नोट की कमी थी तो उसे दूर करने की कोशिश क्यों नहीं हुई।

आरबीआई ने आरोप को किया खारिज
रिजर्व बैंक के प्रवक्ता से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने इसे सिरे से खारिज किया। उनका कहना है कि यह आरोप गलत है, रिजर्व बैंक अपना काम बेहतर ढंग से कर रहा है और आकलन में कहीं कोई खामी नहीं है। अप्रैल के पहल पखवाड़े में जो नोट की किल्लत हुई, उसके पीछे कई कारक जिम्मेदार हैं। अब पूरे देश में नोटों की किल्लत दूर हो गई है।

सरकार स्थिति संभाले नहीं तो आंदोलन होगा
बैंक कर्मचारियों के सबसे बड़े संगठन एआईबीईए के महासचिव सीएच वेंकटचलम का कहना है कि नोटों की किल्लत के लिए सरकार या रिजर्व बैंक दोषी हैं, जबकि इसका खामियाजा बैंक कर्मचारियों को उठाना पड़ रहा है। अक्सर ग्राहक बैंक कर्मचारियों को भला-बुरा कह देते हैं। इसलिए सरकार इस स्थिति को ठीक करे नहीं तो बैंक कर्मचारी आंदोलन की राह पर उतर सकते हैं।

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