भारतीय बैंकों की रेटिंग निगेटिव से हुई स्टेबल
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दिग्गज रेटिंग एजेंसी मूडीज इन्वेस्टर सर्विस ने भारतीय बैंकिंग तंत्र पर भरोसा जताते हुए इसकी रेटिंग में सुधार किया है। एजेंसी ने भारतीय बैंकों का आउटलुक निगेटिव से बदल कर स्टेबल कर दिया है।
एजेंसी ने उम्मीद जतायी है कि बैंकों का संचालन बेहतर होगा और आने वाले दिनों में इनके गैर निष्पादित परिसंपत्ति -एनपीए- में कमी आएगी। मूडीज के उपाध्यक्ष एवं वरिष्ठ साख अधिकारी श्रीकांत वाडलमणि का कहना है कि अगले 12 से 18 महीने के दौरान भारतीय बैकिंग प्रणाली का स्थिर परिदृष्य दर्शाता है कि बैंकों के बेहतर होते परिचालन माहौल से ऋण संबंधी समस्या बढ़ने की गति कम होगी। इससे बैंकों के फंसे हुए ऋण का अनुपात भी अपेक्षाकृत स्थिर होगा।
उल्लेखनीय है कि मूडीज ने नवंबर 2011 में ही भारतीय बैंकों का आउटलुक निगेटिव किया था। उस समय बताया गया था कि बैंकों की परिसंपत्तियों की गुणवत्ता में लगातार ह्रास हो रहा है इसलिए आउटलुक को निगेटिव किया गया है।
मूडीज की रिपोर्ट में कहा गया है कि स्थिर परिदृष्य के संबंध में उसका आकलन पांच मुख्य कारकों पर आधारित है। इसमें कहा गया है कि बैंकों के परिचालन माहौल में सुधार हो रहा है इसलिए इसे इंप्रूविंग कहा गया है।
परिसंपत्तियों के जोखिम और पूंजी को स्टेबल करार दिया गया है जबकि फंडिंग और लिक्विडिटी को स्टेबल बताया गया है। बैंकों की लाभप्रदता तथा कार्यकुशलता को भी स्टेबल बताया गया है जबकि सरकारी समर्थन को भी स्टेबल की श्रेणी में रखा गया है।
सरकारी बैंकों में पूंजी की दिक्कत
एजेंसी ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का विश्लेषण करते हुए कहा है कि इस क्षेत्र में बिजली और लोहा-इस्पात क्षेत्र की परेशानियों की वजह से इस क्षेत्र में एनपीए ज्यादा है।
साथ ही सरकारी बैंकों में पूंजी की भी दिक्कतें हैं। इन बैंकों बेहद ज्यादा पूंजी की जरूरत है, लेकिन वह मिल नहीं पा रहा है। इसलिए इन्हें बाजार से पूंजी जुटानी चाहिए। श्रीकांत का कहना है कि उद्योग जगत को दिए गए कुल लोन में से 20 फीसदी लोन पर काफी दबाव-स्ट्रेस- है।
ऐसे में दबाव वाले लोन में और बढ़ोतरी बैंकिंग सिस्टम के लिए घातक साबित हो सकती है। साथ ही बैंकों का नेट इंटरेस्ट मार्जिन भी स्थिर रहना बेहद जरूरी है।
उनका कहना है कि सरकारी बैंकों में बढ़ते प्रोविजनिंग के चलते इनके मुनाफे में ज्यादा बढ़ोतरी का अनुमान नहीं है, इसके साथ ही सरकारी बैंकों की पूंजी जुटाने की लागत भी ज्यादा रहने की उम्मीद है।