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इस लड़की का नहीं है पेट, फिर भी जमकर खाती है खाना

Sun, 20 May 2018 10:40 AM IST
फीचर डेस्क, अमर उजाला
फीचर डेस्क, अमर उजाला Updated Sun, 20 May 2018 10:40 AM IST
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This woman does not have stomach yet she made food for everyone
natasha diddee
एक लड़की जिसका अपना पेट नहीं है, वो दिल लगाकर खाना बनाती है। अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए। इनकी इंस्टाग्राम फ़ीड देखेंगे तो खाने के अलावा और कुछ दिखाई ही नहीं देगा। खाना भी ऐसा कि देखते ही जी ललचा जाए। खाने की इतनी शौकीन लड़की खुद जो चाहे वो नहीं खा सकती। उनके एक-एक निवाले पर डॉक्टर की नजर रहती है। इन सबके बाद भी वो दिन-रात खाना बनाती हैं और बड़े प्यार से सबको खिलाती हैं। वो कई नामी रेस्तरां के लिए बतौर कंसल्टेंट काम करती हैं और खाने की खुशबुओं के बीच अपनी जिंदगी गुजारती हैं।
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ये लड़की हैं नताशा दिद्दी जो पुणे में रहती हैं। नताशा खुद को 'द गटलेस फ़ूडी' कहती हैं। यानी खाने-पीने का शौकीन ऐसा शख्स जिसका पेट नहीं है।

पेट निकाले जाने की कहानी

बात साल 2010 की है जब नताशा ने अपने बाएं कंधे में एक चुभता हुआ सा दर्द महसूस किया। जैसे ही वो कुछ खातीं, दर्द और बढ़ जाता। चूंकि दर्द कंधे में था, वो आर्थोपेडिशियन (हड्डी के डॉक्टर) के पास गईं। एक्स-रे और दूसरे कई टेस्ट के बाद उनके कंधे की दो बार सर्जरी हुई और उन्हें छह महीने कड़ा वर्कआउट करने को कहा गया। बावजूद इसके, नताशा की हालत में रत्ती भर भी सुधार नहीं हुआ।

वो दर्द से तड़पतीं और पेनकिलर खाती रहतीं। उनकी हालत सुधरने के बजाय और बिगड़ती चली गई। कभी 88 किलो की रहीं नताशा का वजन अब घटकर 38 किलो हो चुका था। न कोई दवा काम आ रही थी, न फिजियोथेरेपी और न अल्ट्रासाउंड और सोनोग्रैफी जैसे मेडिकल टेस्ट।
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आखिर मिला सही डॉक्टर 

तमाम मुश्किलों और हताशा के बाद आखिरकार नताशा सही जगह और सही शख्स के पास पहुंचीं। वो जगह थी पुणे का केईएम हॉस्पिटल और वो शख्स थे डॉ. एसएस भालेराव। डॉ. भालेराव के नताशा से मिलने की कहानी भी दिलचस्प है। उन्होंने बताया,"मैं अस्पताल के बिस्तर पर अपने घुटने मोड़कर बैठी थी, क्योंकि इस तरह बैठने से दर्द जरा कम महसूस होता था। उसी वक्त मेरे कमरे में एक अनजान शख्स आया और मुझे देखने लगा। तभी मेरे पापा और उन्होंने बताया कि वो मेरे डॉक्टर हैं।"

नताशा आगे बताती हैं, "डॉ. भालेराव ने मुझे देखने के मिनट भर बाद बता दिया कि मेरे पेट में अल्सर है जिससे खून रिस रहा है और यही मेरे दर्द की वजह है।" इसके बाद एक लैप्रोस्कोपी टेस्ट हुआ और अल्सर वाली बात साबित हो गई। लैप्रोस्कोपी वो टेस्ट है जिसमें फाइबर और ऑप्टिक की एक नली से पेट के अंदर हो रही हलचल को देखा जाता है।
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दर्द कंधे में, तकलीफ पेट में!

डॉ. भालेराव ने बीबीसी से बताया, "नताशा के पेट में दो अल्सर थे और उनसे ब्लीडिंग शुरू हो चुकी थी। वो इतने पेनकिलर ले चुकी थी कि उसके पेट ने काम करना बंद कर दिया था। पेनकिलर्स हमारे शरीर को बहुत नुकसान पहुंचाते हैं, खासकर इंटेस्टाइंन को।" लेकिन अगर अल्सर पेट में थे तो दर्द कंधे में क्यों हो रहा था?

इसके जवाब में डॉ. भालेराव बताते हैं, "अल्सर नताशा के पेट के उस हिस्से में था जो डायफ्राम से लगा था.। डायफ्राम और कंधे की एक नर्व जुड़ी होती है इसलिए पेट का ये दर्द कंधे तक पहुंचता था। मेडिकल साइंस की भाषा में इसे 'रेफर्ड पेन' कहते हैं।
 

नौ घंटे तक चला ऑपरेशन

चूंकि पेनकिलर्स और अल्सर ने मिलकर नताशा के पेट को तबाह कर दिया था, इसलिए सर्जरी करके उसे निकाल देना ही एकमात्र विकल्प बचा था। इस ऑपरेशन को 'टोटल गैस्ट्रेक्टॉमी' कहते हैं। नताशा ने बताया, "ये फैसला आनन-फानन में लिया गया था। मैं ऑपरेशन थियेटर में बेहोशी की हालत में थी जब डॉ. भालेराव ने लैप्रोस्कोपी के जरिए मेरे पेट की हालत देखी। उन्होंने मेरे मॉम-डैड और पति को ये बताया।"

नताशा के परिवार से कहा गया था कि ये काफी बड़ा ऑपरेशन है और इस दौरान उनकी मौत भी हो सकती है। परिवार के पास भी चांस लेने के अलावा कोई चारा नहीं था। आखिर नौ घंटे लंबे ऑपरेशन के बाद नताशा का पेट निकाल दिया गया।

पेट निकाले जाने की बात सुनकर नताशा का क्या रिऐक्शन था?

इसके जवाब में वो कहती हैं, "मुझे इस ऑपरेशन के तकरीबन एक हफ्ते बाद इसके बारे में बताया गया। मेरे घरवालों को समझ में नहीं आ रहा था कि वो मुझे ये कैसे बताएं। जिसकी जिंदगी ही खाने के इर्द-गिर्द घूमती हो उसे कोई ये कैसे बता सकता है कि उसका पेट ही नहीं रहा?" लेकिन पता तो चलना ही था। पता भी चला। 

पता यूं चला कि नताशा हॉस्पिटल के बिस्तर में बैठी कुछ खाने जा रही थीं और तभी उनकी मां ने टोक दिया। उन्होंने कहा, "रुक! तू ऐसे कुछ भी नहीं खा सकती। डॉक्टर को दिखाना होगा। अब तेरा पेट नहीं है…"
 

पेट नहीं है!!!

नताशा ने तुरंत नीचे देखा और उन्हें समझ नहीं आया कि उनकी मां क्या कह रही हैं। दरअसल जो हम छू कर महसूस करते हैं, वो पेट का बाहरी हिस्सा होता है। नताशा के शरीर का वो हिस्सा निकाला गया है जहां खाना पचता है। पेट निकाले जाने के बाद नताशा की जिंदगी एकदम से बदल गई। ऐसा नहीं है कि वो खाना नहीं खा सकतीं। वो खाना खाती ज़रूर हैं लेकिन आम लोगों की तरह नहीं।

अब वो दिन में सात-आठ बार खाना खाती हैं। उनके लिए फुल ब्रेकफास्ट, लंच या डिनर जैसा कुछ नहीं है। उनका खाना डायबिटीज के किसी मरीज जैसा होता है और इसकी लगातार निगरानी होती है। खाने में अधिकतर पीने की चीजें होती हैं।

उनका पाचन तंत्र कैसे काम करता है?

  • चूंकि उनका पेट निकाला चुका है इसलिए उनका शरीर खाना स्टोर नहीं कर सकता। उनका खाना सीधे छोटी आंत में जाता है।
  • इसकी वजह से उन्हें कई दिक्कतें भी आती हैं। मसलन, वो एकसाथ भरपेट खाना नहीं खा सकतीं।
  • चूंकि विटामिन बी इंसान के पेट में बनता है और नताशा का पेट नहीं है इसलिए उन्हें नियमित तौर पर इसके इंजेक्शन लेने पड़ते हैं।
  • वो ज़्यादा मीठा जैसे आइसक्रीम या रस मलाई नहीं खा सकतीं क्योंकि इससे उनके बेहोश होने की आशंका है। इसे 'डंपिंग सिन्ड्रोम' कहते हैं।

असलियत की ठोकर

नताशा कहती हैं, "पहले तो मैं इस सच को कबूल ही नहीं कर पा रही थी लेकिन असलियत से कब तक दूर भागती? असलियत की ठोकर लगी तो खूब सोचा और पाया कि मेरे पास दो रास्ते हैं। या तो मैं नाउम्मीदी में डूबकर अपना शौक छोड़ दूं या फिर नए सिरे से जीना शुरू करूं। मैंने दूसरा रास्ता चुना।"

फिलहाल वो अपनी फूड वेबसाइट और इंस्टाग्राम चला रही हैं, कुछ होटलों में कंसल्टेंट का काम कर रही हैं। हाल ही में उन्होंने 'Foursome' नामक एक किताब भी लिखी है और जिंदगी को भरपूर जी रही हैं।

नताशा को लगता है कि भारतीय व्यंजन दुनियाभर के व्यंजनों से बेहतर हैं क्योंकि इनमें बहुत विविधता है। इसके साथ ही वो 'हेल्दी ईटिंग' से जुड़े तमाम मिथक तोड़ने की कोशिश भी कर रही हैं। वो कहती हैं, "हमें लगता है कि हेल्दी मतलब बिना तेल-घी का उबला हुआ खाना, लेकिन सच तो ये है कि हमें तेल-घी से ज्यादा नुकसान शुगर और कार्बोहाइड्रेट से होता है।"

नताशा जोर देकर कहती हैं कि चाहे लड़का हो लड़की, खाना बनाना सबको सीखना चाहिए और अब पिज़्जा, बर्गर छोड़कर हमें वापस रोटी-सब्जी का रुख करना चाहिए।
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