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जिस पेड़ के नीचे भगवान बुद्ध को हुआ था ज्ञान प्राप्त, अनोखा है उसका इतिहास

Sat, 02 May 2020 01:34 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सोनू शर्मा Updated Sat, 02 May 2020 01:34 PM IST
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History of Bodhi Tree the ancient sacred tree in Bodh Gaya
बोधगया का बोधि वृक्ष - फोटो : Social media

बोधि वृक्ष के बारे में तो आपने सुना ही होगा। वहीं बोधि वृक्ष, जहां भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था। पहले तो आप ये जान लीजिए कि 'बोधि' का मतलब 'ज्ञान' होता है और वृक्ष का मतलब पेड़ यानी 'ज्ञान का पेड़'। दरअसल, बोधि वृक्ष बिहार के गया जिले में बोधगया स्थित महाबोधि मंदिर परिसर में स्थित एक पीपल का पेड़ है। इसी पेड़ के नीचे ईसा पूर्व 531 में भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था। इस पेड़ की भी बड़ी विचित्र कहानी है, जिसके बारे में शायद ही आप जानते होंगे। आपको जानकर हैरानी होगी कि इस पेड़ को दो बार नष्ट करने की कोशिश की गई थी, लेकिन हर बार चमत्कारिक रूप से यह पेड़ फिर से उग आया था। 

History of Bodhi Tree the ancient sacred tree in Bodh Gaya
बोधगया का बोधि वृक्ष - फोटो : Social media

बोधि वृक्ष को नष्ट करने का पहला प्रयास ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में किया गया था। वैसे तो सम्राट अशोक बौद्ध अनुयायी थे, लेकिन कहते हैं कि उनकी एक रानी तिष्यरक्षिता ने चोरी-छुपे वृक्ष को कटवा दिया था। उस समय सम्राट अशोक दूसरे प्रदेशों की यात्रा पर गए हुए थे। हालांकि उनका ये प्रयास विफल रहा था। बोधि वृक्ष पूरी तरह नष्ट नहीं हुआ था। कुछ ही सालों के बाद बोधि वृक्ष की जड़ से एक नया पेड़ उग आया था। उस पेड़ को बोधि वृक्ष की दूसरी पीढ़ी का वृक्ष माना जाता है, जो करीब 800 साल तक रहा था। 

History of Bodhi Tree the ancient sacred tree in Bodh Gaya
बोधगया का बोधि वृक्ष - फोटो : Social media

दूसरी बार बोधि वृक्ष को नष्ट करने का प्रयास सातवीं शताब्दी में बंगाल के राजा शशांक ने किया था। कहा जाता है कि वह बौद्ध धर्म का कट्टर दुश्मन था। उसने बोधि वृक्ष को पूरी तरह नष्ट करने के लिए उसे जड़ से ही उखड़वाने को सोचा था, लेकिन जब वो इसमें असफल रहा तो उसने वृक्ष को कटवा दिया और उसकी जड़ों में आग लगवा दी। लेकिन यह चमत्कार ही था कि इसके बावजूद भी बोधि वृक्ष नष्ट नहीं हुआ और कुछ सालों के बाद उसकी जड़ से एक नया पेड़ निकला, जिसे तीसरी पीढ़ी का वृक्ष माना जाता है। यह वृक्ष करीब 1250 साल तक रहा था। 

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बोधगया का बोधि वृक्ष - फोटो : Social media

तीसरी बार तो बोधि वृक्ष वर्ष 1876 में प्राकृतिक आपदा की वजह से नष्ट हो गया था, जिसके बाद एक अंग्रेज लॉर्ड कनिंघम ने वर्ष 1880 में श्रीलंका के अनुराधापुरा से बोधिवृक्ष की शाखा मंगवाकर उसे बोधगया में फिर से स्थापित कराया था। यह बोधि वृक्ष की पीढ़ी का चौथा पेड़ है, जो बोधगया में आज तक मौजूद है। 

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History of Bodhi Tree the ancient sacred tree in Bodh Gaya
श्रीलंका के अनुराधापुरा में मौजूद बोधि वृक्ष - फोटो : Social media

दरअसल, ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में सम्राट अशोक ने अपने बेटे महेंद्र और बेटी संघमित्रा को बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार करने के लिए बोधि वृक्ष की टहनियां देकर उन्हें श्रीलंका भेजा था। उन्होंने ही अनुराधापुरा में उस वृक्ष को लगाया था, जो आज भी वहां मौजूद है। आपको बता दें कि अनुराधापुरा दुनिया की सबसे प्राचीन नगरियों में से एक है। इसके अलावा यह श्रीलंका की आठ विश्व विरासत स्थलों में से भी एक है। 

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